संवाद सूत्र, ढिगावा मंडी: जीवन में तप के द्वारा ही कर्मों को गलाया जा सकता है। जिस प्रकार बर्तन के आलंबन से दूध गर्म होता है और अपने स्वरूप को प्राप्त हो जाता है। उसी प्रकार शरीर के द्वारा तपस्या कर आत्मा के साथ लगे हुए कर्म गल जाते हैं, छूट जाते हैं। कर्मों को अलग करने के लिए तपस्या जरूरी है। तपस्या के द्वारा ही मुक्ति प्राप्त की जा सकती है। दादी सती मंदिर खरकड़ी बावनवाली में वर्षों से रह रहे स्वामी सदानंद सरस्वती महाराज समय-समय पर तपस्या करते हैं कभी आग के धुनों से तो कभी खड़ी तपस्या करते हैं।

पिछले दिनों सिघानी गांव में गौ सेवक एव मंदिर के पुजारी और उसकी पत्नी पर जानलेवा हमला किया था जिसमें वह गंभीर रूप से घायल हो गया था और करीब 30 दिन बाद होश आया था अब वह ठीक होकर घर पर आया तो महाराज स्वामी सदानंद सरस्वती ने 7 दिन की कड़ी तपस्या शुरू कर दी है। उन्होंने उपस्थित समाज के लोगों को तपस्या का महत्व बताया। उन्होंने कहा तप्यते इति तप: यानि तो तपा जाए सो तप। तपसा निर्जरा च: यानि तप करने से कर्मों की निर्जरा होती है। ऋषि-मुनियों ने तप के द्वारा ही आत्म सिद्धी की प्राप्ति की है। तपस्या करके ही निर्वाण प्राप्त किया जा सकता है। भवनों के निर्वाण तो बहुत बात करा चुके। इस बात को समझने की आवश्यकता है और जीवन रूपी आचरण में उतारने की आवश्यकता है।

kumbh-mela-2021

शॉर्ट मे जानें सभी बड़ी खबरें और पायें ई-पेपर,ऑडियो न्यूज़,और अन्य सर्विस, डाउनलोड जागरण ऐप