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The Vvaan Review: छठी मैया की भक्ति और जंगल के रहस्य में उलझी 'द वन', 'पंचायत' के डायरेक्टर ने बनाया 'डेली सोप'

Published: Fri, 25 Sep 2026 02:14 PM (IST)

सिनेमाघरों में सिद्धार्थ मल्होत्रा और तमन्ना भाटिया की फिल्म 'द वन: फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट' (The Vvaan Review) रिलीज हो ...और पढ़ें

रहस्यों में ही उलझकर रह गई 'द वन'

रहस्यों में ही उलझकर रह गई 'द वन'

HighLights

  1. छठी मैया और वन देवी की कहानी में उलझी फिल्म

  2. दीपक कुमार मिश्रा ने डायरेक्ट की फिल्म

  3. क्या वाकई में देखने लायक है द वन?

अंकित सिंह तोमर, नई दिल्ली। हमारी दादी-नानी कहानियां सुनाया करती थीं कि एक देवी थीं जो सबकी रक्षा करती थीं लेकिन एक दैत्य भी था, जो लोगों को मार देता था। बस यही से शुरू हुआ है इस हफ्ते सिनेमाघरों में आई फिल्म 'द वन: फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट' का कॉन्सेप्ट।

भारतीय लोककथाओं, पौराणिक मान्यताओं पर फिल्म बनाने की कोशिश शानदार की गई, लेकिन क्या ये फिल्म वाकई में उतनी अच्छी है कि इसे देखने के लिए आपको अपनी जेब ढीली करनी चाहिए? आइए जानते हैं इस रिव्यू में...

क्या है फिल्म की कहानी? 

'द वन' मॉर्डन हॉरर-कॉमेडी-मायथोलॉजी के कलेवर को एक साथ पिरोने की कोशिश करती है, लेकिन अफसोस कि ये सिर्फ स्क्रिप्ट तक ही सीमित रह जाती है। मेकर्स ने छठी मैया की महिमा और वन देवी के रहस्य को एक साथ जोड़कर दर्शकों को लुभाने का बड़ा दांव खेला था, लेकिन कमजोर निर्देशन और ढीले एग्जीक्यूशन की वजह से फिल्म बुरी तरह डगमगा जाती है। फिल्म की कहानी शुरू होती है मुंबई से जहां, ऋषि (सिद्धार्थ मल्होत्रा) अपनी पत्नी ममता (तमन्ना भाटिया) के साथ रहते हैं। दोनों माता-पिता बनने की उम्मीद में हैं, तभी अचानक उनके भाई (अनूप सोनी) का फोन आता है कि जमीन को लेकर फैसले करने हैं।

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वनदेवी के जंगल के अंदर से सड़क बनाने की बात की जा रही है और जमीन बेचनी है और उसे आना होगा। ऋषि देवी-देवताओं में विश्वास नहीं रखता है लेकिन कैसे भी करके ममता अपने पति ऋषि को छठ मनाने के लिए राजी करती है और दोनों गांव यानि देवांचल आ जाते हैं। ऋषि के साथ यहां उसका दोस्त वी.पी (मनीष पॉल) भी आता है। अब सभी गांव आ जाते हैं तो यहां लालच का खेल चल रहा होता है। इस खेल में शामिल होते हैं फिल्म के असली विलेन दीपक (सुनील ग्रोवर)।

ऋषि को छठी मैया और वन देवी में विश्वास नहीं है और वह भी दीप के साथ मिलकर गांव में विकास करने की बात करता है। उसकी इन बातों से उसकी भाभी सुशीला (श्वेता तिवारी) उसे नापसंद करती हैं। मान्यता है कि वन देवी के जंगल में रात को जो जाता है, वो वापस लौटकर नहीं आता है। सालों से गांववाले इस परंपरा को निभाते आ रहे हैं। अब विकास और आस्था के बीच तगड़ी टक्कर होती है और फिर ऋषि उसी वनदेवी के जंगल में जाता है।

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बस यहीं से फिल्म में आते हैं कई ट्विस्ट एंड टर्न्स। एक तरफ फिल्म में वनदेवी और जंगल की कहानी चल रही होती है, तो दूसरी छठी मैया और आस्था का अध्याय फिल्म में नजर आता है। फिल्म के फर्स्ट हाफ में कहानी बनती है, लेकिन फिल्म के दूसरे पार्ट में फिल्म की कहानी जंगल के रहस्य और आस्था के बीच अटक सी जाती है।

बार-बार नए ट्विस्ट एंड टर्न्स आते हैं, कहानी में ठहराव की कमी होती है। वन देवी के कॉन्सेप्ट के बीच छठी मैया की आस्था को भी सही ढंग से पेश नहीं किया जाता है। वहीं क्लाईमैक्स से जो भी उम्मीदें थीं, वो भी बिखर जाती हैं।

कैसा है फिल्म का निर्देशन? 

इस फिल्म को बनाने की जिम्मेदारी आई पंचायत जैसी हिट सीरीज बनाने वाले दीपक कुमार मिश्रा के कंधों पर। दीपक ने इससे पहले पंचायत जैसी शानदार सीरीज बनाई, लेकिन द वन में उनके निर्देशन में खामियां नजर आती हैं। ऐसा लगता है कि मानो शायद वो निर्देशन में कई कहानियों को जोड़ने के चक्कर में फीके पड़ गए। एक तरफ जमीन का मामला, दूसरी तरफ वन देवी की कहानी, तीसरी तरफ छठी मैया की आस्था, चौथी तरफ पारिवारिक कलेश और इस सबसे बीच में आती हल्की-फुल्की कॉमेडी।

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ऐसा लगता है कि जैसे सबकुछ एक साथ मिलाने की कोशिश की गई है। ना तो इधर की कहानी रहती है और ना ही उधर की। भक्ति और आस्था के बीच हॉरर-कॉमेडी का तड़का बेजोड़ लगता है। कई बार तो कहानी टीवी सीरियल जैसा फील देती है। फिल्म के बीच में आने वाले गाने बेवजह ही लगते हैं।

सबसे बड़ी बात यह थी कि जिस छठ के त्योहार को इतनी धूमधाम से मनाया जाता है उसे महज शायद कहानी में दिखाने के लिए ही इस्तेमाल किया गया। बिहार की पृष्ठभूमि और वहां के रंग-ढंग को भी सही से नहीं दिखाया गया। हालांकि जिस तरह से फिल्म की कहानी का कॉन्सेप्ट था, वो अच्छा था पर शायद कहानी पर्दे पर आते-आते कमजोर पड़ गई और यही डायरेक्शन में दिखा।

कैसा है सितारों का काम? 

वहीं फिल्म के किरदारों की बात करें तो सिद्धार्थ मल्होत्रा (Siddharth Malhotra) शहरी लड़के के रूप में सही लगते हैं, लेकिन कई बार जब वो गांववालों के साथ खुद को ढालने की कोशिश करते हैं, वहां वो चूकते हुए नजर आते हैं। इमोशनल सीन्स में सिद्धार्थ की पकड़ थोड़ी कमजोर सी नजर आती है। हालांकि उनका एक्शन और तमन्ना के साथ केमिस्ट्री अच्छी लगती है। वहीं तमन्ना भाटिया के किरदार को कहानी के हिसाब से सही नहीं ढाला गया।

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तमन्ना (Tamannah Bhatia) के पास फिल्म में सिवाय छठी मैया (Chhathi Maiya) के व्रत्त को करने के अलावा कुछ और खास नहीं था। हालांकि भावनात्मक सीन्स में वो सहज दिखती हैं। फिल्म में खलनायक के किरदार की भूमिक सुनील ग्रोवर ने निभाई है। सुनील ग्रोवर निगेटिव किरदार में अच्छे तो लगते हैं, लेकिन बहुत ज्यादा प्रभावी नहीं दिखते। ना ऐसा दिखता है कि उन्हें देखकर शायद कोई डर जाए। अनूप सोनी भी सिद्धार्थ के बड़े भाई के किरदार में ठीक ही रहे हैं।

वहीं मनीष पॉल (Maniesh Paul) की कॉमेडी फिल्म में जान तो डालती है, लेकिन बार-बार एक जैसी कॉमेडी और सीन्स थोड़े ऊबाऊ लगते हैं। श्वेता तिवारी ने फिल्म में अच्छा काम किया है। श्वेता के किरदार में वो संजीदगी दिखती है, लेकिन श्वेता की झोली में महज सीमित किरदार ही आया। मिलिंद गुणाजी पंडित के किरदार में होते हैं, जो महज कुछ ही पलों के लिए स्क्रीन पर दिखते हैं।

क्या हैं कमियां और खूबियां?

एकता कपूर (Ekta Kapoor) के बालाजी मोशन पिक्चर्स और टीवीएफ मोशन पिक्चर्स ने इस फिल्म को मिलकर प्रोड्यूस किया है। फिल्म से एकता जुड़ी हैं, तो जाहिर है उनके एलिमेंट्स फिल्म में नजर आए हैं। अरुणाभ कुमार ने इस फिल्म को लेकर लिखा है। फिल्म की कहानी का आइडिया उन्हीं का है। अब TVF ने पहले ही पंचायत (Panchayat), एस्पिरेंट्स और गुल्लक समेत कई शानदार फिल्में-सीरीज बनाई हैं। ऐसे में दर्शकों की उम्मीदें और ज्यादा हो गईं, लेकिन इन उम्मीदों पर इस बार पानी फिर गया।

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फिल्म (The Vvaan Movie Review) की नींव एक बहुत ही दिलचस्प कांसेप्ट पर रखी गई, छठी मैया का पावन पर्व, उनकी महिमा और जंगल के भीतर छिपे वन देवी के अलौकिक रहस्य। मेकर्स के पास अपनी बात कहने का एक अच्छा मौका था, लेकिन जैसे ही कहानी शहर से निकलकर गहरे जंगलों में दाखिल होती है, स्क्रिनप्ले डगमगा जाता है। कहानी में एक साथ 'दो देवियों' के ट्रैक को चलाने की कोशिश की गई है, जो सुलझने के बजाय दर्शकों को भ्रमित कर देती है।

दर्शक समझ ही नहीं पाते कि उन्हें भक्ति और आस्था के भाव से जुड़ना है या जंगल के रहस्य से। कहानी जंगल के रास्तों की तरह खुद भी इतनी उलझ जाती है कि अंत तक पहुंचते-पहुंचते इसका मुख्य उद्देश्य ही खो जाता है। किसी भी माइथोलॉजिकल या फैंटेसी-थ्रिलर फिल्म की रीढ़ उसका एग्जीक्यूशन होता है। 'द वन' में वन देवी की कथा कहने का आइडिया यकीनन नया और सराहनीय था, लेकिन पर्दे पर उतरते-उतरते फिल्म अपना मूल उद्देश्य खो गई।

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कई जगहों पर फिल्म की एडिटिंग बेहद लाचार नजर आती है। सीन एक-दूसरे से ठीक तरह से कनेक्ट नहीं होते, जिससे 3 घंटे की यह फिल्म देखने में किसी लंबे और उबाऊ 'डेली सोप' जैसा अहसास कराती है। ऐसा लगता है मानो एकता कपूर के किसी टीवी सीरियल का बजट बढ़ाकर उसे सिनेमाघर में रिलीज कर दिया गया हो। हालांकि फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर कई जगहों पर अच्छा लगता है।

देखें या नहीं देखें?

अगर आप कोई नई कहानी देखना चाहते हैं तो जरूर आप सिनेमाघरों का रुख कर सकते हैं। छठी मैया का नाम और आस्था का एंगल भुनाने की कोशिश की गई, लेकिन मजबूत पटकथा और शार्प डायरेक्शन के बिना फिल्म ताश के पत्तों की तरह ढह गई, तो अगर आप नई फैंटेसी ड्रामा देखने के लिए जा रहे हैं, तो शायद आपके हाथों निराशा लग सकती है।

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