मुंबई। रॉनित रॉय टीवी पर तो अपनी धाक जमा ही चुके हैं, बड़े पर्दे पर भी वह कमाल कर रहे हैं। फिल्म 'बॉस' में रॉनित खतरनाक विलेन आयुष्मान ठाकुर की भूमिका में दिखेंगे। फिर नजर आएंगे अनुराग कश्यप के बैनर की 'अग्ली' में। रॉनित रॉय से बातचीत के अंश-

आप बेहद तंदरुस्त लग रहे हैं। इस फिट बॉडी का राज क्या है?

एक ही राज है। इस फिल्म के निर्माण से जुड़े लोग मुझे जैसे गलत इंसान के पास पहुंच गए थे। शूट शुरू होने से पहले मैंने निर्देशक, लेखक और निर्माता सबसे साफ कहा कि विलेन के सामने जब एक्शन किंग अक्षय कुमार हो, जिसने एक्शन को रीडिफाइन किया है, उससे विलेन को सोलो फाइट करनी है, तो विलेन को भी उस स्तर का दिखना चाहिए। वरना अक्षय का पात्र असरदार नहीं लगेगा। मैंने सबसे तीन महीने का समय मांगा। अपने जिम इंस्ट्रक्टर के पास गया। उनसे कहा कि मुझे लंबी-चौड़ी कद-काठी चाहिए। मुझे मिहिर विरानी के शेल से बाहर निकलना है। मैंने बगैर स्टेरॉयड के ज्यादा से ज्यादा वर्कआउट किया और नतीजा सामने है।

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यह तो हुई शारीरिक रूप से ढलने की बात। आयुष्मान ठाकुर की शख्सियत में आप कैसे उतरे?

वह पूर्ण रूप से ब्लैक विलेन है। वह जरा भी अच्छा इंसान नहीं है। उसका तकिया कलाम ही है 'मौत से क्यों डरता है, उसे तो लोग यूं ही बदनाम करते हैं। तकलीफ तो जिंदगी देती है।' उस संवाद के बाद तो मेरी आत्मा से काला धुंआ निकलने लगता है। वहां से मुझे किरदार का सुर मिला। कुल मिलाकर शारीरिक और मानसिक तैयारी नहीं होती, तो मैं शायद आयुष्मान का किरदार नहीं निभा पाता।

'अग्ली' में सिगरेट घुमाते हुए आप जो कर रहे हैं, वह प्रभावशाली है..

वह सिगरेट दरअसल सीन में नहीं थी। उस पर हालांकि एक बड़ा बवाल भी खड़ा हो सकता है। बहरहाल अनुराग कश्यप की एक खासियत है कि वह कलाकारों से स्क्रिप्ट पढ़कर काम न करने को कहते हैं। मैं भी उस सीन को फिल्माने बगैर स्क्रिप्ट पढ़े पहुंच गया। टेबल के ड्रॉर में सिगरेट मेरे हाथ आ गई और मैं उसे उंगलियों से घुमाने लगा। बाद में उसका संदर्भ यह आया कि मेरा किरदार दरअसल सिगरेट फूंकने का आदी रहता है, पर वह उसे छोड़ चुका है। फिर भी जब कभी वह स्ट्रेस में होता है, तो वह उसे सिर्फ सूंघता है। दर्शक फिल्म के क्लायमेक्स में देखेंगे कि सिगरेट से हमने क्या पोट्रे करने की कोशिश की है।

तो यह इत्तफाक है कि आपके दोनों किरदार टफ हैं?

जी हां, मगर दोनों किरदार एक-दूसरे से पूरी तरह विपरीत हैं। 'बॉस' फील गुड फिल्म है, पर 'अग्ली' को देख लोग स्तब्ध रह जाएंगे। वह इंसान के अंदर के शैतान पर आधारित फिल्म है। वह बताती है कि वहशीपन हम सबमें है, बस मात्रा का अंतर है। हर जगह लगातार क्राइम बढ़ता जा रहा है। लोग दिन-प्रतिदिन स्वार्थी हो रहे हैं। एक अच्छाई जो हमारे दादा-परदादा की पीढि़यों में हुआ करती थी, वह विलुप्त हो रही है।

(अमित कर्ण)

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