-पराग छापेकर

मुख्य कलाकार: संजय दत्त, अदिति राव हैदरी, शरद केलकर, सिद्धांत गुप्ता आदि।

निर्देशक: उमंग कुमार

निर्माता: उमंग कुमार, भूषण कुमार

हर फ़िल्म देखने के पीछे दर्शकों की एक ख़ास वजह होती है। मनोरंजन के साथ-साथ फलां फ़िल्म क्यों देखी जानी चाहिए इसके कारण बहुत ही स्पष्ट होते हैं। कभी किसी सितारे के फैन हैं इसलिए तो कभी इसलिए कि जो भी हो यह फ़िल्म एक बार तो देखी जानी चाहिए। ठीक ऐसी ही फ़िल्म है इस हफ्ते रिलीज़ हुई निर्देशक उमंग कुमार की- 'भूमि'। फ़िल्म चाहे जैसी भी हो लेकिन, संजय दत्त यानी बाबा के चाहने वालों के लिए यह फ़िल्म एक आकर्षण है! लंबे समय बाद जेल से लौटे संजय दत्त ने अपनी वापसी के लिए भूमि' को चुना है!

यह कहानी है अरुण (संजय दत्त) की जो आगरा में हैंडमेड जूते का कारखाना चलाते हैं। उनकी एक बेटी है भूमि (अदिति राव हैदरी)। दोनों हंसी-खुशी ज़िंदगी बिता रहे हैं। दोनों के बीच एक मजबूत भावनात्मक रिश्ता है। सब बेहद खुश हैं मगर इस खुशी पर दुख के बादल छा जाते हैं, जब शादी के ठीक 1 दिन पहले भूमि का बलात्कार हो जाता है! शादी टूट जाती है। न्याय मांगने घर अपमानित होकर घर से लौटना पड़ता है। इसके बाद जो होगा वह समझा जा सकता है। जी हां, बाप अपनी बेटी के अपराधियों से बदला लेगा! ठीक इसी तरह की फ़िल्म 'मातृ' और 'मॉम' कुछ समय पहले ही आई थी। उन दोनों और 'भूमि' में फर्क सिर्फ इतना है कि उन फ़िल्मों में माता की जगह इस फ़िल्म में पिता अपराधियों से बदला लेता है।

'भूमि' टुकड़ों-टुकड़ों में बंटी फ़िल्म है। कुछ हिस्से उपजाऊ तो कुछ हिस्से बंजर है। पूरी फ़िल्म मिला कर देखी जाए तो सच्चाई कम नजर आती है! निर्देशक और लेखक जान-बूझकर ज़बर्दस्ती दर्शकों को भावनाओं के समंदर में डूबा देना चाहते हैं और यह एहसास लगातार इंटरवल तक बना रहता है। सीन्स में परफॉर्मेंस तो अच्छे हैं मगर निर्देशक की ईमानदारी और नीयत के अभाव में फॉल्स लगते हैं। बलात्कार जैसे घृणित अपराध पर हाल ही में बनी 'पिंक', 'मातृ' और 'मॉम' जैसी संजीदगी का अभाव पूरी फ़िल्म में बना रहा है। हैरानी की बात है कि 'मेरी कॉम' जैसी संपूर्ण फ़िल्म देने वाले उमंग कुमार ने यह फ़िल्म दी है।

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अभिनय की बात की जाए तो संजय दत्त पूरी तरह छाए रहे। जब तक वो स्क्रीन पर रहते हैं, उनकी सशक्त उपस्थिति आप पर हावी रहती है। अदिति राव हैदरी ने भी अच्छा परफॉर्मेंस दिया है। शेखर सुमन को देखकर लगता है कि निर्देशक ने उन्हें खुला छोड़ दिया था कि जो मन में आए करिए! उनके जैसा समर्थ अभिनेता इतना ओवरएक्टिंग का शिकार क्यों हुआ यह समझ से परे है? हालांकि, शरद केलकर ने भी अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है।

कुल मिलाकर संजय दत्त के चाहने वालों को बाबा की फ़िल्म देखने का मौका लंबे समय बाद मिला है, मगर जो उनके फैन नहीं हैं उन्हें शायद यह फ़िल्म रास ना आए।

जागरण डॉट कॉम रेटिंग: 5 में से 2.5 (ढाई स्टार)

अवधि: 2 घंटे 15 मिनट

By Hirendra J