स्मिता श्रीवास्‍तव, मुंबई। हिंदी सिनेमा में अर्से बाद भाई-बहनों की कहानी आई है। फिल्‍म मूल रूप से दहेज की समस्‍या को उठाती है, जो हमारे समाज की आज भी बड़ी समस्‍या है। बाद में यह लड़कियों को आत्‍मनिर्भर बनाने का संदेश भी देती है।

दिल्‍ली के चांदनी चौक में लाला केदारनाथ (अक्षय कुमार) की पुश्तैनी गोल-गप्‍पों की दुकान के आगे ज्‍यादातर गर्भवती महिला ग्राहकों की भीड़ लगी रहती है। ऐसी धारणा है कि उसके गोल गप्‍पे खाने से उन्‍हें बेटा होगा। लाला ने अपनी मरती मां को वचन दिया था कि चार बहनों की शादी करने के बाद ही घोड़ी चढ़ेगा। चारों बहनें एक-दूसरे से मिजाज से लेकर रंग-रूप, डील-डौल में काफी अलग हैं। उन्‍हें इसे लेकर किसी प्रकार की शिकायत भी नहीं है।

सपना (भूमि पेडणेकर) बचपन से लाला से प्रेम करती है और उसके साथ शादी का इंतजार कर रही है। उसके पिता हरिशंकर (नीरज सूद) परेशान हैं कि लाला के वचन की वजह से सपना की शादी नहीं हो रही। लाला दहेज जुटाने की वजह से परेशान है। वह अपनी दुकान गिरवी रखकर अपनी बहन गायत्री (सादिया खतीब) की शादी करता है। बाकी तीन बहनों की शादी के लिए अपनी किडनी बेच देता है। फिर अचानक घटनाक्रम ऐसे मोड़ लेते हैं कि लाला अपनी बहनों को पढ़ा-लिखाकर आत्‍मनिर्भर बनाने का संकल्प लेता है।

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फिल्‍म की कहानी हिमांशु शर्मा और कनिका ढिल्लन ने लिखी है। हिमांशु की कहानी पर आनंद एल राय इससे पहले तनु वेड्स मनु, अतरंगी रे जैसी फिल्‍में बना चुके हैं। इस फिल्‍म को बनाने के पीछे उनकी मंशा अच्‍छी है। इस बार उन्‍होंने दहेज, महिला सशक्‍तीकरण, छेड़खानी समेत कई मुद्दों को उठाया है। कई मुद्दे डालने की वजह से लेखक किसी के साथ पूरी तरह न्‍याय नहीं कर पाए हैं। मसलन, गायत्री की आत्‍महत्‍या को लेखक पूरी तरह एक्‍सप्‍लोर नहीं कर पाए। कहानी वर्तमान में दिल्‍ली में सेट है, लेकिन किसी छोटे शहर की महसूस होती है।

इंटरवल से पहले की फिल्‍म भाई-बहनों की आपसी नोकझोंक, प्‍यार और लाला की शादी को लेकर तनातनी से बढ़ती है। मध्यांतर के बाद कहानी में मोड़ आता है और सामाजिक तौर-तरीकों पर सवाल उठाए जाते हैं। हालांकि, दहेज की दिक्‍कतों पर यह फिल्‍म बहुत गहराई से बात नहीं करती है। उसके लिए लेखन स्‍तर पर काफी काम करने की जरूरत थी। फिल्‍म का स्‍क्रीनप्‍ले कई जगह बहुत कमजोर है। आखिर में फिल्‍म को बहुत तेजी से निपटाया गया लगता है। मुहल्‍ले में दहेज की वजह से सताई गई या मारी गई किसी लड़की का भी कोई जिक्र कहानी में नहीं है।

दिल्‍ली में रहने और कॉलेज जाने के बावजूद ये बहनें अपने भविष्‍य के बारे में क्‍यों नहीं सोचतीं? यह बात समझ से परे है। फिल्‍म के संवाद बीच-बीच में प्रभावशाली हैं। मसलन, बेटी में दिया था तभी बेटे में मांग रहे हैं, नहीं रुकेंगे यह लड़के वाले, यह मांगते रहेंगे और हम देते रहेंगे... शादी इतनी बड़ी बात नहीं है, जितना आत्‍मसम्‍मान होता है... आपको झकझोरते हैं। वहीं, एक दृश्‍य में लाला कहते हैं कि वह अपनी तीन बहनों की शादी तभी कराएंगे जब वह पढ़-लिखकर अपने पैरों पर खड़ी हों और ये लड़कों से दहेज मांगे। यह न्‍यायसंगत नहीं है। दहेज किसी भी रूप में अस्‍वीकार होना चाहिए।

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अक्षय कुमार ने बहुत शिद्दत से लाला के किरदार को जीया है। इमोशनल सीन में वह भावुक कर जाते हैं। सपना की भूमिका में भूमि पेडणेकर सहज और स्वाभाविक लगी हैं। हालांकि, एक ही मुहल्‍ले में रहने, बचपन का प्‍यार होने के बावजूद चारों बहनों में से किसी के साथ भी सपना की दोस्‍ती नहीं है। उसकी वजह भी स्‍पष्‍ट नहीं है, जबकि यह पक्ष बहनों की समाज के प्रति सोच और उनकी दिक्‍कतों को बारीकी से दिखा सकता था।

बहनों की भूमिका में सादिया खतीब, दीपिका खन्ना, स्मृति श्रीकांत और सहजमीन कौर की केमिस्‍ट्री जमती है। उन्‍हें अपनी प्रतिभा दिखाने का बहुत ज्‍यादा मौका भी नहीं मिला है। शादी के मैचमेकर के किरदार में सीमा पाहवा अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज कराती हैं। पिता की भूमिका में नीरज सूद नोटिस होते हैं। मंडप से भागने का दृश्‍य फिल्‍म दिल है कि मानता नहीं की याद ताजा करता है। फिल्‍म में इरशाद कामिल के गीत को हिमेश रेशमिया ने संगीत दिया है। मेरा काम डन कर दो गाने को छोड़कर बाकी गीत याद नहीं रह जाते हैं।

कलाकार: अक्षय कुमार, भूमि पेडणेकर, नीरज सूद, सीमा पाहवा, सादिया खतीब, दीपिका खन्ना, स्मृति श्रीकांत, सहजमीन कौर आदि।

निर्देशक: आनंद एल राय

अवधि: एक घंटा 50 मिनट

स्‍टार: ढाई

Edited By: Manoj Vashisth