जगदीश त्रिपाठी, हिसार। तीनों कृषि सुधार कानून विरोधी आंदोलनकारियों के तंबू खाली हैं। तंबू खाली हैं तो पंडाल भी खाली हैं। चाहे कुंडली बार्डर हो या दिल्ली बार्डर, आंदोलन में जो ग्लैमर था, वह पंजाब से था। पंजाब से लोग बड़ी लग्जरी गाड़ियां, मसाज मशीनें और विलासिता की ढेर सारी वस्तुएं लेकर आते थे। अब कुछ नहीं दिखता। खालिस्तान समर्थक तत्व भिंडरांवाले की तस्वीर लगी टी-शर्ट पहने विचरण करते थे। हरियाणा वाले भी खीर, दूध, दही लेकर पहुंचते थे, अब इन पर भी विराम लग गया है। आंदोलनकारियों के बड़े नेता फिलहाल नेपथ्य में हैं।

आंदोलन को संचालित करने के लिए बनाए गए संयुक्त किसान मोर्चा से निलंबित किए जा चुके भारतीय किसान यूनियन (चढ़ूनी) के गुरनाम सिंह चढ़ूनी का निलंबन काल बीत गया अथवा वापस ले लिया गया, इसकी कोई घोषणा तो नहीं हुई, लेकिन वे अपने समर्थकों सहित टीकरी बार्डर से कुंडली बार्डर पर पहुंचकर अपनी ताकत दिखा चुके हैं और यह भी स्पष्ट कर चुके हैं कि वह अपने मिशन पंजाब पर अडिग हैं। मिशन पंजाब यानी पंजाब के किसान संगठन पंजाब में विधानसभा का चुनाव लड़ें और अपना शासन लाएं। एक रोचक बात यह भी है कि इस बयान को देने के कारण गुरनाम सिंह चढ़ूनी को संयुक्त किसान मोर्चा ने भले ही निलंबित कर दिया हो, लेकिन पंजाब में आंदोलन के एक प्रमुख नेता बलबीर सिंह राजेवाल की फोटो वाले बड़े-बड़े पोस्टर लगाकर पूछा जा रहा है (पंजाबी में) कि आप राजेवाल को मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं? स्पष्ट है कि चढूनी ने जो चिंगारी सुलगाई थी, वह अब भड़कने लगी है।

उधर हरियाणा के लोग अब आंदोलन में शामिल पंजाब के नेताओं से विमुख होने लगे हैं। पहले भी हरियाणा के लोग राकेश टिकैत को ही महत्व देते थे। चढ़ूनी के बाद हरियाणा के एक अन्य नेता जोगेंद्र नैन को निलंबित कर संयुक्त किसान मोर्चा ने हरियाणा के लोगों का गुस्सा बढ़ा दिया है। चढ़ूनी के निलंबन से वे पहले ही क्षुब्ध थे। यद्यपि ऐसा नहीं कि संयुक्त किसान मोर्चा ने अब तक केवल हरियाणा के नेताओं को ही निलंबित किया हो, पंजाब के एक संगठन के नेता रुलदू सिंह मानसा भी निलंबित हुए हैं। मानसा के निलंबन का जो कारण है, उसने हरियाणा के लोगों का गुस्सा और बढ़ाया है।

मानसा का निलंबन इसलिए किया गया, क्योंकि उन्होंने खालिस्तानी तत्वों और विदेश से फोन कर आतंक को बढ़ावा देने वाले गुरपतवंत सिंह पन्नू की आलोचना की थी। इन सब बातों को देखते हुए राकेश टिकैत और शिवकुमार शर्मा जैसे नेताओं ने स्वयं को नेपथ्य में कर लिया है। चढू़नी अकेले चीख रहे हैं कि यदि आंदोलन के नेताओं के बीच फूट पड़ी तो बहुत नुकसान होगा, लेकिन वास्तविकता यह है कि आंदोलन के नेताओं के बीच फूट तो इसके आरंभ से ही पड़ गई थी। अब तो वह खुली किताब की तरह हो गई है, जिसे कोई भी पढ़ सकता है। पन्ने पलटने की जरूरत भी नहीं। आंदोलन स्थल पर दुष्कर्म, जलाकर हत्या जैसी वीभत्स वारदातें हो चुकी हैं। इसलिए वहां अब लोग जाना भी नहीं चाहते। धरनास्थलों पर खाली पंडाल देख कुछ लोग मंच से बार-बार युवाओं को लाने के लिए अपील करते हैं, लेकिन उनकी अपील खारिज हो जाती है। जो अभी हैं भी, वे अब वापस जाने की सोच रहे हैं। पहले उनको राशन, पानी, सब्जियां पहुंचाने में हरियाणा के लोगों में होड़ लगी रहती थी। अब उनकी ये सुविधाएं बंद हो चुकी हैं।

दूसरी तरफ भारतीय किसान यूनियन (मान) के प्रदेश अध्यक्ष ठाकुर गुणीप्रकाश को भी उन किसानों का समर्थन मिलने लगा है, जो इस कथित किसान आंदोलन के विरोधी हैं। चढ़ूनी और राकेश टिकैत उनकी चुनौती को आज तक नहीं स्वीकार कर पाए हैं। गुणीप्रकाश ने चढ़ूनी और टिकैत से कहा था कि वे खालिस्तान मुर्दाबाद, भिंडरांवाले मुर्दाबाद बोलकर दिखाएं। गुणीप्रकाश के इस चैलेंज को स्वीकार करना तो दूर आंदोलनस्थल पर अप्रत्यक्ष रूप से खालिस्तानी समर्थकों की आलोचना करने पर रुलदू सिंह मानसा को निलंबित कर दिया गया।

राकेश टिकैत, चढ़ूनी, योगेंद्र यादव इसके विरोध में आवाज उठा ही नहीं सके तो खालिस्तान मुर्दाबाद कैसे बोलेंगे। एक बात और। आंदोलन के नेता भले स्वीकार न करें, लेकिन वे समझते हैं कि आंदोलन मर रहा है। मध्य हरियाणा में कहीं-कहीं भाजपा नेताओं का जो विरोध हो रहा है, उसका कारण एक वर्ग विशेष है, जो यह चाहता है कि हरियाणा का मुख्यमंत्री केवल उनके समुदाय का हो और यह अगले विधानसभा चुनाव के पहले संभव नहीं है। भाजपा की रणनीति उस पहलवान जैसी है, जो अखाड़े में खुद आक्रामक होने के बजाय अपने प्रतिस्पर्धी को थकाकर हराने में विश्वास रखता है। और उसकी यह रणनीति सफल होती दिख रही है।

[प्रभारी, हरियाणा स्टेट डेस्क]

Edited By: Sanjay Pokhriyal