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दूध-दही के खाने वाले हरियाणा में महंगाई की मार, रसोई का बिगड़ा बजट

Published: Thu, 03 Sep 2026 03:14 PM (GMT+05:30)

झज्जर में दूध के दामों में 10-15 रुपये प्रति लीटर की अचानक वृद्धि से परिवारों का मासिक बजट बिगड़ गया है।

झज्जर में दूध के दाम बढ़े, परिवारों पर महंगाई की मार।

झज्जर में दूध के दाम बढ़े, परिवारों पर महंगाई की मार।

HighLights

  1. झज्जर में दूध के दाम 10-15 रुपये प्रति लीटर बढ़े

  2. पशुपालकों ने तूड़ी, खल, दवाइयों की बढ़ती लागत को बताया

  3. भैंस का दूध 80 रुपये, गाय का 60 रुपये प्रति लीटर

जागरण संवाददाता, झज्जर। 'देशों में देश हरियाणा, जित दूध-दही का खाना' यह पंक्तियां अब जिले के ग्रामीण व शहरी अंचलों में एक कहावत बनकर सिमटती नजर आ रही हैं। रसोई की चौतरफा महंगाई के बीच अब दूध के दामों में अचानक आई 10 से 15 रुपये प्रति लीटर तक की उछाल ने हर आम परिवार के बजट का गणित बिगाड़ दिया है।

गांव की चौपालों से लेकर इंटरनेट मीडिया तक केवल एक ही चर्चा है कि आखिर इस महंगाई में परिवार की खुराक का संतुलन कैसे बनाया जाए। सप्लाई करने वाले दूधियों ने बीते 1 सितंबर से बढ़ी हुई दरों का ऐलान कर दिया है, जिसके बाद से घरों में दूध-दही की खपत में कटौती का दौर शुरू हो गया है।

आम उपभोक्ता की पीड़ा: 100 लीटर खपत पर 1000 से 1200 रुपये का सीधा झटका

दूध की कीमतों में आई इस तेजी ने मध्यमवर्गीय और दिहाड़ीदार परिवारों की कमर तोड़ दी है। शहरी व कस्बाई इलाकों में रहने वाले परिवारों का गणित गड़बड़ा गया है।

राकेश कुमार के मुताबिक, यदि किसी घर में औसतन रोजाना 3 से 4 लीटर यानी महीने का 100 लीटर दूध इस्तेमाल होता है, तो नए रेट लागू होने के बाद उनका मासिक खर्च सीधे 1,000 से 1,200 रुपये बढ़ गया है। गृहिणियों की पीड़ा है कि सब्जी और राशन पहले से महंगे थे, अब बच्चों के दूध और सुबह की चाय पर भी कैंची चलानी पड़ रही है। लोग अब दही जमाने और घी-मक्खन बनाने में कटौती करने लगे हैं।

पशुपालकों का पक्ष: तूड़ी, खल और दवाइयों के दामों ने तोड़ी कमर

दूसरी ओर, गांवों में बैठकें कर रहे पशुपालकों का अपना दर्द है। पशुपालकों का साफ कहना है कि दूध के दाम बढ़ाना कोई मुनाफाखोरी नहीं, बल्कि पशुपालन को जीवित रखने की मजबूरी है।

पशुपालक सुलोधा गांव निवासी वीरेंद्र बताते है तूड़ी के दाम आसमान छू रहे हैं। खल, बिनौला और सूखा दाना की कीमतों में पिछले कुछ महीनों में भारी वृद्धि हुई है। पशुओं के बीमार होने पर चिकित्सक की फीस, टीकों और दवाइयों का खर्च इतना बढ़ गया है कि 60-70 रुपये लीटर में दूध बेचना घाटे का सौदा बन चुका था। इसी के चलते गांवों में आपसी सहमति से तय किया गया है कि दूधियों को भैंस का दूध 80 रुपये और गाय का दूध 60 रुपये लीटर से कम में नहीं दिया जाएगा।

दूधियों और डेयरी संचालकों की खींचतान

गांवों से दूध एकत्र कर शहरों में घर-घर पहुंचाने वाले दूधियों की स्थिति दो पाटों के बीच फंसने जैसी है। डेयरियों पर फैट का रेट (85 से 90 पैसे प्रति फैट) मिलने और गांवों में खरीद महंगी होने से उनका मार्जिन खत्म हो गया है।

जब वे बढ़े हुए दाम लेकर ग्राहकों के पास जाते हैं, तो उन्हें उपभोक्ताओं की नाराजगी झेलनी पड़ती है। कुल मिलाकर, प्राय: हर घर के बजट पर दूध की आंच साफ दिखाई दे रही है। जिसकी प्रतिक्रिया आने वाले दिनों में देखने को मिलेगी।

गांव-गांव में गरमाया माहौल

जिलेभर के विभिन्न ग्रामीण क्षेत्रों में हो रही पशुपालकों की बैठकों के वीडियो भी इंटरनेट मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे हैं। हालांकि पशुपालकों ने साफ किया है कि गांव के भीतर आपसी भाईचारे में खुले दूध की बिक्री पर कोई पाबंदी नहीं है, लेकिन व्यावसायिक दूधियों को तय न्यूनतम दर पर ही दूध दिया जाएगा। फिलहाल, पशुपालकों की बढ़ती लागत और उपभोक्ताओं की जेब पर पड़े डाके के बीच पूरे जिले में दूध का यह मुद्दा गर्माया हुआ है।

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