बिजलीकर्मियों की हड़ताल से दक्षिण हरियाणा बेहाल, कागजों में सिमटे दावे; 48 घंटे तक अंधेरे में रहने को मजबूर हुए लोग
दक्षिण हरियाणा में बिजलीकर्मियों की हड़ताल ने प्रशासनिक तैयारियों की पोल खोल दी है। लगभग 48 घंटे तक बिजली गुल ...और पढ़ें
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बिजली गुल होने से छाया अंधेरा, जागरण।
HighLights
बिजलीकर्मियों की हड़ताल से दक्षिण हरियाणा में 48 घंटे बिजली गुल।
प्रशासनिक दावे फेल, वैकल्पिक व्यवस्था न होने से जनता परेशान।
पानी की किल्लत, कारोबार ठप, जनरेटर पर करोड़ों का खर्च।
प्रवीन कौशिक, फरीदाबाद। बिजलीकर्मियों की हड़ताल ने दक्षिण हरियाणा में प्रशासनिक तैयारियों की ऐसी पोल खोली कि सरकारी दावों की रौशनी ही गुल हो गई।
हड़ताल से निपटने के लिए सतर्कता के दावे किए गए थे, जिला उपायुक्त की जिम्मेदारी तय की गई और व्यवस्था संभालने के भरोसे भी दिए गए, लेकिन बृहस्पतिवार और शुक्रवार को ये तमाम दावे जमीन पर दम तोड़ते नजर आए।
असरदार साबित हुई बिजलीकर्मियों की हड़ताल
पुलिसकर्मी मूकदर्शक बने रहे। वैकल्पिक स्टाफ नजर नहीं आया। इस वजह से बिजलीकर्मियों की हड़ताल असरदार साबित हुई और प्रशासनिक इंतजाम धरे रह गए।
जनता 48 घंटे तक बिजली के लिए परेशान होती रही, जबकि व्यवस्था संभालने का दावा करने वाला तंत्र बेबस दिखाई दिया। अहम बात यह भी रही कि बिजली निगम के कंट्रोल रूम से लेकर बड़े अधिकारियों ने फोन तक नहीं उठाए। यहां तक जिला उपायुक्त ने भी इस बारे में जवाब देना उचित नहीं समझा। उन्हें कई बार कॉल की गई और वाट्सएप मैसेज किए गए थे।
48 घंटा तक बिजली कटौती का संकट
हड़ताल से पहले प्रशासन की ओर से तैयारियों को लेकर जो तस्वीर पेश की गई थी, जमीनी हालात उससे बिल्कुल उलट रहे। फरीदाबाद से गुरुग्राम और पलवल से रेवाड़ी तक बिजली संकट ने लोगों की दिनचर्या बिगाड़ दी।
नूंह, नारनौल और सोनीपत समेत दक्षिण हरियाणा के विभिन्न इलाकों में लोगों को 24 से 48 घंटे तक बिजली कटौती का सामना करना पड़ा। घरों में पानी की किल्लत से लेकर कारोबार और औद्योगिक गतिविधियों तक पर असर पड़ा।
वैकल्पिक व्यवस्था पर उठे सवाल
ग्रेटर फरीदाबाद की सोसायटी में जनरेटरों का सहारा लेना पड़ा। कई जगह लोगों को बिजली आने का इंतजार करते हुए रात गुजारनी पड़ी। सवाल यह उठा कि जब हड़ताल की आशंका पहले से थी, तब वैकल्पिक व्यवस्था आखिर कहां थी।
बिजली व्यवस्था नहीं कर पाया प्रशासन
हड़ताल के दौरान जहां जाम लगा, वहां पुलिस पहुंची और लोगों को समझाकर यातायात सामान्य कराने का प्रयास किया। लेकिन बिजली आपूर्ति बहाल रखने के मामले में पुलिस के पास भी कोई ठोस विकल्प नहीं था।
पुलिस सड़क पर व्यवस्था संभाल सकती है, मगर बिजली व्यवस्था के लिए जरूरी तकनीकी इंतजाम और वैकल्पिक कर्मचारी उपलब्ध कराना प्रशासन की जिम्मेदारी थी।
कारोबार पर भी हड़ताल का असर
हड़ताल का असर केवल घरों तक सीमित नहीं रहा। उद्योगों और कारोबार को भी परेशानी उठानी पड़ी। जिन इकाइयों में उत्पादन बिजली पर निर्भर है, वहां कामकाज प्रभावित होने से आर्थिक नुकसान की आशंका बढ़ी। सोसायटी में दिन-रात जनरेटर चलने से डीजल की खपत और खर्च भी बढ़ा।
48 घंटे में दक्षिण हरियाणा की सोसायटी में दो करोड़ से अधिक का डीजल फूंक गया। आम उपभोक्ता के सामने सवाल था कि बिजली बिल भरने के बावजूद उसे बुनियादी सुविधा के लिए इतना इंतजार क्यों करना पड़ रहा है।
हालात देखकर लोगों के मन में यह सवाल भी उठा कि क्या प्रशासन ने हड़ताल के संभावित असर को गंभीरता से लिया था। हालांकि, हड़ताल को प्रशासनिक स्तर पर अंदरखाने सहयोग दिए जाने का कोई ठोस प्रमाण सामने आए बिना इसे तथ्य नहीं कहा जा सकता। मगर वैकल्पिक व्यवस्था की नाकामी ने संदेह और सवालों के लिए पर्याप्त जगह जरूर छोड़ दी है।
कागजों पर सतर्कता, जमीन पर बेबसी
बिजलीकर्मियों की हड़ताल ने साफ कर दिया कि संकट से निपटने की तैयारी केवल जिम्मेदारियां तय करने और दावे करने से पूरी नहीं होती। इसके लिए वैकल्पिक व्यवस्था, तकनीकी संसाधन और त्वरित कार्रवाई की जरूरत होती है।
बृहस्पतिवार और शुक्रवार के हालात में जनता को इन इंतजामों का लाभ मिलता नहीं दिखा। आमजनता के सामने केवल सड़क जाम करने के सिवाय और कोई विकल्प नहीं था।
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