सूरजकुंड मेले में तीसरी बार हुआ झूला हादसा, बार-बार की लापरवाही के बाद भी नहीं चेते जिम्मेदार; सुरक्षा दावों पर सवाल
सूरजकुंड मेले में तीसरी बार झूले से हादसा हुआ है, जिससे सुरक्षा दावों पर सवाल उठ गए हैं। 2002 में ...और पढ़ें

हादसे के बाद टूटा पड़ा झूला और मेले परिसर में छाया सन्नाटा। जागरण

समय कम है?
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जागरण संवाददाता, फरीदाबाद। सूरजकुंड अंतरराष्ट्रीय हस्तशिल्प मेला में एक बार नहीं बल्कि दो बार पहले भी झूले की वजह से हादसे हो चुके हैं। इसमें एक व्यक्ति की जान भी चली गई थी। इसके बावजूद झूला लगाने के दौरान उचित मानकों एवं नियमों के अनुरूप झूला लगाने में कहीं न कहीं लापरवाही बरती जाती है और शनिवार को एक और जानलेवा हादसा हो ही गया। इससे मेला अधिकारियों के सुरक्षा उपायों को लेकर किए जा रहे दावों पर सवाल खड़े हो गए हैं।
आसान नहीं इस मेले में झूला लगाना
मेला में झूले लगाने के लिए हरियाणा पर्यटन विभाग और मेला प्राधिकरण की ओर से कड़े नियम की बात कही जाती है। चूंकि यह एक अंतरराष्ट्रीय स्तर का आयोजन है, इसलिए सुरक्षा और प्रक्रिया को बहुत गंभीरता से लिया जाता है। झूलों का आवंटन मुख्य रूप से ई-टेंडर के माध्यम से होता है। झूला लगाने से पहले झूलों की मजबूती और तकनीकी जांच के लिए मैकेनिकल इंजीनियर या संबंधित सरकारी एजेंसी की ओर से फिटनेस सर्टिफिकेट देना होता है।
आपातकालीन स्टाॅप बटन का होना अनिवार्य
अग्निशमन विभाग से एनओसी लेनी होती है। यह भी नियम होता है कि बिजली के कनेक्शन और वायरिंग की जांच विद्युत निरीक्षक द्वारा की जानी चाहिए। मेले में आने वाले दर्शकों की सुरक्षा के लिए झूला मालिक के पास थर्ड पार्टी इंश्योरेंस होना अनिवार्य है।
किसी भी दुर्घटना की स्थिति में मुआवजे की जिम्मेदारी संचालक की होती है। हर झूले के बाहर स्पष्ट रूप से ऊंचाई, आयु सीमा और सुरक्षा निर्देश (हिंदी और अंग्रेजी में) बोर्ड पर लिखे होने चाहिए। झूला क्षेत्र में प्राथमिक चिकित्सा किट और आपातकालीन स्टाॅप बटन का होना अनिवार्य है।
जांच में पता चलेगा कहां हुई गलती
मेला नोडल अधिकारी हरविंद्र सिंह यादव के अनुसार बताया कि जिला उपायुक्त कार्यालय की ओर से ही झूलों की जांच के लिए कमेटी बनाई जाती है। तकनीकी कमेटी झूलों का निरीक्षण झूलों के चलने से पहले और उसके बाद नियमित रूप से जांच करती है। अब अधिकारी दावा कर रहे हैं कि सभी आवश्यक नियमों का पालन किया गया, पर हादसा हो गया है तो यह जांच के बाद ही पता चलेगा कि किस स्तर पर चूक हुई है या कमी रह गई। इसके लिए कौन जिम्मेदार हैं।
प्रतिदिन झूले की जांच करने वाले नपेंगे
इस तरह से शनिवार शाम को हुए हादसे के बाद एक बार फिर से लोगों की सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं। हालांकि जिला उपायुक्त ने इस मामले की उच्च स्तरीय जांच कराने के लिए कहा है। लेकिन ऐसे अधिकारी कठघरे में आएंगे, जिनके जिम्मे प्रतिदिन झूला की जांच करनी होती थी।
2002 में हो गई थी मौत
सूरजकुंड मेले में झूला क्षेत्र में 2002 में झूले की वजह से एक युवक की मौत हो गई थी। उस समय कुछ साल के लिए यहां झूला लगाना बंद कर दिया गया था। इसके बाद 2019 में भी हादसा हुआ, जिसमें युवक घायल हो गया था तब भी यहां झूला लगाना बंद हो गया था। लेकिन कमाई के नजरिये से इसे प्रशासन ने फिर से शुरू करा दिया गया।
"हादसा बेहद दुखद है। झूला लगाने से पहले नियमों का पालन किया गया है। इसके लिए कमेटी का गठन किया गया था। कमेटी ने पूरी जांच के बाद ही अनुमति दी। वैसे मेला परिसर में लगाए गए झूले की प्रतिदिन जांच की जाती थी। इस मामले की उच्च स्तरीय जांच की जाएगी। जिसकी भी लापरवाही होगी, उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।"
-आयुष सिन्हा, जिला उपायुक्त
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