45 सालों से रंग-मंच को नादिरा बब्बर ने रखा है जिंदा, बताया क्यों फिल्में छोड़ थिएटर पर किया फोकस?
45 वर्षों से थिएटर ग्रुप के माध्यम से रंगमंच की सेवा कर रही हैं नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा एनएसडी की ...और पढ़ें
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45 सालों से थिएटर कर रही हैं नादिरा बब्बर/ फोटो- Instagam

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
स्मिता श्रीवास्तव, मुंबई। नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा की गोल्ड मेडलिस्ट अभिनेत्री नादिरा बब्बर पिछले करीब 45 सालों से अपना थिएटर ग्रुप 'एकजुट' चला रही हैं। उनके लिए रंगमंच सिर्फ अभिनय का माध्यम नहीं, बल्कि आत्म-अभिव्यक्ति और भावनात्मक जुड़ाव का एक गहरा साधन है। वह मानती हैं कि हर नाटक के साथ उनका एक अलग रिश्ता बनता है, क्योंकि हर प्रस्तुति में उनके अनुभव, संवेदनाएं और जीवन के अंश शामिल होते हैं।
मंच पर 'सोलो परफॉर्म' करना नहीं है आसान
हालांकि, वह यह भी स्वीकार करती हैं कि मंच पर 'सोलो' परफॉर्म करना आसान नहीं होता, क्योंकि वहां तुरंत प्रतिक्रिया देने वाला कोई साथी कलाकार नहीं होता। ऐसे में कलाकार को खुद ही अपने अभिनय की तीव्रता, संतुलन और भावनात्मक गहराई को नियंत्रित करना पड़ता है। नादिरा का मानना है कि इस प्रक्रिया में एक सहायक का होना उपयोगी होता है, जो यह संकेत दे सके कि अभिनय सही दिशा में जा रहा है या नहीं।
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मां के संघर्षों पर किया था पहला सोलो नाटक
नादिरा ने अब तक केवल एक ही सोलो नाटक किया है, जिसका नाम 'मेरी मां के हाथ' है। वह बताती हैं, "यह मेरी मां की कहानी है कि कैसे उन्होंने तमाम संघर्षों के बीच हमारा पालन-पोषण किया। वह एक स्कूल टीचर थीं और लेखिका भी।" इस नाटक का मंचन नादिरा ने अपनी मां के गुजरने के बाद किया था।
कैसे पड़ी थिएटर ग्रुप 'एकजुट' की नींव?
अपने थिएटर ग्रुप 'एकजुट' को बनाने को लेकर वह कहती हैं, "मैं सिर्फ रंगमंच करना चाहती थी, इसलिए अपनी संस्था बनाना बहुत जरूरी था। इसका नाम 'एकजुट' इसलिए रखा गया क्योंकि हमें एक साथ आकर काम करना था। इसमें कोई लाइट संभालता है, तो कोई म्यूजिक। एकजुट होकर काम करना ही असली थिएटर है।" नादिरा आगे बताती हैं कि उनके दिल में चाहत थी कि थिएटर ही करना है, इसलिए उन्होंने कम पैसों में भी गुजारा किया। हालांकि, किसी संस्था को बनाना और उसे लगातार चलाना कतई आसान नहीं है।
जेनिफर कपूर और 'पृथ्वी थिएटर' का मिला बड़ा सपोर्ट
अपने पहले नाटक के बारे में बात करते हुए संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित नादिरा कहती हैं, "मेरा पहला नाटक 'यहूदी की लड़की' माना जाता है, लेकिन मैं उससे काफी पहले से नाटक कर रही थी। मैंने अपने वालिद साहब पर एक नाटक किया था, जो काफी कामयाब हुआ था। उसके बाद मैंने बहुत सारे नाटक लिखे और किए। प्रोफेशनली कह सकते हैं कि 'यहूदी की लड़की' पहला था और उसके बाद 'लोअर डेप्थ' किया था।"
वह आगे बताती हैं, "मुझे थिएटर करने में जेनिफर कपूर से बहुत सपोर्ट मिला था, जिन्होंने पृथ्वी थिएटर बनाया था। उन्होंने मेरी बहुत मदद की। अब उनके बेटे कुणाल कपूर इसे चला रहे हैं, जो बहुत ही सकारात्मक और रचनात्मक इंसान हैं।"
फिल्मों के बजाय थिएटर को क्यों चुना?
थिएटर को एक्टर का स्कूल कहा जाता है। इस संदर्भ में नादिरा कहती हैं, "थिएटर जिंदगी की किताब है। यह सिर्फ एक्टिंग के लिए नहीं, बल्कि एक अच्छा इंसान बनने के लिए भी जरूरी है। हालांकि, इसमें बहुत वक्त देना पड़ता है, इसलिए कई कलाकार इसे ज्यादा समय तक जारी नहीं रख पाते हैं।"
फिल्मों के बजाय थिएटर ज्यादा करने को लेकर वह बेबाकी से कहती हैं, "अगर मुझे फिल्मों में बहुत अच्छे पात्र मिलते, तो शायद मैं जरूर करती। लेकिन, मुझे वहां अच्छे रोल नहीं मिले। सिर्फ मां, बुआ या आंटी के रोल में कोई दम नहीं था। थिएटर में मेरे पास बेहतर विकल्प मौजूद हैं।" नादिरा ने बताया कि वह इन दिनों एक नया सोलो प्ले लिख रही हैं, जिसमें वह खुद ही अभिनय भी करेंगी।
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