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Om Ka Hari Review: ओटीटी के दौर में थिएटर पर आई सादगी भरी कहानी, क्या चल पाया 'पंचायत' और 'गुल्लक' जैसा जादू?

By Priyanka SinghEdited By: Ekta Gupta
Published: Fri, 18 Sep 2026 03:44 PM (IST)

रघुबीर यादव, सोनी रजदान की कॉमेडी ड्रामा फिल्म 'ॐ का हरि' (Om Ka Hari) 18 सितंबर को थिएटर्स में रिलीज हो गई है। यहां पढ़ें फिल्म का रिव्यू-

सिनेमाघरों में रिलीज हुई फिल्म 'ॐ का हरि'

सिनेमाघरों में रिलीज हुई फिल्म 'ॐ का हरि'

HighLights

  1. सिनेमाघरों में रिलीज हुई फिल्म 'ॐ का हरि'

  2. रघुबीर यादव ने निभाया है लीड किरदार

  3. रिव्यू में पढ़ें कैसी है फिल्म?

प्रियंका सिंह, मुंबई। डिजिटल प्लेफार्म पर 'पंचायत', 'गुल्लक' जैसी छोटे शहरों और वहां बसने वाले परिवारों की कहानियां दर्शकों को आकर्षित करती रही हैं। बड़े पर्दे के लिए बनी फिल्म 'ॐ का हरि' भी उसी तरह की कहानी है, जो सख्त पिता और उसके बच्चों की बीच की नोक-झोंक, आत्मबोध जैसे मुद्दे पर बनी है।

om ka hari

क्या है 'ॐ का हरि' की कहानी?

कहानी शुरू होती है, भोपाल के उस घर से जहां शर्मा परिवार बरसों से रहा है। हरि प्रसाद शर्मा (रघुबीर यादव) को भोपाल का अनूप जलोटा कहा जाता है। सरकारी नौकरी से रिटायर होने के बाद वह भजन करने का काम लेते हैं। उनकी पत्नी सरोज (सोनी राजदान) गृहणी है, बेटी गुड्डी (समता सुदीक्षा) पढ़ रही है। पिता की हर वक्त की डांट से परेशान बेटा ओम (अंशुमन झा) अपनी पत्नी प्रिया (आयशा कपूर) के साथ अलग घर में रहता है।

एक दिन हरि भजन गाते हुए बेहोश हो जाता है। उसे लगने लगता है कि वह एक हफ्ते में मरने वाला है और उसे अपने प्राण वाराणसी में त्यागने है। पिता की जिद पर ओम उन्हें वाराणसी लेकर जाता है। आगे क्या-क्या होता है, इस पर कहानी आगे बढ़ती है।

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डायरेक्शन और राइटिंग

फिल्म के निर्देशक हरीश व्यास ने ही फिल्म की कहानी लिखी है। कहानी नई नहीं है, लेकिन इसे बनाने की उनकी मंशा अच्छी है। पारिवारिक कहानियां सिनेमाघरों से ज्यादा डिजिटल प्लेटफार्म पर दिखती हैं, ऐसे में इसे सिनेमाघरों में रिलीज करने के प्रयास पर फिल्म की सराहना बनती है।

क्या है खूबियां?

हरीश ने स्वाति के साथ मिलकर फिल्म की जो पटकथा और संवाद लिखे हैं, वह अपने से लगते हैं। हर दूसरे-तीसरे घर में एक ऐसा पिता होगा, जो अपने निर्णय बच्चों पर यह सोचकर थोपता होगा कि वही उनके लिए बेहतर है, उसकी मंशा भी बच्चों का भला करने की होती है, बच्चे पिता की डांट और सख्ती से परेशान होते हैं, इन सबके बीच एक मां पिसती रहती है।

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उनके बीच होने वाली नोक-झोंक, संवाद, घर-घर कहानी लगती है। फिल्म के आर्ट डिपार्टमेंट, शांतनु चटर्जी के प्रोडक्शन डिजाइन और शिवानी पाटिल के कास्टूयम्स की भी सराहना बनती है, छोटे शहर के घर, वहां रहने वाले लोगों के कपड़े, घर के सामान हर चीज पर बारीकी से काम किया है।

राकेश रावत की सिनेमैटोग्राफी इन सबके साथ न्याय करती है। सैलोन का बिजनेस शुरू करने वाले बेटे को पिता का नाई कहना, यह नहीं वो खाऊंगा कहकर पिता वाली दादागिरी करना ऐसी कई छोटी-छोटी बातें कहानी को विश्नसनीय बनाती हैं।

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शर्माजी का घर बनकर उस परिवार की दास्तां सुनाने वाले अभिनेता विजय राज की आवाज कहानी को दिलचस्प बनाती है। आशा भोसले का गाया गीत ऐ मेरी जिंदगी... कहानी को आगे बढ़ाता है।

एक्टिंग

अभिनय की बात करें, तो रघुबीर यादव सख्त लेकिन बच्चों के भविष्य के लिए चितिंत पिता के रोल में सही कास्टिंग लगते हैं। अपने सपनों और करियर का त्याग कर अपने बच्चों को ही अपनी जिंदगी बनाने वाली मां के रोल में सोनी राजदान का काम सराहनीय है।

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बेटे के रोल में अंशुमन झा का अभिनय अच्छा है। वाराणसी के पंडित आत्माराम की भूमिका में जगत रावत प्रभावित करेंगे, छोटे से रोल में उन्हें कई भावनाएं दर्शाने का मौका मिला है। कहानी के दायरे में समता सुदीक्षा और आयशा कपूर का काम भी ठीक है।

क्या है कमी?

फिल्म की अवधि यूं तो नियंत्रण में ही है, लेकिन इसमें ओम और प्रिया के प्रेम-प्रसंग, एक के बाद एक आते गानों को कम करके बेहतर किया जा सकता था। कहानी कई जगहों पर धीमी भी हो जाती है, लेकिन फिर कुछ सीन उसे ट्रैक पर ले आते हैं।

कुल मिलाकर परिवार के साथ थिएटर में 'ॐ का हरि' देखी जा सकती है।

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