मुंबई। पहले फिल्म 'ब्लू' बना चुके एंथनी डिसूजा अब 'बॉस' लेकर आए हैं। अक्षय कुमार के साथ उनका एसोसिएशन बरकरार है। फिल्म के प्रोमो को दर्शकों की जबर्दस्त प्रतिक्रिया मिली है। एंथनी आश्वस्त हैं कि 'बॉस' बॉक्स ऑफिस पर भी राइट साबित होगी। फिल्म को लेकर बातचीत।

पढ़ें:नीरज की अगली फिल्म में भी दिखेंगे अक्षय

'बॉस' के बारे में क्या कहना चाहेंगे?

यह विशुद्ध रूप से अक्षय कुमार और मसाला फिल्मों में यकीन करने वाले लोगों के लिए है। इसमें वह हर चीज है, जो लोग अक्षय कुमार और मसाला फिल्मों में देखना चाहते हैं। फिल्म में बाप-बेटे की दिल छूने वाली कहानी है। बाप पर जुल्म होता है, तो बेटा उसका बदला लेता है। बाप के रोल में हैं मिथुन चक्रवर्ती और बेटा हैं अक्षय कुमार। बेटा बदला कैसे और किस अंदाज में लेता है, यही फिल्म में दिखाया है। अक्षय के किरदार का नाम बॉस है।

जुल्म डैनी करते हैं या रोनित राय?

फिल्म में एक ही विलेन है आयुष्मान ठाकुर और यह रोल किया है रोनित राय ने। डैनी तो बिग बॉस बने हैं। फिल्म में शिव पंडित का रोल भी अहम है। वे शिव नामक शख्स की भूमिका में हैं। शिव बॉस का छोटा भाई है। फिल्म साउथ की फिल्म 'पोक्करी राजा' की रीमेक है, पर उसे हमने पूरी तरह उत्तर भारतीय रंग में रखा है। सोने पे सुहागा साजिद-फरहाद के संवाद हैं। उन्होंने कहानी हरियाणा में सेट की है।

अक्षय जिस कद के हैं, फिल्म में हीरोइन उस कद की नहीं हैं, क्यों?

फिल्म पूरी तरह बॉस और आयुष्मान ठाकुर की दुश्मनी पर है। हीरोइन के लिए इस फिल्म में ज्यादा गुंजाइश नहीं थी। अब महज दो-चार रोमांटिक सीन करने के लिए हम क्यों बड़ी हीरोइन को साइन करते?

रोनित आपके गहरे दोस्त हैं। उन्हें आयुष्मान ठाकुर जैसे विशुद्ध विलेन के रंग में कैसे ढाला?

रोनित मेरे बचपन के दोस्त हैं। मैं 14 साल का था, जब मैं उनका दोस्त बना। मेरी नौकरी भी उन्हीं के चलते लगी। मैंने उन्हें आयुष्मान ठाकुर का रोल सुनाया, तो वे झट से तैयार हो गए। उन्होंने सिर्फ बॉस जैसे शख्स से लड़ने के लिए आयुष्मान ठाकुर की कद-काठी पर काम किया।

पढ़ें:अक्षय कुमार-हर रोल में फिट और हिट

अक्षय बेहद व्यस्त स्टार हैं। उन्हें मनाना कितना आसान रहा?

फिल्म के निर्माता अश्विन वर्दे उनके बहुत अच्छे दोस्त हैं। हमने डेढ़ साल पहले 'पोक्करी राजा' देखी थी। अच्छी लगी तो अक्षय को उसकी कहानी सुनाई। उन्हें भी बहुत पसंद आई और फिर 'बॉस' की कहानी गढ़ने को कहा। इस फिल्म के असल बॉस वही हैं। यह मास की फिल्म है, क्लास की नहीं।

आपके लिए फिल्में क्या हैं?

मनोरंजन की एक साधन..। मेरी कोशिश यही होती है कि जो लोग अपनी कमाई खर्च कर सिनेमाघर में आते हैं, वे उनकी पूरी वसूली कर सकें।

यानी फिल्मों से एक सोच विकसित नहीं हो सकती?

मैं उस किस्म का डायरेक्टर नहीं हूं, जो फिल्मों में संदेश व मनोरंजन के बीच तालमेल बिठा सके। इस फिल्म में हमने यह कहने की कोशिश की है कि एक पिता जिस सम्मान का हकदार है, उसमें बेटों को कोई कमी नहीं रखनी चाहिए। हर हाल में उसके सम्मान की सुरक्षा होनी चाहिए। यह हर बेटे का पहला और आवश्यक काम है।

कमर्शियल फिल्मों का संसार छोटी फिल्मों के लिए कितना जरूरी है?

मेरे ख्याल से कोई फिल्म छोटी या बड़ी नहीं होती। जो फिल्म स्टार विहीन होती है, उनकी रीच कम हो जाती है। मसलन, 'शिप ऑफ थीसियस' में अक्षय या शाहरुख होते तो उसे रिलीज होने के लिए ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ती।

रीमेक व सीक्वल फिल्में बन रही हैं। इस चलन पर आपकी प्रतिक्रिया?

मैं मंसूर खान के साथ काम कर चुका हूं। वे कहते थे कि किस बेवकूफ ने रीमेक व सीक्वल जैसे शब्द गढ़े। हर निर्देशक अपने मिजाज से फिल्में क्रिएट करता है। अब 'शोले' को मैं बनाऊं या फिर राजकुमार हीरानी तो फिल्म अलग बनेगी न। उसे रीमेक क्यों कहा जाए।

मोबाइल पर ताजा खबरें, फोटो, वीडियो व लाइव स्कोर देखने के लिए जाएं m.jagran.com पर