जागरण संवाददाता, हिसार : आर्य समाज नागोरी गेट हिसार के श्रावणी पर्व के चौथे दिन विद्वान वक्ता डा. वेदपाल ने कर्म सिद्धांत को लेकर चर्चा की। श्रीमद् भगवत्गीता का पतिपाद्य कर्म सिद्धांत है। मनुष्य एक क्षण भी कार्य किए बिना नहीं रह सकता है। यह उसके अधिकार में है कि वह सुकृत करे अथवा दुष्कृत। कर्म चेष्टा तो दोनों ही ओर करनी है। कर्म करते समय निस्पृहता का भाव होना चाहिए। कर्म के साथ उसका परिणाम फल तो लगा हुआ ही है। स्वकर्तव्य का विचार कर निष्काम भाव से किए गए कर्म अशुभ से छुटकारा दिलाने वाले हैं। मनुष्य जब कर्तव्य की उपेक्षा कर बिना सोच विचार किए कर्म करता है, तो प्राय: अधिकांश कर्म उसके कष्ट या दु:ख का कारण बनते हैं। आर्य जगत की युवा गायिका वैदिक आर्या ने महर्षि दयानंद का गीत गाया आर्यो के तुम हो प्राण ऋषि दयानन्द तुम्हारा क्या कहना। इस गीत को सुनकर श्रोताओं के मन में नवजीवन का संचार कर दिया। सहारनपुर से पधारे पंडित प्रताप सिंह आर्य ने मानव को चेत करते हुए अपने गीत को कुछ इस तरह प्रस्तुत किया। भजनोपदेशिका संगीता आर्या ने बहुत ही मार्मिक गीत सुनाकर सभी श्रोताओं के हृदय में करुणा रस का संचार कर दिया। सदियों से हमको अपनी भूलों ने मार डाला, कांटों से बच गए थे फूलों ने मार डाला।' संगीता आर्या आज समाज में पनप रहे अंधविश्वास, कुरीतियों को और पाखण्डों पर कुठाराघात किया जिसके कारण समाज पतन की गर्त में डूब रहा है। स्वामी दयानन्द ने मानव जाति को पुन: ईश्वर का सच्चा स्वरूप और उपासना पद्धति वेदों के आधार पर बताया। इस दौरान सभा में प्रधान चौ. हरिसिंह सैनी, आचार्य सत्यकाम आर्य, रमेश लीखा, नरेंद्र पाल मिगलानी, देवेंद्र सैनी, युद्धवीर सिंह आर्य, मदन वासुदेवा, सुरेंद्र रावल, ईश्वर सिंह आर्य, सतेंद्र रावल, प्रेम गाबा रामकुमार आर्य, आचार्य रामस्वरूप शास्त्री, मान सिंह पाठक, राजेंद्र आर्य, सुर्यदेव वेदांशु, झंडूराम आर्य, बलदेव राज नाशा, राधेश्याम आर्य, चिरंजीलाल राजपाल, रतन सिंह आर्य, ईश आर्य, नंदलाल चोपड़ा आदि उपस्थित रहे।

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