मोदी सरकार - 2.0 के 100 दिन

अमित पोपली, झज्जर : सुषमा स्वराज का अचानक चले जाना भाजपा ही नहीं भारतीय राजनीति की एक बड़ी क्षति है। अपने नेता अटल बिहारी वाजपेयी की तरह सुषमा स्वराज भी राजनीति में अजातशत्रु मानी जाती रहीं। प्राय: हर दल में उनकी स्वीकार्यता महज इसी बात से दिखती हैं, हर कोई उन्हें अपना सा मानता है। जबकि भाजपा का बड़ा नेता हो, छोटा नेता या कार्यकर्ता, हर कोई उन्हें दीदी कहकर बुलाता था। हरियाणा की बेटी होने के नाते यह रिश्ता लोगों को अपनेपन का अहसास भी कराता है।संघ से जुड़े बुजुर्ग पूर्ण चंद सुनेजा का कहना है कि पहली दफा वे शहर के चौपटा बाजार में हुई एक सभा में देश के पूर्व उप-प्रधानमंत्री देवी लाल के साथ आई थी।कद में छोटी सी दिखने वाली जब देवीलाल के साथ मंच पर खड़ी हुई तो फर्क दिखना लाजिमी थी, लेकिन जब उन्होंने मंच से अपनी बात रखी थी तो आज भी लगता है कि कुछ नहीं बदला। बस समय के साथ सुषमा की शैली में परिपक्वता और भाषाई ज्ञान बढ़ता चला गया। ठीक इसी लहजे में गुलशन शर्मा ने बताया कि वे पूर्व मंत्री कांता देवी के साथ दिल्ली चुनाव में गए थे। कांता देवी की ड्यूटी संयोगवश उन्हीं के साथ थी। चार से पांच दिन तक दिल्ली में रहने के दौरान देखा कि जब वह अपनी बात रखती थी तो शायद ही कोई ऐसा होता था जो कि बातों से सहमत नहीं हो। डेढ़ फीट ऊंची चौकी पर हुआ था भाषण : कद से छोटी सुषमा स्वराज की बातें काफी ऊंची थी और धमक दूर तक सुनाई देती थी। लेकिन जब मंच पर बोलने के लिए वह आती थी तो डायस छोटा पड़ता था। मार्किट कमेटी के चेयरमेन मनीष नंबरदार के मुताबिक 2002 के कार्यक्रम के लिए बेरी जब वह सभा करने पहुंची तो विशेष तौर पर डेढ़ फीट ऊंचाई का स्टूल उनके लिए तैयार करवाया गया था। जिसके बाद उन्होंने बड़ी सहजता से अपनी बात रखी। हरियाणा के नाते समझती थी किसानों का दर्द : सुषमा स्वराज जब नेता प्रतिपक्ष थी, उस दौरान कैबिनेट मंत्री ओम प्रकाश धनखड़ के पास किसान मोर्चा का दायित्व था। किसान मोर्चा की कोई भी गतिविधि हो, वह जरूरत पहुंचती थी। बकौल धनखड़, हरियाणा की बेटी होने के नाते उन्हें एक किसान का दर्द और उसकी समस्या का समाधान बखूबी मालूम था। किसान मोर्चा के कार्यक्रम में जब जंतर मंतर पर उन्होंने आकर सभी का हौंसला बढ़ाया तो लगा कि किसानों के हक में जो भी वांछित है, उसे लिए बगैर पीछे नहीं हटेंगे।

Posted By: Jagran

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