जागरण संवाददाता, जगाधरी: दिव्य ज्योति जागृति संस्थान की ओर से हनुमान गेट आश्रम में आयोजित साप्ताहिक सत्संग हुआ। साध्वी सत्या भारती ने बताया कि समस्त संसार के लोग दु:ख से ग्रसित है। सांखय दर्शन के अनुसार दु:ख तीन प्रकार के होते हैं, यथा-आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक। अब सवाल यह है कि दु:ख है । दु:ख संस्कृत की दो धातुओं से मिलकर बना है। यथा- दु: और ख, यहां'दु:'नकारात्मक विचारों की ओर संकेत करता है और'ख'आकाश का बोधक है। यानी नकारात्मक विचारों का उठना। दूसरे शबदों में कहें तो दु:ख का मूल कारण हमारे मानसिक परिवेश में व्याप्त नकारात्मक विचार ही हैं। एक परिभाषा के मुताबिक हमारी मर्जी के मुताबिक कार्य न होना ही दु:ख है। जीव प्रतिकूल वेदनीय भाव को नहीं चाहता। वह अनुकूल वेदनीय भाव यानी सुख चाहता है। असल में, तृष्णा और दु:ख में कार्य-करण का संबंध है। जब-जब तृष्णा की पूर्ति में बाधा पड़ती है, तब-तब मनुष्य दु:खी होता है। संसार में जहां तीन प्रकार का दु:ख व्याप्त है, तो उसका निवारण भी अभिष्ट है। दु:ख केवल जीव को ही होता है, निगरुण पुरुष को दु:ख नहीं होता। जीव शरीर, अन्त:करण और प्राण का समाविष्ट रूप है। निगरुण पुरुष, गुणातीत यानी सत, रज, तम से मुक्त, आत्मा में स्थित पुरुष होता है। इसलिए वेदान्त कहता है कि अद्वैत की साधना करो अर्थात जहां दो नहीं हैं, एक ही है। यह एक है परमात्मा और उसी की साधना और आराधना से ही दु:ख की आत्यन्तिक निवृत्ति हो जाती है। परमात्मा की प्राप्ति होती है, आत्म-

साक्षात्कार से, यानी आत्मा को जानने से। यह ज्ञान पूर्ण ज्ञान सद्गुरु के द्वारा दिव्य दृष्टि यानी तीसरा नेत्र खुलने पर, विधिवत साधना के द्वारा ही हो सकता है। जीव को दु:ख निवारण के लिए पूर्ण सद्गुरू से तृतीय नेत्र को उद्घाटित करवाना है।

Posted By: Jagran

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