अंशु शर्मा, अंबाला: गजरे की खुशबू को महकता छोड़ आया हूं, मेरी नन्हीं सी चिड़ियां को चहकता छोड़ आया हूं, मुझे छाती से अपनी तू लगा लेना ए भारत मां, मैं अपनी मां की बाहों को तरसता छोड़ आया हूं..यह पक्तियां भारत-पाक युद्ध में शहीद दीदार सिंह पर बिल्कुल सटीक बैठती है। 1971 के युद्ध में दीदार सिंह देश की सेवा और फर्ज निभाते हुए शहादत देकर फूल से बेटी, पत्नी व मां को छोड़ गए थे। विडंबना यह है कि अंबाला छावनी के टुंडली में जन्में दीदार सिंह के नाम से कोई गांव में निशानी नहीं है। पंचायत की सिफारिश तक प्रशासन ने अमल नहीं की गई। शहीद के नाम से न कोई स्कूल, चौराहा न ही कोई गेट बनाया गया। दैनिक जागरण से बात करते हुए शहीद की पत्नी प्रीतम कौर की आंखों से आंसू छलक पड़े। प्रीतम कौर आज भी गांव मे पति की प्रतिमा या उनके नाम से स्कूल या कोई गेट बनवाने की लड़ाई लड़ रही है। करीब 48 साल के बाद अब गांव में गौरव पट्ट बन रहा है।

गांव के युवा तक दीदार से अंजान

शादी के बाद सेना की 8 सिख लाइट रेजिमेंट में तैनात दीदार ने केवल चार साल ही सेवा की। 1971 में जैसे ही भारत-पाक युद्ध शुरू हुआ तो वह पंजाब के छंबजोड़ियों सेक्टर में दुश्मनों को खदेड़ते हुए शहीद हो गए थे। केवल दीदार सिंह की अस्थियां ही घर लौटी थी। कौर ने बताया कि पति की शहादत पर सम्मान के रूप में मिला तो केवल तीन हजार रुपये पेंशन और 26 जनवरी, 15 अगस्त पर शॉल और प्रशंसा पत्र। जिस गांव व शहर का नाम चमकाया वहां आज तक कोई सूचना पट्ट या फिर नामों निशान तक नहीं। सम्मान की लड़ाई में हारा परिवार

70 साल की उम्र में प्रीतम तौर करियाने की दुकान चलाकर परिवार का गुजर बसर कर रही हैं। प्रीतम कौर ने बताया कि जवान बेटे की मौत के गम में दीदार सिंह की मां पागल सुधबुध खो बैठी थी। कुछ समय बाद ही उनका देहांत हो गया। दीदार सिंह के छोटे भाई प्रेम सिंह का कहना था कि भले ही भाई देश के लिए शहादत देकर जीत चुका हो, लेकिन उनका परिवार सेना व प्रशासन से सम्मान पानी की लड़ाई में हार चुका है। ऐसा किसी शहीद के साथ नहीं होना चाहिए।

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Posted By: Jagran

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