हिसार, जेएनएन। हर बार की तरह इस बार भी ईद त्‍योहार सैंकड़ों हजारों सिर अल्‍लाह की इबादत में झुके। हिसार समेत कई आस-पास के जिलों में मुस्लिमों ने नमाज अता की। नई पाेशाक पहन बच्‍चे से लेकर बूढ़े लोग शहर के पार्कों में इबादत करते नजर आए। बता दें कि इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार हिजरी संवत 2 यानी 624 ईस्वी में पहली बार ईद-उल-फितर मनाया गया था इस बार 4 जून की शाम को चांद दिखाई दिया, आज ईद मनाई जा रही है।

ईद का त्योहार प्यार-मोहब्बत और भाई-चारे का संदेश देता है। ऐसा माना जाता है कि इसी महीने में ही कुरान-ए-पाक का अवतरण हुआ था। चांद के दीदार के अगले दिन ईद मनाने का रिवाज है। ईद को ईद-उल-फितर भी कहा जाता है। ईद-उल-फितर सबसे पहले 624 ई. में मनाया गया था। इस त्योहार को मनाने के पीछे भी एक किस्सा है।

इसलिए मनाई जाती है ईद, एक महीने रखा जाता है रोजा

इस्लामिक कैलेंडर को हिजरी कैलेंडर के नाम से जाना जाता है। इसमें साल का 9वां महीना रमजान का होता है, जिसे पवित्र माना जाता है, जो पूरे 30 दिन का होता है। इस माह में लोग रोजा रखते हैं। इस पाक महीने के अंतिम दिन का रोजा चांद को देखकर ही खत्म किया जाता है। चांद दिखने के अगले दिन ईद का त्योहार मनाया जाता है। पैगम्बर हजरत मुहम्मद साहब ने बद्र के युद्ध में फतह हासिल की थी। इस युद्ध में फतह मिलने की खुशी में लोगों ने ईद का त्योहार मनाना शुरू किया।

साल में दो बार आती है ईद, नाम अलग-अलग

हिजरी कैलेण्डर के अनुसार साल में दो बार ईद का त्योहार मनाया जाता है। ईद-उल-फितर या मीठी ईद कहा जाता है। इस दिन सेवैंया बनाने का रिवाज है। दूसरी ईद को ईद-उल-जुहा या बकरीद कहा जाता है। इस दिन बली देने का भी रिवाज बनाया हुआ है।

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Posted By: manoj kumar

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