₹10,000 किराया, बेटी की फीस और जमीन की EMI... फिर भी 60 हजार कमाने वाली मेड कैसे कर लेती है बचत?
गुरुग्राम की एक घरेलू सहायिका अपनी ₹60,000 की कमाई से शानदार वित्तीय अनुशासन दिखाती हैं। बिना किसी ऐप या निवेश ...और पढ़ें

सांकेतिक तस्वीर एआई जनरेटेड
HighLights
घरेलू सहायिका की मासिक आय लगभग ₹60,000 है।
वह बेटी की पढ़ाई, घर खर्च और जमीन की ईएमआई संभालती हैं।
उनकी वित्तीय सोच जरूरतों को प्राथमिकता देने पर केंद्रित है।
जागरण संवाददाता, गुरुग्राम। आमतौर पर बेहतर कमाई के साथ जीवनशैली भी तेजी से बदलती जाती है। वेतन बढ़ता है तो खर्च बढ़ते हैं, नई सुविधाएं जुड़ती हैं और कई बार महीने के अंत तक यह समझना मुश्किल हो जाता है कि कमाई गई रकम आखिर गई कहां।
गुरुग्राम के एक मार्केटिंग प्रोफेशनल को अपनी घरेलू सहायिका से हुई बातचीत ने इसी सोच पर दोबारा विचार करने को मजबूर कर दिया।
गुरुग्राम निवासी मार्केटिंग प्रोफेशनल शिवा मित्तल के अनुसार, उनके घर काम करने वाली महिला करीब पांच से छह घरों में काम करती हैं और इससे लगभग 60 हजार रुपये महीने कमाती हैं। महीने में उनके तीन से चार दिन की छुट्टी रहती है।
किस बात ने मित्तल को किया सबसे प्रभावित?
मित्तल के मुताबिक, बातचीत में उनकी कमाई से ज्यादा जिस बात ने ध्यान खींचा, वह था पैसे को लेकर उनका अनुशासन। घरेलू सहायिका हर महीने करीब 10 हजार रुपये किराये के रूप में देती हैं।
इसके अलावा घर के रोजमर्रा के खर्च संभालने के साथ बेटी की निजी स्कूल की पढ़ाई का खर्च भी उठाती हैं। इतना ही नहीं, वह अपने गृह नगर में करीब छह लाख रुपये की जमीन के लिए ईएमआइ भी चुका रही हैं।
सबसे खास बात यह थी कि सीमित संसाधनों के बावजूद उनके खर्चों की प्राथमिकताएं स्पष्ट हैं। उनकी आर्थिक सोच किसी जटिल बजटिंग एप, निवेश फार्मूले या वित्तीय योजना पर आधारित नहीं, बल्कि जरूरत के मुताबिक खर्च करने और बाकी रकम बचाने पर केंद्रित है।
मित्तल ने बाद में इस बातचीत को लिंक्डइन पर साझा करते हुए इसे ज्यादातर लोगों के लिए ‘रियलिटी चेक’ बताया। उनका कहना है कि पैसे के मामले में घरेलू सहायिका की प्राथमिकताएं बेहद स्पष्ट हैं। पहले जरूरी खर्च, फिर भविष्य की जरूरतें और उसके बाद बचत।
कमाई बढ़ी तो बढ़ता गया खर्च, बचत फिर भी नहीं
मित्तल ने अपनी पोस्ट में कॉर्पोरेट क्षेत्र में काम करने वाले लोगों की आदतों से इसकी तुलना की। उन्होंने लिखा है कि अच्छी आय होने के बावजूद कई लोगों के खर्च धीरे-धीरे बढ़ते जाते हैं।
कार की नई ईएमआइ, महंगा फोन, बाहर से खाना मंगाना, ज्यादा घूमना या वेतन बढ़ने के साथ जीवनशैली को लगातार अपग्रेड करना आम बात है।
नतीजा यह होता है कि पर्याप्त कमाई के बावजूद महीने के अंत में बचत के लिए बहुत कम रकम बचती है। लोग व्यक्तिगत वित्त पर किताबें पढ़ते हैं, बजटिंग एप डाउनलोड करते हैं, निवेश की सलाह लेते हैं, लेकिन फिर भी खर्चों में छोटी-छोटी ‘लीकेज’ होती रहती हैं।
वित्तीय सुरक्षा न होने के बाद भी कर रहीं बचत
इसके विपरीत उनकी घरेलू सहायिका के पास कॉर्पोरेट कर्मचारियों जैसी वित्तीय सुरक्षा भी नहीं है। नियमित कर्मचारी लाभ, बीमा या नौकरी से जुड़ी अन्य सुविधाओं का सहारा न होने के बावजूद वह अपनी आय में से बेटी की शिक्षा, घर के खर्च और भविष्य के लिए जमीन जैसी प्राथमिकताओं को जगह दे रही हैं।
मित्तल के मुताबिक, बातचीत ने उन्हें यह सोचने पर मजबूर किया कि बचत केवल अधिक कमाने से नहीं होती, बल्कि यह तय करने से होती है कि पैसा कहां खर्च करना है और कहां नहीं।
