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'बंटवारे में सब छूट गया, पर हिम्मत नहीं...', PAK से खाली हाथ आए परिवार ने परचून की दुकान से खड़ी कर दीं 2 फैक्ट्रियां

By Ajay MehtaEdited By: Prince Sharma
Published: Fri, 14 Aug 2026 02:07 PM (IST)

विभाजन के बाद पाकिस्तान से खाली हाथ आए लूणीदाराम के परिवार ने फतेहाबाद के भूना में एक छोटी परचून की दुकान से शुरुआत की।

तस्वीर एआई द्वारा जनरेट की गई है।

तस्वीर एआई द्वारा जनरेट की गई है।

HighLights

  1. पाकिस्तान से आकर भूना में परचून की दुकान से शुरुआत

  2. कारोबार बढ़कर कपड़े, आढ़त, पेट्रोल पंप और दो फैक्ट्रियों तक

  3. ज्ञान चंद परुथी दो बार सरपंच, एक बार जिला पार्षद रहे

अजय मेहता, फतेहाबाद। कबीरवाला से जान बचाकर भारत पहुंचे परुथी परिवार के पास न घर बचा था, न कारोवार और न ही भविष्य की कोई निश्चित राह। परिवार के मुखिया लूणीदाराम अपने तीन वर्षीय बेटे ज्ञान चंद और अन्य स्वजन को लेकर किसी तरह हिसार पहुंचे। विभाजन की हिंसा में सब कुछ पीछे छूट गया था।

सरकार से भूना में जमीन मिली तो परिवार ने यहीं नई जिंदगी शुरू की। उस समय भूना छोटा सा गांव था। रोजी रोटी के लिए लूणीदाराम ने छोटी परचून की दुकान खोली। यही दुकान आगे चलकर उस परिवार की आर्थिक पुनर्स्थापना की पहली सीढ़ी बनी।

छोटी दुकान से बड़े कारोबार तक बढ़ता गया सफर

ज्ञान चंद परुथी ने पिता के शुरू किए कारोबार को मेहनत और लगन से आगे बढ़ाया। परचून की दुकान से शुरू हुआ व्यापार धीरे-धीरे कपड़े के कारोबार तक पहुंचा और आज यह बड़े शोरूम का रूप ले चुका है। इसके बाद मंडी में आढ़त का कारोबार और पेट्रोल पंप शुरू किया गया।

परिवार ने कारोबार को एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रखा और आगे बढ़ते हुए दो फैक्ट्रियां खड़ी की। कभी खाली हाथ पहुंचे परिवार के लिए यह सफर केवल व्यापार बढ़ने की कहानी नहीं, बल्कि विभाजन के बाद अपनी आर्थिक जमीन दोबारा तैयार करने की यात्रा है।

कारोबार के साथ समाज में भी बनाई जगह

ज्ञान चंद परुथी ने व्यापार के साथ सामाजिक जिम्मेदारियां भी निभाई। ग्रामीणों ने वर्ष 1977 में उन्हें सरपंच चुना। उनके कार्यों पर भरोसा जताते हुए उन्हें दूसरी बार भी सरपंच की जिम्मेदारी मिली। वे एक बार जिला पार्षद भी रहे।

आज उनके बेटे और पोते परिवार के विभिन्न कारोबार संभाल रहे हैं। तीन साल की उम्र में विभाजन का दंश झेलने वाले ज्ञान चंद के परिवार की कई दशक लंबी यात्रा बताती है कि विस्थापन से उजड़ी जिंदगी को मेहनत, कौशल और पीढ़ियों के श्रम ने कैसे नई आर्थिक पहचान में बदल दिया।

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