Nayii Navelli Review: भाभी 'डायन' है या 'देवी'? यामी गौतम की फिल्म में कॉमेडी सुपरहिट, फिर कहां चूकी 'नई नवेली'?
यामी गौतम (yami gautam) की फिल्म 'नई नवेली' (Nayyi Navelli) सिनेमाघरों में आई है। अब इस फिल्म के लिए आपको ...और पढ़ें

यामी गौतम की नई नवेली शानदार या बेकार? पढ़ें रिव्यू
HighLights
सिनेमाघरों में आई यामी गौतम की 'नई नवेली'
क्या देखने लायक है ये फिल्म?
हॉरर-कॉमेडी में लगा पौराणिक युग का तड़का
अंकित सिंह तोमर, नई दिल्ली। हिंदी सिनेमा में इस वक्त पौराणिक युग आया हुआ है और ये हम इसलिए कह रहे हैं क्योंकि आजकल निर्माता-निर्देशक ऐसी ही कहानियों को भुनाने में लगे हैं। अभिनेत्री यामी गौतम की फिल्म नई नवेली रिलीज हो गई है और यह उसी का एक उदाहरण है।
फोकलोर यानि लोककथाओं पर बनने वाली फिल्मों में नई नवेली का नाम भी शुमार हुआ है। यामी गौतम के कंधों पर टिकी ये फिल्म क्या वाकई में उम्मीदों पर खरी उतरी या फिर इसने दर्शकों ये निराश किया है? ये जानने के लिए और फिल्म देखने से पहले ये रिव्यू जरूर पढ़ें...
क्या है फिल्म की कहानी?
यामी गौतम की इस मल्टीस्टारर फिल्म का जबसे एलान हुआ, तभी से दर्शकों में उत्साह था कि फिल्म की कहानी कुछ ना कुछ हटकर जरूर होगी और हुआ भी वही है। फिल्म की कहानी शुरू होती है मेरठ में रहने वाले अवस्थी परिवार से, जहां अवस्थी परिवार में एक दो या नहीं बल्कि कई सदस्य हैं। इसी परिवार में बहू बनकर आती हैं मोहिनी (Yami Gautam)। मोहिनी की शादी परिवार के बड़े बेटे राजा अवस्थी (Adinath Kothare) से होती है।
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अब मोहिनी पर किसी और को नहीं बल्कि उसके देवर और राजा के छोटे भाई बंटू अवस्थी (Anurag Thakur) को शक होता है कि भाभी डायन है। बंटू ये बात पूरे परिवार को बताता है और उन्हें विश्वास दिलाने की कोशिश करता है। अलग-अलग समय पर हुई घटनाओं का जिक्र करते हुए बंटू परिवार के यकीन दिलाने के लिए हर मुमकिन कोशिश करता है कि मोहिनी भाभी कोई साधारण मनुष्य नहीं बल्कि एक डायन है।
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वो कभी मंदिर तो कबी श्मशान में पूजा पाठ करती है, तंत्र-मंत्र करती है। इसके बाद मोहिनी की सच्चाई सामने आ जाती है और फिर यहीं से कहानी में एक बड़ा ट्विस्ट आता है और उस ट्विस्ट में होती है राजा अवस्थी यानि मोहिनी के पति की एंट्री। कहानी यहां से सेकेंड हाफ में जाती है और फिर पता चलता है कि मोहिनी असल में एक देवी है और उसका संबंध रामायण काल से है। अब राम-रावण और मोहिनी के बीच की कड़ियां आपस में कैसे जुड़ी हैं, यही कहानी फिल्म में दिखाई गई है।
कैसी है फिल्म?
नेशनल अवॉर्ड जीतने वाली यामी गौतम की ये फिल्म अगर आप एक शब्द में समझना चाहें तो यह कहा जा सकता है कि फिल्म अच्छी तो है, लेकिन सिर्फ फर्स्ट हाफ तक क्योंकि फर्स्ट हाफ में भरपूर कॉमेडी है। फिल्म की शुरुआत बहुत ही एंटरटेनिंग और ग्रिपिंग अंदाज में होती है। फर्स्ट हाफ दर्शकों को बांधकर रखता है, जहां हंसी-मजाक, पारिवारिक ठिठोली और बीच-बीच में आने वाले सिचुएशनल ट्विस्ट्स चेहरों पर मुस्कान बनाए रखते हैं।

यामी गौतम (मोहिनी) और उनके परिवार के इर्द-गिर्द बुना गया ड्रामा काफी मजेदार लगता है। परिवार का एक-एक सदस्य हंसाने में कामयाब रहता है और हर किरदार को अच्छा स्क्रीन स्पेस भी मिला है। लेकिन अफसोस, सेकेंड हाफ में आते-आते फिल्म अपनी ही ग्रिप खो देती है। मेकर्स ने मॉडर्न ड्रामा में पौराणिक युग का तड़का लगाने की जो कोशिश की है, वह बिल्कुल बेमेल लगती है। कहानी में कलयुग के बीच सीधे रावण की एंट्री करा देना दर्शकों के गले आसानी से नहीं उतरता और यह काफी असंभव और बचकाना सा लगता है।
फिल्म अपने असली मुद्दे से पूरी तरह भटक जाती है। हालांकि मेकर्स ने, यहांतक कि यामी ने पहले ही कह दिया था कि फिल्म कहानी सिर्फ काल्पनिक ही है, लेकिन फिर भी कहानी में हॉरर-कॉमेडी के साथ लोककथा का ट्विस्ट थोड़ा भटका हुआ लगता है। रामायण काल से फिल्म में कई रेंफ्रेंस डाले गए हैं।
इतना ही नहीं, फिल्म के स्क्रीनप्ले में लॉजिक की भारी कमी देखने को मिलती है, दीवाली वाले दिन यह संवाद आना कि कल दशहरे पर रावण को मारेंगे' दर्शकों को सिनेमाघर में किसी मजाक जैसा महसूस कराता है। बार-बार बिना जरूरत के ठूंसे गए ट्विस्ट और टर्न्स कहानी को सुलझाने के बजाय दर्शकों को भ्रमित करते हैं।
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कैसा है सितारों का अभिनय?
फिल्म के सभी पात्रों को पर्दे पर अच्छा अभिनय करने का मौका मिला है। सभी को अच्छा खासा स्क्रीन स्पेस दिया गया है। फिल्म में मोहिनी के किरदार में यामी गौतम काफी सहज लगी हैं। हालांकि कहीं-कहीं सीन्स में यामी कॉमेडी से थोड़ा चूक जाती हैं, लेकिन उनकी खूबसूरती इसमें चार चांद जरूर लगाती है। फिल्म के यामी के कंधों पर ही रहती है और क्योंकि वही फिल्म की असली हीरो हैं, तो ऐसे में वह फिल्म औसत दिखती हैं।
फिल्म का एक किरदार सबपर भारी पड़ा है और वो है बंटू अवस्थी के किरदार में नजर आने वाले एक्टर अनुराग ठाकुर। अगर यूं कहें कि फर्स्ट हाफ सिर्फ बंटू यानि अनुराग के नाम ही रहा, तो यह कहना गलत नहीं होगा। अनुराग ने देवर के किरदार में जान फूंकी है। राजा अवस्थी के किरदार में आदिनाथ कोठारे भी सही लगे हैं, उन्हें जितना स्क्रीन टाइम मिला, उन्होंने उसका सदुपयोग किया है। दादी के किरदार में सुष्मिता मुखर्जी कमाल लगी हैं।
वहीं मां के किरदार में सुनीता राजवर ने भी बेहतरीन काम किया है। बुआ के किरदार में मीता वशिष्ठ ने कोई कमी नहीं छोड़ी है। उनके डायलॉग्स कमाल के हैं और उनके पति कुल्लू यानि आदित्य कुलश्रेष्ठ के डायलॉग्स पर भी खूब सीटियां बजी हैं। आदित्य एक सरप्राइज पैकेज हैं, जिन्हें देखने के बाद आप तालियां जरूर बजाएंगे।

कैसा है निर्देशन?
ऐसी फोकलोर कहानियों में सबसे जरूरी है कहानी को कहने का तरीका। निर्देशन बालाजी मोहन की ये पहली हिंदी फिल्म है और उनकी कोशिश अच्छी रही, लेकिन शायद वह कहानी के हिसाब से थोड़े भटक गए। हालांकि निर्देशक बालाजी मोहन (Balaji Mohan) के काम में साउथ सिनेमा का वो खास फ्लेवर और टच साफ दिखाई देता है।
वो फर्स्ट हाफ में कॉमेडी और ड्रामा को अच्छे से बैलेंस करते हैं, लेकिन सेकेंड हाफ में बिखरी हुई कहानी को पिरोने और सही अंजाम तक पहुंचाने में पूरी तरह कामयाब नहीं हो पाते हैं। फिल्म के राइटर हिमांशु शर्मा की कोशिश अच्छी थी और उन्होंने कहानी को लिखा भी सही ढंग से, लेकिन शायद इतने ज्यादा ट्विस्ट एंड टर्न्स थे कि फिल्म में रावण का आना, जॉम्बीज का टकराना और फिर बार-बार यामी का कभी लक्ष्मण, तो कभी हनुमान जाना थोड़ा लॉजिक से परेय लगता है।
हालांकि बालाजी मोहन ने सबकुछ साधन के कोशिश जरूर की, पर हां अगर कहानी में पारिवारिक- हॉरर कॉमेडी ड्रामा रहता, तो शायद कहानी थोड़ी असरदार जरूर लगती।
कैसा है संगीत?
फिल्म में जीवी प्रकाश ने संगीत दिया है, जो थोड़ा प्रभावी है। फिल्म में बजने वाला म्यूजिक आपको बांधे जरूर रखता है। फिल्म में जो दो-तीन गाने दिए हैं, वो ठीकठाक लगते हैं। फिल्म का बैकग्राउंड म्यूजिक कहानी को आगे बढ़ाने में और दिलचस्पी बढ़ाने में अच्छा लगता है।

फिल्म देखें या नहीं?
आनंद एल राय और हिमांशु शर्मा की जोड़ी कमाल रही है। दोनों ने साथ में कई अच्छी और बेहतरीन फिल्में दी हैं, दोनों मिलकर फिल्म बनाई है। हालांकि इस बार ये फिल्म निराश करती है। वहीं अमेजॉन प्राइम वीडियो और MGM स्टूडियोज का नाम फिल्म से जुड़ा है, तो ऐसे में उम्मीदें बढ़ जाती हैं, लेकिन इस बार उन उम्मीदों पर पानी फिर जाता है। लोककथाओं और पौराणिक कथाओं के साथ मॉर्डन ट्विस्ट इस फिल्म में लगा है।
जहां, हंसी-मजाक तो अच्छा है, लेकिन हॉरर के नाम पर आप डर नहीं पाएंगें। कहानी अच्छी तो लगती है लेकिन अपनी मंजिल तक नहीं पहुंचती। क्लाईमैक्स अजीब ढंग से पेश किया है। कहानी को अगर टाइट रखा जाता तो शायद ये और बेहतर लगती। अगर आप हंसना चाहते हैं तो फिल्म देख सकते हैं, लेकिन ये फिल्म आपको उबाऊ जरूर लग सकती है।
