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Ghamasaan Review: 'डाकू ददुआ' बनकर अरशद वारसी ने मचाया 'घमासान', प्रतीक गांधी ने लूटी महफिल; कहां रह गई चूक?

By priyanka singhEdited By: Rinki Tiwari
Published: Fri, 11 Sep 2026 01:27 PM (IST)

Ghamasaan Film Review: अरशद वारसी और प्रतीक गांधी की फिल्म घमासान आज रिलीज हो गई है। फिल्म को देखने से पहले इसका रिव्यू पढ़ें...

घमासान फिल्म का रिव्यू।

घमासान फिल्म का रिव्यू।

HighLights

  1. फिल्म 'घमासान' डाकू ददुआ की सच्ची कहानी से प्रेरित है

  2. अरशद वारसी और प्रतीक गांधी ने दमदार अभिनय किया है

  3. तिग्मांशु धूलिया निर्देशित फिल्म की पटकथा में कुछ कमी है

प्रियंका सिंह, मुंबई। कहानियां जब वास्तविक घटनाओं या व्यक्तियों से प्रेरित होती हैं, तो उसे सिनेमा के फॉर्मेट में फिट करना फिल्मकारों के लिए चुनौतीपूर्ण होता है।

हालांकि इन चुनौतियों को अपनाते हुए निर्देशक तिग्मांशु धूलिया (Tigmanshu Dhulia) अक्सर ऐसी कहानियां लाते हैं। जी5 (Zee5) पर रिलीज हुई उनकी निर्देशित फिल्म घमासान (Ghamasaan) 'डाकू ददुआ' से प्रेरित है।

क्या है फिल्म की कहानी?

कहानी साल 2006 में उत्तर प्रदेश की एक शादी से शुरू होती है। दूल्हा अपने पिता को छोड़कर अपनी नई दुल्हन और मां के साथ दिल्ली रहने के लिए चला जाता है। उसका पिता जो बुंदेलखंड के डाकू, महाराज (अरशद वारसी) के लिए काम करता है, उसे पुलिस मुखबिर बनने के लिए कहती है। महाराज को यह बात पता चलती है और वह उसका सिर काटकर उसके बेटे के घर के बाहर लगा देता है।

Ghamasaan

बेटा अपने पिता की मौत का बदला लेने के लिए बंदूक उठा लेता है। वहां से महाराज की क्रूरता का अंदाजा हो जाता है। इसके साथ ही वह राजनीति की दुनिया में भी उथल-पुथल मचाने की ताकत रखता है।

बुंदेलखंड में चुनाव होने वाले होते हैं, ऐसे में चुनाव सेंटरों पर कब्जा कर पूरी प्रक्रिया को महाराज बाधित न करें, इसके लिए वहां स्पेशल टास्क फोर्स से आदित्य सिंह (प्रतीक गांधी) को भेजा जाता है। वह अपनी टीम तैयार करता है। क्या वह महाराज को रोक पाएगा इस पर कहानी आगे बढ़ती है।

स्क्रीनप्ले है कमजोर

राम यश सिंह और पीयूष सिंह की इस कहानी का कान्सेप्ट अच्छा है, लेकिन कमजोर पटकथा उसे पर्दे पर उतनी मजबूती से नहीं दिखा पाती है। खुद तिग्मांशू ने डाकुओं की इस दुनिया पर बनी फिल्म पान सिंह तोमर (2012) से अपने लिए ही एक ऊंचा स्तर बना दिया है, जिसे वह इस फिल्म से पार नहीं कर पाते हैं।

डाकू कितने क्रूर होते हैं, वह कैसे जंगलों में छिपकर रहते हैं, उनके मुखबिर कैसे काम करते हैं, वह गांवों में जाकर कैसे घरों में घुसकर महिलाओं से जबरदस्ती करते हैं यह सब दिखाया गया है, लेकिन उसमें नयापन नहीं है। डाकुओं पर बनी फिल्मों में यह सब पहले देखा गया है।

फिल्म में रोमांच की कमी

कहानी में वह मोड़ नहीं आता, जो चौंकाए। हालांकि सीधे रास्ते पर बिना किसी रोमांचक के सब कुछ बताते हुए चलती यह कहानी अपने अंत तक ठीक-ठाक पहुंच जाती है। तिग्मांशु धूलिया की कलाकारों के अभिनय पर पकड़ कहानी को बहुत ज्यादा ड्रमैटिक नहीं होने देती है।

बोर होने से बचाता है फिल्म का संगीत

अनुज गर्ग का संगीत फिल्म की कहानी को उत्तर प्रदेश के माहौल से जोड़े रखता है। सिद्धार्थ पंडित और रेव शेरगिल का बैकग्राउंड स्कोर बीच-बीच में धीमी कहानी को ऊबाऊ होने से बचाता है।

अच्छी है सिनेमैटोग्राफी

गांव और जंगलों में शूट हुई इस फिल्म को देव अग्रवाल की सिनेमैटोग्राफी विश्वसनीय बनाती है। फिल्म में ऐसा कोई प्रभावशाली संवाद नहीं हैं, जो फिल्म खत्म होने पर याद रहें, लेकिन एसटीएफ की टीम जिस तरह से महाराज और उसके गैंग को जंगल में पकड़ने की रणनीति बनाती है, वह सीन अच्छे बने हैं।

कलाकारों का प्रदर्शन

कॉमेडी छवि वाले अभिनेता अरशद वारसी (Arshad Warsi) पिछले कुछ समय से गंभीर किरदारों को भी एक्सप्लोर कर रहे हैं। वह प्रतिभाशाली कलाकार हैं, स्क्रिप्ट के दायरे में रहकर उन्होंने महाराज के रोल को निभाया है, लेकिन चूंकि उनसे हमेशा बेहतरी की उम्मीद की जाती है।

प्रतीक गांधी (Pratik Gandhi) पत्नी के सामने आज्ञाकारी और अपराधी के सामने सख्त, तेजतर्रार स्पेशल टास्क फोर्स के अफसर के रोल में जंचते हैं। डाकू के सप्लायर के तौर पर राजपाल यादव (Rajpal Yadav) अपने अभिनय से प्रभावित करते हैं। इशिता के हिस्से चंद सीन लगे हैं, जिसमें उन्हें पहले भी देखा गया है। फिल्म की सपोर्टिंग कास्ट का काम बढ़िया है।

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