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Asian Games 2026: झज्जर की दीक्षा ने रचा इतिहास, गोल्फ में पहला रजत पदक दिला कर्नल पिता का बढ़ाया मान

Published: Sat, 03 Oct 2026 10:20 AM (IST)

दीक्षा डागर ने एशियाई खेल 2026 में महिला टीम गोल्फ स्पर्धा में ऐतिहासिक रजत पदक जीतकर देश का मान बढ़ाया ...और पढ़ें

दीक्षा डागर ने एशियाई खेल 2026 में गोल्फ में दिलाया पहला रजत पदक।

दीक्षा डागर ने एशियाई खेल 2026 में गोल्फ में दिलाया पहला रजत पदक।

HighLights

  1. दीक्षा डागर ने एशियाई खेल 2026 में रजत पदक जीता

  2. महिला टीम गोल्फ में भारत का पहला एशियाई खेल पदक

  3. पिता और मां के सहयोग से दीक्षा ने चुनौतियों को हराया

जागरण संवाददाता, झज्जर। जापान के आइची-नागोया में आयोजित एशियाई खेल 2026 में गांव छप्पार की बेटी दीक्षा डागर ने अपने अटूट संकल्प और परिवार के त्याग की बदौलत इतिहास के पन्नों में अपना नाम स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज करा दिया है।

महिला टीम गोल्फ स्पर्धा में दीक्षा डागर, प्रणवी उर्स और अदिति अशोक की तिकड़ी ने 14-अंडर-पार (कुल 546 स्कोर) के साथ देश के लिए ऐतिहासिक रजत पदक हासिल किया। महिला टीम गोल्फ के इतिहास में भारत का यह अब तक का पहला एशियाई खेल पदक है।

खामोशी को हराने वाली बेटी और पिता का अनूठा साथ

दीक्षा डागर की यह सफलता केवल एक खेल पदक की कहानी नहीं है, बल्कि यह एक पिता के अपार विश्वास और बेटी के अदम्य साहस की बेहद भावुक दास्तान है।

बचपन से ही सुनने की समस्या से जूझ रही दीक्षा के लिए दुनिया की आवाजों को समझना आसान नहीं था, लेकिन उनके पिता कर्नल नरिंदर डागर ने कभी अपनी बेटी की इस स्थिति को उसकी कमजोरी नहीं बनने दिया।

पिता ने न सिर्फ दीक्षा के हाथों में गोल्फ स्टिक थमाई, बल्कि खुद उनकी भारी-भरकम गोल्फ किट उठाकर हर मैदान पर साए की तरह साथ खड़े रहे।

मैदान पर हवा के रुख को भांपने से लेकर रणनीति बनाने तक, पिता ने कैडी (किट वाहक) और कोच बनकर बेटी के हर शाट को तराशा। जब दीक्षा मैदान में उतरती थीं, तो पिता का कंधा सिर्फ भारी किट ही नहीं उठाता था, बल्कि अपनी बेटी के सपनों और पूरे देश की उम्मीदों का बोझ भी मुस्कुराते हुए सहता था।

पिता की मजबूत पीठ और मार्गदर्शक नजरों ने दीक्षा को दुनिया के सबसे बड़े गोल्फ कोर्स पर कभी अकेला महसूस नहीं होने दिया।

मां का अनवरत त्याग

इस स्वर्णिम सफलता की नींव में दीक्षा की मां संगीता डागर का वह अनगिनत दिनों का संघर्ष भी रचा-बसा है, जो अक्सर कैमरों की चकाचौंध से दूर रहा। जब दीक्षा स्कूल में पढ़ती थीं, तब उनकी मां दोपहर में गाड़ी लेकर स्कूल के गेट पर मुस्तैद खड़ी रहती थीं।

जैसे ही छुट्टी की घंटी बजती, मां दीक्षा को सीधे स्कूल की वेशभूषा में ही गाड़ी में बैठाकर गोल्फ कोर्स की ओर निकल पड़ती थीं। गाड़ी की पिछली सीट ही दीक्षा का डाइनिंग टेबल और चेंजिंग रूम बन जाती थी, जहां रास्ते में ही वे भोजन करतीं और कपड़े बदलकर अभ्यास के लिए तैयार होती थीं।

मां का यह अटूट समय प्रबंधन और निष्ठा ही थी कि दीक्षा का एक भी मिनट अभ्यास से जाया नहीं हुआ। मां ने अपने जीवन के हर आराम को परे रखकर अपनी बेटी की ट्रेनिंग को ही अपनी जिंदगी का एकमात्र लक्ष्य बना लिया था।

चुनौतियों को मात देकर रचा इतिहास

सुनने की अक्षमता के कारण मैदान पर एकाग्रता बनाए रखना और दिशाओं का सटीक अनुमान लगाना बेहद कठिन होता है। लेकिन दीक्षा ने अपनी इस चुनौती को ही अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लिया। उन्होंने खामोशी की दुनिया में गोल्फ के खेल की हर बारीक ताल को महसूस किया।

ओलिंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व करने से लेकर डेफलिंपिक्स में स्वर्ण पदक और अब एशियाई खेलों में यह ऐतिहासिक रजत पदक हासिल करने तक, दीक्षा ने साबित कर दिया कि यदि हौसले बुलंद हों तो कोई भी बाधा मंजिल का रास्ता नहीं रोक सकती।

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