एसडी जैन, मेवात : मेवात जिले के कस्बा नगीना निवासी साहित्यकार भगवान दास मोरवाल का नाम आज हिदी साहित्य के नामचीन उपन्यासकारों में शुमार हो चुके हैं। वो न केवल ¨हदी साहित्य को ऊंचा उठाने में अपना योगदान दे रहे हैं, बल्कि मेवात का नाम भी देश में रोशन कर रहे हैं। संघर्ष के प्रतीक केंद्रीय समाज कल्याण बोर्ड में उपनिदेशक के पद पर कार्यरत मोरवाल ने जीवन में बड़े उतार-चढ़ाव देखे हैं। गरीब खेतीहर मजदूर परिवार में जन्मे भगवानदास गरीबी और अभावों के दंश से जूझते हुए आज सफलता के जिस मुकाम पर हैं, उससे उनका जीवन और कार्य नई पीढ़ी के लिए मिसाल बन गया है। भगवानदास मोरवाल ने साहित्यिक सफर की शुरूआत कविताएं व विचार लिखने के शौक से की। एक साप्ताहिक अखबार मेवात में भी लेखन कार्य किया। उसके बाद वे कहानी लेखन व उपन्यासों की तरफ मुड़े। 1986 में पहला कहानी संग्रह सिला हुआ आदमी आया । 1992 में सूर्यास्त से पहल , और 1994 में अस्सी माडल उर्फ सूबेदार आया। इसके बाद सीढि़यां मा और उसका देवता, लक्ष्मण रेखा, दस प्रतिनिधि कहानियां संग्रह छपे। 1999 में काला पहाड़ उपन्यास राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित होते ही मोरवाल ने साहित्यिक जगत में अपनी एक अलग पहचान बना ली। इसके बाद 2004 में बाबूल तेरा देस में, 2008 में रेत व हाल ही में नरक मसीहा शीर्षक से उपन्यास प्रकाशित हुआ है।

पुरस्कार व सम्मान :

मोरवाल की रचनाओं पर दर्जनों विद्यार्थी पीएचडी व एमफिल कर रहे हैं। साहित्य जगत में मेवात की आंचलिक संस्कृति, सामाजिक ताने बाने व बोल-चाल को आधार बनाकर की कुछ रचनाओं के बाद विशिष्ट पहचान बना चुके मोरवाल को सर्वप्रथम सम्मान 1994 में पूर्व राष्ट्रपति आर वेंकटरमन के हाथों चेन्नई में मिला। उस समय के राजाजी सम्मान में 1100 रुपये नकद मिले। हिंदी अकादमी, दिल्ली सरकार से तीन बार पुरस्कृत व सम्मानित हुए। हरियाणा साहित्य अकादमी का एक लाख रुपये का जन कवि मेहर सिंह पुरस्कार मिला। रेत उपन्यास पर 2009 में लंदन केहाउस आफ कामंस में हुए एक समारोह में अंतर्राष्ट्रीय स्तर का 15वा यूके कथा सम्मान उनकी अनुपस्थिति में उनके एक प्रतिनिधि को प्रदान किया गया। रेत उपन्यास की खूब चर्चा रही। साहित्यिक संस्थाओं में पद : 2008 में इंडियन राइटर्स कांफ्रेंस में भारतीय प्रतिनिधिमंडल के सदस्य बनकर इटली के टयूरिन शहर में गए । दो बार हिंदी अकादमी दिल्ली व एक बार हिंदी साहित्य अकादमी हरियाणा के सदस्य रहे।

कलम पर विवाद भी झेले : पुरस्कार व सम्मान के अलावा उनकी झोली में जनता के कुछ वर्गो के बीच से विरोध झेलना पड़ा। अदालती केस भी आए । कंजर समुदाय को केंद्रीत करके लिखे उपन्यास रेत को कन्नौज के गरिया समुदाय ने अपनी अस्मिता के खिलाफ समझकर अदालत में मानहानि का दावा कर रखा है जिसकी तारीखें मोरवाल को भुगतनी पड़ती हैं।

क्या कहते है मोरवाल :

दैनिक जागरण कार्यालय में पहुंचकर जागरण संवाददाता से बातचीत में मोरवाल ने अपने जीवन के कई अनछुए पहलुओं को भी उजागर किया। उन्होंने कहा मैंने सफलताओं और विरोधों के बीच विचलित न होकर अपना कार्य जारी रखा है। मेवात की नई पीढ़ी को मेरा संदेश है कि अपने शौक को दबाओ मत और रोजी रोटी के संघर्ष के बीच शौक को सही दिशा में मेहनत के साथ तराशकर उसे अपना जुनून बना लोगे तो कामयाबी जरूर कदम चूमेगी।

प्रेमचंद जी रहे प्रेरक : मोरवाल ने बताया कि लड़कपन के दौरान नगीना निवासी जो अब गुड़गाव मे रह रहे रिटायर्ड हेडमास्टर प्रेमचंद आर्य प्रेरक रहे। जिनकी प्रेरणा से लेखन में रुझान बढ़ा। दिल्ली में मेहनत मजदूरी वाले संघर्ष भरे दिनों में मोहन सिंह पैलेस के काफी हाऊस जाकर कई नामचीन लेखकों के बीच समय बिताना भी बड़ा उपयोगी रहा।

शिक्षा : 10 वीं व 12 वीं में नगीना के राजकीय हायर सेकेंडरी स्कूल से पास करके बीए यासीन मेव डिग्री कालेज नूंह से की । राजस्थान विवि से हिंदी से एम ए और पत्रकारिता में डिप्लोमा किया। उर्दू भाषा का भी कोर्स किया ।

संघर्षमय रहा शुरूआती जीवन : बचपन गरीबी से भरा रहा। शादी जल्दी हो गई। बीए के बाद पत्‍‌नी व दो बच्चों सहित जीविका की तलाश में दिल्ली गए मगर 1981 से 1987 तक संघर्ष के दिन देखे। फैक्ट्री में मेहनत मजदूरी करके गुजारा किया। 1987 में महिला बाल विकास मंत्रालय से जुड़े केंद्रीय समाज कल्याण बोर्ड में क्लास थ्री पद पर नौकरी मिलने के बाद से जीविका जम गई और आज इसी विभाग में तरक्की करते हुए उपनिदेशक के राजपत्रित अधिकारी के पद पर आसीन है ।

शौक : बचपन से युवावस्था तक क्रिकेट और कविता दो शौक रहे हैं। परिवार : पत्‍‌नी व एक पुत्री और एक पुत्र। पुत्री मैय्या ने एमए हिंदी के बाद जेएनयू से पीएचडी करके पिता के पदचिह्नों पर चलकर साहित्य में हाथ आजमाने शुरू कर दिए।