नई दिल्ली, जेएनएन। सुशांत सिंह राजपूत और रिया चक्रवर्ती जैसे मामलों को लेकर इन दिनों सोशल मीडिया का माहौल काफ़ी गर्म रहता है। आपने भी महसूस किया होगा कि फेसबुक, ट्विटर जैसे प्लेटफॉर्म्स पर ज़रूरत से अधिक मौजूदगी अक्सर अनचाहे मानसिक तनाव को आमंत्रित करती है। लेकिन अगर आपको यह पता चले कि  किसी घटना विशेष को लेकर आप जो प्रतिक्रिया दे रहे हैं, कहीं ना कहीं उसके लिए आपको तकनीक द्वारा मजबूर किया जा रहा है तो ज़ाहिर है यक़ीन नहीं होगा। अगर ऐसा है तो फिर नेटफ्लिक्स पर पिछले हफ़्ते रिलीज़ हुई अंग्रेजी डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म 'द सोशल डिलेमा' (The Social Dilemma) आप ही के लिए है।

इसी कारण डेढ़ घंटे की इस डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म की सोशल मीडिया में काफ़ी चर्चा हो रही है। इन चर्चाओं से यह सवाल उठना लाज़िमी है कि आख़िर 'द सोशल डिलेमा' में ऐसा क्या दिखाया गया है कि गीतकार-कलाकार स्वानंद किरकिरे से लेकर फ़रहान अख़्तर और आलिया भट्ट की बहन शाहीन भट्ट तक इसको लेकर सोशल मीडिया में पोस्ट कर रहे हैं। फ़िल्म भारत में रिलीज़ के साथ ही सबसे अधिक देखी जाने वाली फ़िल्मों में शामिल हो गयी है। फ़िलहाल नेटफ्लिक्स पर यह टॉप 10 फ़िल्मों में पहले नंबर पर है। 

सोशल मीडिया का खेल समझना बहुत ज़रूरी

स्वानंद किरकिरे ने 14 सितम्बर को हिंदी दिवस के मौक़े पर डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म को लेकर लिखा था- ''मैं नेटफ्लिक्स से गुज़ारिश करता हूं कि 'द सोशल डिलेमा' को हिंदी और सम्भव हो तो हरेक भारतीय भाषा में डब करे। या कम से कम सबटाइटल्स ही शुरू कर दे। हम भारतीयों के लिए यह सोशल मीडिया का खेल समझना बहुत ज़रूरी है।'' इसके बाद स्वानंद कोष्ठक में फ़िल्म को देखने की गुज़ारिश भी करते हैं।

स्वानंद के इस ट्वीट को रीट्वीट करके एक्टर अली फ़ज़ल ने लिखा- ''मुझे यक़ीन है कि हममें से कुछ आर्टिस्ट इस डॉक्यूमेंट्री को विभिन्न भाषाओं में आवाज़ देने के लिए तैयार होंगे। यह एक अच्छा विचार है। ज़रूर किया जाना चाहिए।''

इससे पहले 13 सितम्बर को फ़रहान अख़्तर ने भी 'द सोशल डिलेमा' को लेकर लिखा था- ''आज आप कुछ भी करें, कृपया नेटफ्लिक्स पर द सोशल डिलेमा को देखने की फुर्सत ज़रूर निकाल लीजिए।'' 

आलिया की बहन शाहीन भट्ट ने तो बाकायदा आठ नियमों की एक सूची बना ली, जिसका वो पालन करने वाली हैं। इन नियमों के मुताबिक, शाहीन उठते ही फोन को नहीं उठातीं। उन्होंने सभी चैट ग्रुप के नोटिफिकेशन बंद कर दिये हैं। फोन को एक कमरे से दूसरे कमरे में नहीं ले जातीं। फोन को वहां चार्ज करती हैं, जहां बैठकर इस्तेमाल नहीं कर सकतीं। जिन एप्स का इस्तेमाल नहीं करतीं, उन्हें हटा दिया है। फोन की बैकग्राउंड ग्रे रंग की कर दी है। कुछ पोस्ट करने के बाद फोन नहीं देखतीं। 45 मिनट की समय सीमा कर दी है और इसका पालन करती हैं। 

सोशल मीडिया की डार्क साइड दिखाती है 'द सोशल डिलेमा' 

'द सोशल डिलेमा', सोशल मीडिया का लोगों पर प्रभाव के बारे में बात करती है। डॉक्यूमेंट्री बताती है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स काम करते हैं और यूज़र्स को अपने फायदे के लिए भ्रमित भी करते हैं। द सोशल डिलेमा इन माध्यमों के बिजनेस ढांचे की पोल भी खोलती है कि कैसे डाटा कलेक्शन के ज़रिए विज्ञापनों को टारगेट किया जाता है। यह सोशल मीडिया की डार्क साइड को पूरे खुलेपन से सामने रखती है।

द सोशल डिलेमा बताती है कि यूज़र के मनोविज्ञान को पढ़ने और समझने के लिए इंजीनियर्स की पूरी एक टीम तैयार रहती है। कुछ वास्तविक घटनाओं के संदर्भ में भी सोशल मीडिया के खेल को उजागर किया गया है। द सोशल डिलेमा में लोगों के इंटरव्यूज़ के साथ कुछ काल्पनिक किरदारों को कहानी में पिरोया गया है। इसका निर्देशन जेफ ओरलोक्सी ने किया है।

चेतावनी है 'द सोशल डिलेमा'

द सोशल डिलेमा को लेकर लोगों की जो प्रतिक्रियाएं आ रही हैं, उनमें कोई इसे हॉरर फ़िल्म बता रहा है। कोई इसे एक चेतावनी कह रहा है। डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म को लेकर कुछ प्रतिक्रियाएं-

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