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271 करोड़ का फ्लैट, गगनचुंबी इमारतों की शान... ऐसे बंजर जमीन से देश की ‘लग्जरी सिटी’ बना गुरुग्राम

By Priyanka Dubey MehtaEdited By: Anup Tiwari
Published: Fri, 21 Aug 2026 07:49 PM (IST)Updated: Fri, 21 Aug 2026 08:08 PM (IST)

गुरुग्राम बंजर जमीन से लग्जरी मिलेनियम सिटी बना। गोल्फ कोर्स रोड के डीएलएफ फ्लैट अब 271 करोड़ तक बिक रहे हैं।

देश की ‘लग्जरी सिटी’ बना गुरुग्राम।

देश की ‘लग्जरी सिटी’ बना गुरुग्राम।

HighLights

  1. गुरुग्राम बंजर भूमि से वैश्विक आईटी-रियल एस्टेट ब्रांड बना।

  2. डीएलएफ 'द डहलियाज' में 271 करोड़ का लग्जरी फ्लैट बिका।

  3. शहर की गेटेड सोसायटीज ने उच्च जीवनशैली के मानक स्थापित किए।

प्रियंका दुबे मेहता, गुरुग्राम। गुरुग्राम शहर आज अपने आप में ब्रांड है, एक तरफ आइटी बीपीटी इंडस्ट्री ने इसे विश्व स्तर का दर्जा दिलवाया तो दूसरी ओर रियल एस्टेट क्षेत्र में इसकी साख बुलंदियां छू रही हैं। यहां के लक्जूरियस फ्लैट्स की कीमतें लगातार नए रिकार्ड धवस्त कर रही हैं।

हाल ही में डीएलएफ की सोसायटी द डहलियाज में बिके 271 करोड़ की लागत के फ्लैट ने एक बार फिर से शहर का चर्चा के केंद्र में खड़ा कर दिया है। क्या किसी ने सोचा होगा कि अवहेलना और अनदेखी का शिकार, गुमनामी के अंधेरे में बसा एक शहर आगे चलकर इतनी चमक बिखेरेगा कि पूरे देश की छवि रोशन कर देगा।

कभी दिल्ली के पास स्थित बंजर जमीन का एक टुकड़ा माना जाने वाला गुरुग्राम चहुंमुखी विकास की सीढ़ियां चढ़ता गया और देखते ही देखते, साइबर सिटी और फिर मिलेनियम सिटी बन गया।

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गोल्फकोर्स रोड पर चलते हुए इस बात का विश्वास ही नहीं होता कि हम गुरुग्राम में हैं। शहरों की भागदौड़ यहां भी है लेकिन संकरी गलियों और टूटी सड़कों पर नहीं बल्कि शांत, चौड़ी, सर्पीली राहों पर जिससे नीला आसामन भी दिखता है जमीन पर हरियाली भी।

यहां लग्जरी है, सड़कों के किनारे गगनचुंबी इमारतों की स्काईलाइन की चमक है, एक-दूसरे को टक्कर देते ऊंचे आपार्टमेंट्स की लग्जरी का अंदाजा उनके डिजाइन से हो जाता है। भले ही इस सड़क से लग्जरी अपार्टमेंट्स न दिखते हों लेकिन उनकी लक्जूरियस यहां की हवाओं में तैरती है।

यह सोसायटीज अपने आप में एक अलग शहर हैं, एक अलग दुनिया। यहां सब कुछ है, गोल्फकोर्स से लेकर पूल, क्लब से लेकर रेस्त्रां तक। यहां के लोगों को शहर की सर्दी-गर्मी का अहसास नहीं होता क्योंकि उन्हें लगता है कि वो एक खूबसूरत बुलबुले में रहते हैं।

शहर में इस तरह की परियोजनाओं की शुरुआत साल 2000 के बाद तेज हुई। एक के बाद एक लग्जरी सोसायटीज की होड़ लग गई। द सम्मिट, द पिनैकल, द आइकन के बाद  2005 में अरालियाज और 2006 में मैग्नोलियाज ने गोल्फकोर्स रोड को अल्ट्रा-लक्जरी आवासीय इलाके के रूप में पहचान दिलाई।

2007 में द बैलेयर और द पार्क के बाद कैमीलियाज ने इस इलाके की लक्जरी हाउसिंग को एक और ऊंचे स्तर पर पहुंचाया। अब जो 271 करोड़ के फ्लैट बिकने की बात आ रही है वह द डहलियाज की है, एक बेहद महंगा प्रोजेक्ट।

बड़े आकार के अपार्टमेंट, गोल्फकोर्स और अरावली के दृश्य, हरियाली, क्लब, फिटनेस और वेलनेस सुविधाएं, सुरक्षा और होटल जैसी व्यवस्था वाली यह सोसायटीज चित्ताकर्षक रूप लिए हुए हैं। अंदर दूर तक चलते जाइए और प्रकृति और आधुनिकता के अमलगम को देखते जाइए। जाते ही क्लब और उसके पीछे पूल, दूर तक फैली आधुनिकता की चमक और खुशमिजाज चेहरे।

बिना पहचाने भी अभिवादन करते दिख जाएंगे। गुरुग्राम के विकास की पहली नींव के साथ यह ट्रेंड सेटर था तो आज क्यों न हो।

गेटेड सोसायटी का कान्सेप्ट 1980 के दौर में भी गुरुग्राम ने ही दिया था तो आज अगर अपनी कीमतों के लिए इसके अपार्टमेंट्स सारे रिकार्ड ध्वस्त कर रहे हैं तो इसमें हैरानी नहीं होनी चाहिए। गुरुग्राम के रिहायशी विकास के बदलते लैंडस्केप को समझना है तो इसके अतीत के कैनवस पर जाना होगा।

एक बंजर जमीन का टुकड़ा बना कमाऊ पूत 

आज गुरुग्राम प्रदेश को सबसे ज्यादा राजस्व देने वाला कमाऊ पूत है लेकिन असलियत तो यही थी कि स्वतंत्रता के दशकों बाद भी एक भूली बिसरी बंजर जमीन का वह हिस्सा था जिसकी ओर सरकार का ध्यान ही नहीं गया।

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विकास आर्या ने अपनी पुस्तक गुड़गांव बिटवीन मैमरी एंड माडर्निटी में लिखा है कि दिल्ली को फ्लाईओवर्स मिल गए, फरीदाबाद को फैक्ट्रीज और नोएडा को प्लानर्स मिले लेकिन गुरुग्राम इस बीच  राजधानी के रसूख तले एक बंजर जमीन के टुकड़े की तरह दशकों पड़ा रहा।

हालांकि बाद में इसकी यही कमी इसको विशेषता बना गई। इंडस्ट्रीज लगाने के लिए बेहतर जगह और आबोहवा, दूर तक फैला खाली स्थान, अरावली की हरियाली और संभावनाएं बस पहचानने की देर थी। फिर क्या था, एक के बाद एक इंडस्ट्रीज, डेवलपर्स, विदेशी निवेशक मानो सम्मोहित होकर गुरुग्राम की तरफ खिंचे तले आए।

यूं बना गुरुग्राम प्लान 

डीएलएफ को गुरुग्राम लाने वाले केपी सिंह के एक संस्मरण का बार-बार भी जिक्र आता है। उनके अनुसार साल 1981 में एकबार वे अपने पहले प्लाट को देखने के लिए गुरुग्राम गए थे। उस समय भीषण गर्मी थी और वे सड़क के किनारे बैठे थे।

एक कार आकर उनके पास रुकी और उसमें से उतरे एक युवक ने बताया कि उसकी गाड़ी ओवरहीट हो गई थी और उसे एक बाल्टी पानी की जरूरत थी। उन्होंने तुरंत उसकी मदद की, वह पहचान गए थे कि युवक और कोई नहीं, तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बड़े बेटे राजीव गांधी थे।

इसी दौरान उनकी लंबी बातचीत हुई और गुड़गांव (अब गुरुग्राम) के प्लान पर चर्चा हुई। इस पर बात करने के लिए उन्होंने केपी सिंह को अपने आफिस बुलाया था और कहा था कि अरुण सिंह से मिलकर इसे आगे बढ़ाएं।

हालांकि वीना तलवार ने अपनी किताब में लिखा है कि इंदिरा गांधी ने पहले ही अरुण सिंह को इस प्लान का जिम्मा दिया था और उन्होंने केवल केपी सिंह ही नहीं, बल्कि कई बिल्डर्स को इसके लिए आमंत्रित किया था।

गुरुग्राम नहीं, दिल्ली के नाम से बेचीं कालोनी 

आज भले ही तमाम कालोनियां और मल्टी स्टोरी आपर्टमेंट्स गुरुग्राम की पहचान बन रहे हों लेकिन कभी इस शहर के नाम से प्लाट तक नहीं बिकते थे। अंसल और डीएलएफ जैसे डेवलपर इन प्लाट्स को दिल्ली के नामों तले बेचते थे।

शहर की पहले कालोनी बनी थी पालम विहार। गुड़गांव फ्राम मायथिक विलेज टू मिलनियम सिटी में वीना तलवार ने लिखा है कि इसका नाम इतिहास के उन पन्नों में ले जाता है जहां शाह आलम की सिकुड़ती सल्तनत के बारे में एक कहावत आम थी।

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सल्तनत-ए-शाह आलम, अज दिल्ली ता पालम...। सबसे दिलचस्प बात यह है कि शहर में जो पहली कालोनियां बनीं उन्हें दिल्ली का हिस्सा, उसका विस्तार बताकर बेचा गया। अंसल ने पालम एयरपोर्ट से नजदीकी को देखते हुए पालम विहार नाम दिया लोगों ने घर बुक किए तो दिल्ली का पालम समझकर।

ऐसे में डीएलएफ कहां पीछे रहने वाला था। इसने अपने पहले प्रोजेक्ट का नाम महरौली के कुतुब मीनार से मिलता जुलता रखा और इस तरह से शहर में पहली मल्टी स्टोरी सोसायटी कुतुब एन्क्लेव बनी।

वीना तलवार लिखती हैं कि उस दौर में लोग गुरुग्राम के नाम से इंवेस्ट करने में रुचि नहीं दिखाते थे तो बिल्डर्स ने ऐसे नाम रखे जो दिल्ली से मेल खाते हों। उन्होंने अपना संस्मरण लिखा है कि उन्हें खुद भी इस बात का अंदाजा और लोगों की तरह नहीं था कि पालम विहार का हिस्सा गुरुग्राम का है, उन्हें किसी जमीन मालिक ने बताया कि उनके परिवार ने अंसल को वह जमीन बेची है।

देशभर में छा गया गुरुग्राम की गेटेड सोसायटी का कॉन्सेप्ट 

अंसल और डीएलएफ, अगर इन दो डेवलपर्स ने शहर के रेजिडेंशियल सेक्टर को शुरू किया तो एक ऐसा भी डेवलपर था जो इस क्षेत्र में डिजाइन में एक क्रांति लेकर आया। हालांकि इसका नाम कम ही लिया जाता है लेकिन एक समय पर यह बदलाव और डिजाइनर क्रांति का प्रतीक बन गया था।

जब अंसल ने जमीन पास करवाई और उधर डीएलएफ अपनी तैयारी कर रहा था उसी समय एक और खिलाड़ी मैदान में आ गया था जिसके बारे में बहुत कम लोगों को जानकारी थी।

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हुआ यूं कि 1982 में जब डीएलएफ अपनी पूरी तैयारी में था उस वक्त एक बेहद छोटी कंपनी गुलमोहर एस्टेट यहां आई और उसने नाथूपुर गांव में 23 एकड़ जमीन में पश्चिमी शैली में एक गेटेड सोसायटी बनाई, गार्डन एस्टेट।

साउथ दिल्ली की पुरानी शैली की कालोनियों से बिलकुल अलग, एक अनूठी सोसायटी जो अपने जुदा डिजाइन के लिए जानी जाने लगी। फिर क्या था सोसायटियों का स्वरूप बदला और देशभर के डेवलपर्स ने इसका अनुसरण किया और अपने नक्शों के डिजाइंस बदलने लगे।

क्‍या कहते हैं साइबर सिटी के निवासी?

अरालियाज निवासी गोपा कुमार कहते हैं- 

मैं पिछले 15-16 वर्षों से इस खूबसूरत परिवेश में रह रही हूं और इतने साल बीत जाने के बावजूद मेरे घर और आसपास की खूबसूरती तथा चमक फीकी नहीं पड़ी है। सचमुच यहां अपने देश में रहते हुए विदेश में रहना का अनुभव मिलता है। साफ-सुथरा वातावरण, सुविधाएं और सभी व्यवस्थाएं हैं।

हमारे पास टहलने के लिए एक लीनियर पार्क है और मुझे नहीं लगता कि देश में इतनी खूबसूरत और बेहतरीन तरीके से रख-रखाव की गई जगह कोई और होगी। मेनिक्योर्ड लान, क्लब हाउस, रेस्त्रां के साथ-साथ स्पा, सैलून, स्विमिंग पूल, जिम और टेनिस कोर्ट जैसी तमाम सुविधाओं के साथ साथ निजता है। हमें गर्व होता है कि हम इस सोसायटी में रहते हैं। 

डीएलएफ फेज टू शालिनी कहती हैं- 

लगभग तीन दशकों तक गुरुग्राम में रहने और अपने शुरुआती वर्षों में प्रोफेशनली डीएलएफ से जुड़े होने के कारण, मैंने इस शहर को लगभग पहचान से परे बदलते देखा है। डीएलएफ ने इस बदलाव को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। न केवल स्काईलाइन को बदलकर बल्कि लोगों के गुरुग्राम में लक्जरी लिविंग को देखने के नजरिए को भी बदलकर।

द अरालियास', 'द मैगनोलियास' और अब 'द डहलियास' जैसे प्रोजेक्ट्स ने आर्किटेक्चर, लैंडस्केपिंग, रखरखाव, सुरक्षा के मापदंडों को काफी ऊंचा उठा दिया है। इन सोसायटीज में विदेशी शहर जैसा महसूस होता है।

शहर के अंदर सिंगापुर बसा है। यही वजह है जो रिकार्ड कीमतें देखने को मिल रही हैं, वे केवल क्षेत्रफल या लोकेशन की वजह से नहीं बल्कि उस इकोसिस्टम, बेहतरीन कान्सेप्ट और जीवनशैली के मूल्यों की वजह से हैं। 

 

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