The Revolutionaries Review: सीरीज में चमके Bhuvan Bam, रोंगटे खड़े कर देगी 4 क्रांतिकारियों के 'गदर' की कहानी
The Revolutionaries Review: भुवन बाम, रोहित सराफ, प्रतीभा रांटा, गुरफतेह सिंह पीरजादा जैसे कलाकारों से सजी वेब सीरीज द रिवोल्यूशनरीज प्राइम वीडियो पर रिलीज हो गई है। यहां पढ़ें रिव्यू-
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प्राइम वीडियो सीरीज द रिवोल्यूशनरीज रिव्यू
HighLights
प्राइम वीडियो सीरीज द रिवोल्यूशनरीज रिव्यू
प्राइम वीडियो पर रिलीज हुई सीरीज
संजीव सान्याल की बुक पर आधारित है मूवी
एकता गुप्ता, नई दिल्ली। भारत के एक ऐसे क्रांतिकारी जिन्होंने ब्रिटीश राज में अंग्रेजों की नाक के नीचे कई हमले किए, कई युवाओं को देश की आजादी के लिए क्रांतिकारी बनने की प्रेरणा दी और कभी भी अंग्रेजों के हाथ ना लगे। इतना ही नहीं जब देश में रहकर उनका क्रांति करना मुश्किल हो गया तो उन्होंने विदेश में रहकर भारत की आजादी के लिए लड़ाई लड़ी।
ऐसे महान क्रांतिकारी थे रास बिहारी बोस जिनके किरदार को केंद्र में रखकर सीरीज बनाई गई है- द रिवोल्यूशनरीज (The Revolutionaries)। जिसमें भुवन बाम ने रास बिहारी बोस, रोहित सराफ ने सचिंद्रनाथ सान्याल, प्रतीभा रांटा ने प्रतीभा लाहिरी, गुरफतेह पीरजादा ने बाघा जतिन और जेसन शाह ने जनरल डायर की भूमिका निभाई है।

क्या है सीरीज की कहानी?
सीरीज की कहानी संजीव सान्याल की नॉन फिक्शनल किताब रिवोल्यूशनरीज: द अदर स्टोरी ऑफ हाउ इंडिया वन इट्स फ्रीडम (Revolutionaries: The Other Story Of How India Won It's Freedom) पर आधारित है। नाम की ही तरह फिल्म में उन स्वतंत्रता सैनानियों की कहानी दिखाई गई है जिन्हें ब्रिटिश राज ने आतंकवादी तक करार दे दिया था क्योंकि वे उनके खिलाफ आजादी की लड़ाई लड़ रहे थे।
कहानी की शुरुआत रास बिहारी बोस बने भुवन बाम के किरदार से शुरु होती है जो अंग्रेजों को देश से खदेड़कर भारत वासियों के लिए एक आजाद वतन चाहते हैं। बोस अंग्रेजों को इतनी बार चमका दे चुके हैं कि वे अब मोस्ट वॉन्टेड क्रिमिनल बन चुके हैं और ब्रिटीश हुकूमत उन्हें अपना पूरा जोर लगाकर ढूंढती है।
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लेकिन बोस का साथ देने वाले लोग देश के बड़े और मुख्य शहरों में फेले हुए हैं जिनमें बनारस, कलकत्ता, देहरादून और अमृतसर शामिल हैं। जहां जाकर बोस छुप सकते हैं, इस बीच उनकी मुलाकात सचिंद्रनाथ सान्याल से होती है जो उनकी ही तरह क्रांतिकारी बनना चाहते हैं और परिवार छोड़कर उनके साथ हो लेते हैं वहीं जतिन बाघा जिनका किरदार गुरफतेह पीरजादा ने निभाया है, उन्हें कलकत्ता में मिलते हैं और फिर तीनों मिलकर अंग्रेजों पर हमला करने और उनके हथियार चुराने की साजिश रचते हैं।
लेकिन इन सबके बीच कई बेगुनाहों की हत्या होती है, अपने ही लोगों से धोखा मिलने से कई हमले असफल होने के बाद सान्याल और जतिन भी मोस्ट वॉन्टेड बन जाते हैं और अंग्रेजों से लड़ाई और भी ज्यादा गंभीर रूप ले लेती है। क्योंकि जनरल डायर हाथ धोकर तीनों के पीछे पड़ जाता है।
डायरेक्शन
'फ्रीडम ऑफ मिडनाइट' जैसी सधी हुई सीरीज बनाने वाले निखिल आडवाणी (Nikhil Advani) ने इस सीरीज का निर्देशन किया है। हिस्टोरिकल पीरियड ड्रामा में क्रांतिकारियों की निजी जिंदगी को भी जोड़ा गया है। जिसमें रोहित और प्रतीभा के किरदारों के बीच एक चंचल और गंभीर प्रेम कहानी सधे हुए तरीके से दिखाई गई है।
सीरीज को देश के अलग-अलग शहरों में फिल्माया गया है जिनमें वाराणसी, कोलकाता, अमृतसर शामिल हैं। 1912 के दौर के दिल्ली और बाकी शहरों को बखूबी बनाया गया है जिससे उस दौर से बेहतर तरीके जुड़ाव बन पाता है।
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वहीं कहानी में एक के बाद एक होने वाली घटनाएं और साथ में चल रही निजी जिंदगियों को खूबसूरत तरीके से जोड़ा गया है।
हां, फ्रीडम एट मिडनाइट वाली बात इस सीरीज में देखने को नहीं मिलेगी। अगर देखा जाए तो दोनों का विषय और वक्त अलग था इसीलिए उस तरह की अपेक्षा रखे बिना सीरीज को देखना बेहतर होगा।
एक्टिंग
सीरीज में नजर आए 4 लीड युवा कलाकारों ने शानदार काम किया है। रास बिहारी बोस (Rash Behari Bose) के किरदार में भुवन बाम (Bhuvan Bam) जंचे हैं। भुवन का गंभीर अभिनय और फेस एक्सप्रेशन बिना डायलॉग के भी बहुत कुछ कह जाते हैं।

वहीं जतिन बाघा का किरदार पीरजादा ने अच्छे से निभाया है। रोहित सराफ (Rohit Saraf) की चॉकलेटी बॉय वाली छवि को प्रतीभा के साथ लव एंगल दिखाने में अच्छे से इस्तेमाल किया गया है वहीं उन्होंने एक क्रांतिकारी का किरदार भी बेहतर तरीके से निभाया है।
साइड कैरेक्टर्स ने अपना काम बेहद गंभीरता से किया है। जेसन शाह ने हकलाने वाले जनरल डायर को बखूबी पर्दे पर उतारा है। एक अंग्रेज के किरदार में आपको उनसे नफरत होने लगती है और यही नेगेटिव किरदार की खूबी है। पाउली दाम ने छोटा लेकिन यादगार और इंटेंस किरदार निभाया है। कुल मिलाकार कलाकारों का काम सीरीज में अच्छा रहा।
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क्या है खूबियां?
हिस्टोरिकली लोकेशंस को बेहतर तरीके से दिखाया गया है, सीरीज देखते वक्त आप उस दौर की दुनिया में जीते हैं।
डायरेक्टर और कलाकारों ने बेहतरीन काम किया है। कहानी में क्रांति और निजी पहलू होने के बावजूद कंफ्यूजन नहीं है।
रास बिहारी बोस के किरदार को केंद्र में रखते हुए अन्य क्रांतिकारियों की जिंदगी को भी बखूबी दिखाया गया है। खासकर महिलाओं का इस क्रांति में क्या योगदान था यह देखकर आपके रोंगटे भी खड़े हो जाएंगे और गर्व भी महसूस होगा।
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1911 के बाद दिल्ली के राजधानी बनने के सेलिब्रेशन में बम फोड़ने की घटना से लेकर रास बिहारी बोस के भारत से बाहर जाने तक की घटना सीरीज में दिखाई गई है। इस बीच सचिंद्रनाथ सान्याल और बाघा जतिन की कहानियां भी सीरीज में दिखाई गई हैं लेकिन कड़ी कहीं भी टूटती नहीं है।
8 एपिसोड् की सीरीज और ज्यादातर एपिसोड्स लगभग 45 मिनट के लेकिन फिर भी बोरियत नहीं होगी। कहानी आपको आखिरी तक बांधे रखने की काबिलियत रखती है।
कहां है कमी?
सीरीज की सबसे पहली कमियों में एडिटिंग और सिनेमैटोग्राफी है जो और बेहतर हो सकती थी।
दूसरा रोहित और प्रतीभा के बीच दिखाए गए लव एंगल में बार-बार एक ही बात दोहराना जरूरी नहीं था। इसके बजाय बाघा जतिन के किरदार और अन्य सपोर्टिंग किरदारों को ज्यादा स्पेस मिल सकता था।
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तीसरा रास बिहारी बोस की निजी जिंदगी को कम दिखाया गया है। जिस तरह सचिंद्रनाथ सान्याल और बाघा जतिन की निजी जिंदगी दिखाई गई जो कहानी में एक इमोशनल टच जोड़ रही है उसी तरह बोस की निजी जिंदगी को भी जगह मिलनी चाहिए थी, खासकर जब वे कहानी में केंद्र में हैं।
क्यों देखें?
द रिवोल्यूशनरीज (The Revolutionaries) आजादी के संघर्ष के दूसरे पहलू को दिखाती है जिसे जानना और समझना आज की पीढ़ी के लिए बेहद जरूरी है जिससे वे उन क्रांतिकारीयों के योगदान को समझ सकें जिनकी बदौलत आज हम आजादी में सांस ले रहे हैं।
