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Kartavya Review: फिसड्डी स्क्रिप्ट... डगमगाता क्लाइमैक्स; किरकिरी कहानी में किरदारों ने निभाया 'कर्तव्य'

By Smita SrivastavaEdited By: Tanya Arora
Published: Fri, 15 May 2026 01:46 PM (GMT+05:30)

'कर्तव्य' Netflix पर रिलीज हो चुकी है, जिसमें सैफ अली खान सहित एक्टर्स का काम अच्छा है। इसके बावजूद फिल्म ...और पढ़ें

नेटफ्लिक्स पर रिलीज 'कर्तव्य' का रिव्यू/ फोटो- Jagran Graphics

नेटफ्लिक्स पर रिलीज 'कर्तव्य' का रिव्यू/ फोटो- Jagran Graphics

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स्मिता श्रीवास्तव, मुंबई। कोई भी फिल्‍म तभी प्रभावशाली बन पाती है जब उसके पात्रों को समुचित तरीके से विकसित किया गया हो। खास तौर पर नायक और खलनायक के बीच का टकराव। लेखक और निर्देशक पुलकित इसी सबसे अहम पहलू का कर्तव्‍य निभाने में चूक जाते हैं। खलनायक का कमजोर चित्रण कहानी का मजा किरकिरा करता है।

झामली नामक छोटे से कस्बे से शुरू होती है कहानी

पुलकित ने झामली नामक छोटे से कस्‍बे को कहानी का आधार बनाया है, जिसकी भाषा और माहौल से समझ आता है कि यह हरियाणा होगा। कहानी का केंद्र ऑनर किलिंग (प्रतिष्‍ठा के नाम पर हत्या) और खाप पंचायत जैसी सामाजिक विसंगतियां हैं, जिनसे हरियाणा लंबे समय से जुड़ा रहा है। शुरुआत झामली के ईमानदार एसएचओ पवन (Saif Ali Khan) के 40वें जन्‍मदिन का केक काटने के साथ होती है। उसका भरोसेमंद मातहत अशोक (संजय मिश्रा) उसके साथ होता है, लेकिन यह खुशी ज्यादा देर टिकती नहीं। पूरी पुलिस टीम एक चर्चित महिला पत्रकार को स्टेशन लेने जाती है, जो आध्यात्मिक गुरु आनंद श्री (सौरभ द्विवेदी) से जुड़े नाबालिग बच्चों की गुमशुदगी के मामले की छानबीन के लिए आई होती है। रास्ते में बाइक सवार दो हमलावर उसकी गोली मारकर हत्या कर देते हैं।

उधर पवन का छोटा भाई दूसरी जाति की लड़की के साथ फरार हो जाता है। कट्टर जातिवादी उसका पिता हरिहर (जाकिर हुसैन) इस घटना को अपमान की तरह देखता है। फिर पता चलता है कि शूटर नाबालिग बच्‍चा हरपाल (युधवीर अहलावत) है। धार्मिक गुरु आनंद श्री के आदेश पर उसने यह कत्‍ल किया होता है। हरपाल को पकड़ने में पुलिस कामयाब होती है। आनंद श्री के करीबियों में पवन का ऑफिसर केशव (मनीष चौधरी) भी शामिल होता है। एक तरफ पवन का कर्तव्य और इंसानियत है, दूसरी तरफ परिवार, समाज और व्यवस्था की जहरीली सोच। पवन इससे कैसे निकलेगा कहानी इस संबंध में है।

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kartavya

टर्निंग प्वाइंट्स के बाद भी वीक है क्लाइमैक्स

ऑनर किलिंग, खाप पंचायत, धर्म और सत्ता के गठजोड़ जैसे गंभीर विषयों को आधार बनाकर बनाई गई यह फिल्म शुरुआत में एक प्रभावशाली क्राइम-ड्रामा बनने का भरोसा जगाती है, लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, पटकथा की कमजोरियां सामने आने लगती हैं। आश्रम वेब सीरीज और पीके जैसी फिल्‍मों में दर्शक पहले ही ढोंगी बाबाओं का प्रभावशाली चित्रण देख चुके हैं, इसलिए यहां आनंद श्री बेहद सतही लगता है। इस पात्र के लिए किसी मंझे कलाकार की कमी भी महसूस होती है।

कहानी का पूर्वानुमान आसानी से लगाया जा सकता है। हरपाल सरे आम पुलिस स्‍टेशन में बैठा है और पवन कहता है कि उसके बारे में यह जानकारी सिर्फ तीन लोगों को है, यह हास्‍यापद है। जबकि पूरा इलाका ही आनंद श्री के भक्‍तों से भरा है। ऑनर किलिंग को लेकर खाप पंचायत वाले दृश्‍य थोड़ा पकड़ बनाते हैं लेकिन उसके भावनात्‍मक असर को पूरी गहराई नहीं दे पाते हैं। फिल्‍म का क्‍लाइमैक्‍स भी बहुत प्रभावी नहीं बन पाया है। वह न तो चौंकाता है न ही ऐसा रोमांच पैदा करता करता जिससे जुड़ाव बना रहे।

saif ali khan kartavya

पूरी फिल्म में छाए रहे सैफ अली खान

इन कमियों के बावजूद कलाकार उसे अपने अभिनय से साधन की कोशिश करते हैं। सैफ अली खान पूरी फिल्‍म में छाए रहते हैं। उन्‍होंने शुरु से अंत से हरियाणवी उच्‍चारण को पकड़े रखा है। नौकरी और घर की जिम्‍मेदारियों के बीच झूलते पवन की हताशा, बेबसी और आक्रोश को संयमित और संतुलित तरीके से दर्शाया हैं। इसमें उन्‍हें उनके सह कलाकार संजय मिश्रा और रसिका दुग्‍गल का पूरा सहयोग मिलता है।

मनीष चौधरी अपने किरदार को विश्‍वसनीय बनाने में कामयाब रहते हैं। बाल कलाकार की भूमिका में युद्धवीर अहलावत का अभिनय उल्‍लेखनीय है। कट्टर जातिवादी पिता की भूमिका में जाकिर हुसैन जंचते हैं। यह फिल्म अहम संदेश देती है, लेकिन उसे प्रभावशाली तरीके से पर्दे पर उतार नहीं पाती।

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