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कपड़ा खरीदने घोड़ों पर आते थे अंग्रेज, 2 घंटे खुलता था हिसार का वकीलान बाजार; चांदी के सिक्कों से होता था भुगतान

By Gulshan BajajEdited By: Prince Sharma
Published: Sat, 07 Nov 2026 08:47 AM (IST)

हिसार का वकीलान बाजार, जो 1940 से आबाद है, कभी वकीलों का निवास था और अंग्रेज यहां चांदी के सिक्कों से कपड़े खरीदते थे, दुकानें केवल दो घंटे खुलती थीं।

हिसार का वकीलान बाजार (जागरण फोटो)

हिसार का वकीलान बाजार (जागरण फोटो)

HighLights

  1. अंग्रेज घोड़ों पर आकर चांदी के सिक्कों से कपड़े खरीदते थे

  2. बाजार में दुकानें दोपहर 12 से 2 बजे तक ही खुलती थीं

  3. आपातकाल में पुरानी लकड़ी के छज्जों वाली इमारतें तोड़ी गईं

गुलशन बजाज, हिसार। नागोरी गेट से गुलाब सिंह चौक तक दुकानों की कतारें और ग्राहकों की आवाजाही दिखाई देती है, वहां कभी वकीलों के परिवारों की रिहायश हुआ करती थी।

बाजार में कारोबार भी आज की तरह पूरे दिन नहीं चलता था। दोपहर 12 से दो बजे तक ही दुकानें खुलती थीं। अंग्रेज अधिकारी घोड़ों पर सवार होकर कपड़ा खरीदने आते थे और चांदी के सिक्कों से भुगतान करते थे।

लगभग 1940 से आबाद हिसार का वकीलान बाजार आज भले ही शहर के पुराने व्यापारिक केंद्रों में शामिल हो, लेकिन इसकी गलियों में उस दौर की कई कहानियां आज भी जीवित हैं।

दिगंबर जैन समाज के प्रधान नवीन जैन बताते हैं कि उनके दादा अजीत प्रसाद जैन ने वर्ष 1940 में वकीलान बाजार में सबसे पहले कपड़े की दुकान खोली थी। उस समय बाजार का स्वरूप बिल्कुल अलग था।

न दुकानों की लंबी कतारें थीं और न ही आज जैसी भीड़। कारोबार का समय भी सीमित था। दोपहर 12 बजे दुकान खुलती और दो बजे बंद हो जाती थी। अंग्रेज घोड़ों पर सवार होकर खरीदारी के लिए आते थे।

लकड़ी के छज्जों वाली इमारतें थीं बाजार की पहचान

वकीलान बाजार की पहचान केवल कारोबार तक सीमित नहीं थी। यहां की पुरानी इमारतें भी अपनी अलग स्थापत्य शैली के लिए जानी जाती थीं। नवीन जैन के अनुसार, मकानों और दुकानों पर लकड़ी के खूबसूरत छज्जे बने होते थे, जो बाजार को अलग पहचान देते थे।

इन इमारतों में पुराने समय की निर्माण शैली और रहन-सहन की झलक दिखाई देती थी। हालांकि आपातकाल के दौरान तत्कालीन बंसीलाल सरकार के समय इन पुराने निर्माणों को तुड़वा दिया गया।

इसके बाद बाजार का स्वरूप बदलता चला गया। लकड़ी के छज्जों वाली पुरानी इमारतों की जगह आधुनिक निर्माण और नई दुकानों ने ले ली।

विभाजन के बाद पटरी से दुकानों तक बढ़ा व्यापार

विभाजन के बाद पटरी से शुरू हुआ कारोबार वर्ष 1947 में देश के विभाजन के बाद हिसार के इस हिस्से में आबादी और कारोबार, दोनों का स्वरूप बदलने लगा।

पाकिस्तान से आए कई परिवार यहां आकर बस गए। आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं होने के कारण कुछ लोगों ने बाजार में पटरी लगाकर छोटे-मोटे काम शुरू किए। इन्हीं छोटे कारोबारों से परिवारों का गुजारा चलता था।

शाम छह बजे बंद हो जाते थे शहर के चारों दरवाजे

आज शहर में देर रात तक आवाजाही सामान्य बात है, लेकिन पुराने हिसार में शाम होते ही शहर की रफ्तार थम जाती थी। नवीन जैन बताते हैं कि उस समय नागोरी गेट, तलाकी गेट, दिल्ली गेट और मोरी गेट शाम छह बजे बंद कर दिए जाते थे। शहर की सुरक्षा और व्यवस्था के लिए यह व्यवस्था लागू थी। 

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