कुलदीप चहल, अंबाला

सोलह साल की उम्र में हरियाणवी सिनेमा में कदम रखने वाली रेखा का दमदार अभिनय आज भी लोगों के जहन में जिदा है। यह उस दौर की बात है, जब हरियाणवी सिनेमा की आहट हुई थी और धीरे-धीरे पांव पसारने शुरू किए। हरियाणवी सिनेमा में उस दौर में उषा शर्मा यानी चंद्रावल की धूम थी, साथ ही रेखा सरीन ने भी अपनी जगह सिल्वर स्क्रीन पर जमकर बनाई। एक के बाद एक करके छह फिल्मों में अपने अभिनय का लोहा मनवाया। उन्होंने चंद्रावल, छोटी साली, गुलाबो, के सुपने का जिकर करूं, लाडो बसंती और जर जोरू और जमीन जैसे फिल्मों में अभिनय किया। छोटी साली के लिए उनको हरियाणवी फिल्म फेस्टिवल में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार भी दिया गया। एक दौर ऐसा भी आया, जब घर की परिस्थितियां काफी बिगड़ गई। इस दौर में भी हिम्मत नहीं हारी, लेकिन अभिनय का क्षेत्र छोड़कर खेल एवं युवा कार्यक्रम विभाग में बतौर वाइसीओ तैनात हुईं और आज भी विभाग में अपनी जिम्मेदारी निभा रही हैं।

यह रहा उनका फिल्मी करियर

रेखा सरीन का फिल्मी सफर बेशक छोटा रहा, लेकिन अपनी कला को जॉब के जरिये जिदा रखे हुए हैं। साल 1982 के एशियन गेम्स में हरियाणवी नृत्य की प्रस्तुति दी जानी थी, तो उस में रेखा इसका नेतृत्व कर रहीं थीं। यहीं पर चंद्रावल के डायरेक्टर देवी शंकर प्रभाकर और उनके बेटे जयंत प्रभाकर और उषा शर्मा भी थे। जयंत ने उसे फिल्म में नृत्य के लिए मौका दिया। यहीं से उनके फिल्मी करियर की शुरुआत हुई और फिर उन्होंने एक के बाद एक हरियाणवी फिल्मों में अभिनय किया। उनके पिता पुलिस में थे और छह बहनों और एक भाई के परिवार में उस पर पिता का साया महज डेढ़ साल की उम्र तक ही रहा। उसकी मां ने रेखा को फिल्मों में जाने से मना नहीं किया। साल 1994 में संदीप सरीन से हुई शादी के अगले साल पहली बेटी तो साल 1997 में दूसरी बेटी ने जन्म लिया।

एक साल में इक्का दुक्का फिल्में आती हैं

रेखा सरीन ने बताया कि आज भी हरियाणवी सिनेमा में दमखम है और कई कलाकार हरियाणवी संस्कृति को आगे बढ़ा रहे हैं। अब तो हरियाणवी सिनेमा में एडवांस टेक्नोलॉजी भी इस्तेमाल की जाती है। हर साल में इक्का-दुक्का हरियाणवी फिल्में आ जाती हैं, लेकिन प्रचार के अभाव में इनके बारे में पता नहीं चल पाता।

अंबाला को युवा उत्सव में बनाया स्टेट चैंपियन

सरीन ने 1989 में खेल एवं युवा कार्यक्रम विभाग में बतौर वाइसीओ के पद पर ज्वाइन किया। यहीं से युवा महोत्सव के तहत आने वाले कलाकारों का हौसला भी बढ़ाया। बीते कई सालों से अंबाला की टीम स्टेट चैंपियन बनती जा रही है। अंबाला में आज भी कलाकारों की कमी नहीं है, जो हरियाणवी फिल्मों में अपनी जगह बना सकते हैं। जरूरत है ऐसे कलाकारों का उत्साह बढ़ाने की। उम्मीद है कि हरियाणवी सिनेमा एक बार फिर से अपना मुकाम हासिल जरूर करेगा।

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Posted By: Jagran