जागरण संवाददाता, फतेहाबाद :

दुनिया मानती कि समाज को शिक्षित बनाती हूं। इसलिए नाम मिला शिक्षा। खुश थी। कारण कि सरकार ने मेरी सेहत की संवेदनाएं दिखाई थी। लेकिन नियति से मेरी खुशी शायद देखी नहीं गई। ऐसा कोरोना का काल-चक्र घूमा कि करीब सवा दो साल से दामन में दर्द ही दर्द..। दर्द महज कोरोना का ही नहीं। इस आफत की घड़ी में मेरी सुध लेने के प्रति सरकारी व्यवस्था की नीति व नीयत का भी। नीति ऐसी कि अनवरत प्रयोग की परखनली से बाहर निकल ही नहीं पाई..। कारगर उपचार की दरकार थी लेकिन अब तक दर्द से छटपटा रही है ..। दर्द भी एक नहीं, अनेक। सबसे तकलीफदेह यह कि जिन बच्चों से मेरा वजूद है, वही नदारद।

स्कूलों में 50 फीसद की उपस्थिति भी पूरी नहीं हो रही है। बच्चे नादान तो उनके माता-पिता अथवा अभिभावक भी जागरूकता से अनजान। मेरी सेहत सहेजने वाला विभाग कहता है जिसे स्कूल आकर पढ़ना है, वह आए और जो घर से पढ़ने के इच्छुक हों, वहीं आनलाइन पढ़ाई करें। है न मनमर्जी की बात..। मुझे सबल बानाने की जुगत की आनलाइन यदा-कदा ही आन रहती है। और मुझे साधने वाले उन गरीबों का क्या जिनके पास एंड्रायड नहीं है। बच्चों को मोबाइल का एडिक्ट बना दिया सो अलग। यह तो छोटी-सी बाधा है मेरी राह में..। मेरे अधिकारी आका कहते हैं कि महकमे ने यह परेशानी दूर कर दी है। भला हो उनका। लेकिन दर्द तो यह कि टीचिग-लर्निंग प्रोसेस ही टूटकर रह गई है। शिक्षक-विद्यार्थियों के बीच संवाद ही नहीं। परीक्षाओं की तो पूछो ही मत। सारे पप्पू भी पास। हरियाणा बोर्ड हो अथवा सीबीएसई 90 परसेंट से कम की बात ही बेमानी। शिक्षाविद देवेंद्र सिंह दहिया ने मुझसे पूछा-जब सबके 95 परसेंट तो बारहवीं के बाद क्या होगा। मैं अनुत्तरित हूं। हां दर्द जरूर बढ़ गया है इस वाजिब सवाल से। ऐसी अनेक व्याधियां हैं जिनके उपचार के लिए ठोस सुलझी नीयत के साथ ठोस नीति की दरकार है।

---------------------------------यह भी जानें

स्कूलों में कुल दाखिले हुए : 1,20, 617

छठी से बारहवीं तक हुए दाखिले : 67,988

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इसमें दो राय नहीं कि कोरोना काल में शिक्षा बेहद प्रभावित हुई है। बच्चों के साथ माता-पिता अथवा अभिभावकों में जागरूकता की जरूरत है। कारण कि सरकार शिक्षा को मजबूती दे रही है। हरसंभव प्रयास किये जा रहे हैं कि स्कूलिग पटरी पर लौटे। महकमा भी सतर्क है। - दयानंद सिहाग, जिला शिक्षा अधिकारी।

Edited By: Jagran