Last Man In Tower Review: यादों का आशियाना या लालच की इमारत? मनोज बाजपेयी की फिल्म देती है सार्थक संदेश
Last Man In Tower Review: मनोज बाजपेयी की फिल्म लास्ट मैन इन टावर सिनेमाघरों में रिलीज हो गई है। इस ...और पढ़ें

लास्ट मैन इन द टावर रिव्यू। फोटो क्रेडिट- इंस्टाग्राम
HighLights
मास्टरजी के किरदार में छा गए मनोज बाजपेयी
इंसानियत और लालच के इर्द-गिर्द घूमती है फिल्म
लास्ट मैन इन टावर का स्क्रीनप्ले है दमदार
स्मिता श्रीवास्तव, मुंबई। प्रख्यात उपन्यासकार अरविंद अडिगा का साल 2011 में आया उपन्यास 'लास्ट मैन इन टावर' (Last Man In Tower) मानवीय स्वार्थ, लालच और नैतिक पतन की पड़ताल करता है। यह बताता है कि निजी लाभ की चाहत किस तरह इंसान को अपने ही करीबी लोगों के खिलाफ खड़ा कर सकती है।
भारतीय मूल के अमेरिकी फिल्मकार बेन रेखी ने इसी उपन्यास पर आधारित इसी शीर्षक (लास्ट मैन इन टावर) से फिल्म बनाई है। इससे पहले अरविंद के उपन्यास द व्हाइट टाइगर पर इसी नाम से फिल्म बनी थी, जिसमें प्रियंका चोपड़ा जोनस अभिनय करने के साथ इसकी कार्यकारी निर्माता भी थी।
क्या है फिल्म की कहानी?
कहानी मुंबई के विश्राम हाउसिंग सोसाइटी निवासी सेवानिवृत्त स्कूल शिक्षक योगेश मिश्रा (मनोज बाजपेयी) के इर्द-गिर्द है जिन्हें सब मास्टरजी बुलाते हैं। बिल्डर धर्मेश शाह (बमन ईरानी) सोसाइटी के निवासियों को रीडेवलपमेंट के लिए अपने घर खाली करने के बदले एक लुभावना प्रस्ताव देता है।
शुरुआत में यह सौदा हर किसी को फायदे का नजर आता है, लेकिन मास्टरजी इसे स्वीकार करने से इनकार कर देते हैं। मास्टरजी का यह फैसला धीरे-धीरे पूरी सोसाइटी की मानसिकता और उनके भीतर मौजूद मतभेदों को उजागर करता है। दरअसल, एक ही घर की चार दीवारें अलग-अलग लोगों के लिए बिल्कुल अलग मायने रखती हैं।

मास्टर के लिए यह फ्लैट महज संपत्ति का एक टुकड़ा नहीं है बल्कि उनकी दिवंगत पत्नी की यादों, जीवनभर की मेहनत और आत्मसम्मान से जुड़ा है। वहीं उनका बेटा गौरव (सुकांत गोयल) जो अपनी पत्नी और बेटे के साथ अलग फ्लैट में रहता है वह इस घर को संपत्ति, आर्थिक लाभ और बेहतर भविष्य के अवसर के तौर पर देखता है।
वह भी अपने पिता के फैसले से सहमत नहीं है। पिता-पुत्र के बीच होने वाले मतभेद रीडेवलपमेंट के विवाद को एक निजी और भावनात्मक आयाम देते हैं।
स्क्रीनप्ले है दमदार
फिल्म की सबसे बड़ी ताकत यह है कि इसका संघर्ष किसी बाहरी खलनायक और नायक के बीच नहीं, बल्कि आम लोगों की इच्छाओं, जरूरतों और नैतिक दुविधाओं के बीच पैदा होता है। जो पड़ोसी कभी साथ रहते आए हैं, वे धीरे-धीरे अपने-अपने स्वार्थों के कारण एक-दूसरे के विरोधी बन जाते हैं।

मास्टरजी की पड़ोसी संगीता (दिव्या दत्ता) अपने स्पेशल चाइल्ड की मां होने के नाते, रीडेवलेपमेंट को अपने परिवार की आर्थिक स्थिरता हासिल करने के अवसर के रूप में देखती हैं। उनके लिए यह फैसला अपने बच्चे के भविष्य और बेहतर जीवन की चिंता से भी जुड़ा है। वही एक अन्य पड़ोसी इसे कर्जे को चुकाने के रुप में देखता है।
धीमी गति से आगे बढ़ती है फिल्म
इनके जरिए फिल्म विकास, आर्थिक सुरक्षा और बेहतर जीवन की चाहत के बीच कोई व्यक्ति अपने सिद्धांतों से किस हद तक समझौता कर सकता है? क्या अपने घर से भावनात्मक लगाव दूसरों की जरूरतों से बड़ा है? जैसे पहलुओं को बारीकी से खंगालती है। अंततः फिल्म यही बात सामने रखती है कि घर केवल दीवारों से नहीं, बल्कि उनमें रहने वाले लोगों, उनकी यादों और रिश्तों से बनता है। हालांकि इस भावनात्मक निष्कर्ष तक पहुंचने में फिल्म कुछ ज्यादा समय लेती है।
कहां चूकी फिल्म?
रीडेवलपमेंट मजबूत नाटकीय आधार जरूर है, लेकिन फिल्म कई बार संघर्ष की बारीकियों में इतनी उलझ जाती है कि उसका भावनात्मक असर देर से उभरता है। यही इसकी सबसे बड़ी कमजोरी है। इसके बावजूद, आम आदमी के घर, स्वाभिमान, आर्थिक जरूरतों और बदलते शहरी जीवन के बीच के तनाव को सामने रखने की कोशिश फिल्म को विचारोत्तेजक बनाती है।
मनोज बाजपेयी ने चुराई लाइमलाइट
कलाकरों में मास्टरजी की भूमिका में मनोज बाजपेयी का अभिनय शानदार है। वह अपने किरदार की दृढ़ता, असहाय होने की पीड़ा, अकेलापन, भीतर चल रहे संघर्ष और पड़ोसियों के बदलते व्यवहार के बावजूद अपने फैसले पर अडिग रहने की जिद इन सभी जटिल भावनाओं को बेहद स्वाभाविक ढंग से पर्दे पर उतारते हैं।
बाकी कलाकारों ने भी किया उम्दा काम
दिव्या दत्ता के किरदार में कई परते हैं। वह अपने अभिनय से प्रभावित करती हैं। बिल्डर धर्मेश शाह बने बमन ईरानी का पात्र केवल एक लालची बिल्डर बनकर सामने नहीं आता, बल्कि उसके तर्क और व्यवहार कहानी की नैतिक जटिलता को बनाए रखते हैं।
उसमें वह सहज और प्रभावी नजर आते हैं। वहीं सुकांत गोयल कहानी के केंद्र में मौजूद पीढ़ीगत अंतर और पिता-पुत्र के वैचारिक टकराव को विश्वसनीय बनाते हैं। ब्रोकर की संक्षिप्त भूमिका में चंदन राय सान्याल का अभिनय प्रभावी है।
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