स्मिता श्रीवास्तव, मुंबई। सितंबर, 1897 को भारतीय सैनिकों ने वीरता की ऐसी दास्तां लिखी थी जिसे दुनिया कभी भूल नहीं पाएगी। इस दिन लड़े गए सारागढ़ी के युद्ध में ब्रिटिश सेना की 36वीं रेजीमेंट (जो अब सिख रेजीमेंट के नाम से जानी जाती है) और अफगान कबीलाइयों के बीच लड़ाई लड़ी गई थी। खास बात है कि भारतीय सैनिक महज 21 थे और अफगान करीब 10 हजार। सुबह से शाम तक चली इस लड़ाई में सभी भारतीय जवान शहीद हो गए थे। इसी घटना पर आधारित है अनुराग सिंह निर्देशित फिल्म ‘केसरी’। फिल्म के सिनेमेटोग्राफर अंशुल चौबे साझा कर रहे हैं फिल्म की शूटिंग से जुड़े किस्से...निर्देशक अनुराग सिंह का पंजाब से ताल्लुक है।

उन्होंने कई पंजाबी फिल्में निर्देशित की हैं। अनुराग ने एक बार कहा था कि उनके पास सारागढ़ी का विषय है। उसी दौरान उनके पास इस फिल्म का प्रस्ताव आया। करण जौहर व अक्षय कुमार ने मिलकर फिल्म प्रोड्यूस की। अनुराग के साथ मैं पांच फिल्में बतौर सिनेमेटोग्राफर कर चुका था। उन्होंने इस फिल्म में मुझे साथ रखा। सारागढ़ी के युद्ध में 21 भारतीय जांबाज सैनिकों ने 10 हजार पठानों से लोहा लिया था। यह लड़ाई सुबह से शाम तक लड़ी गई थी, लेकिन इसकी शूटिंग करीब सौ दिन चली थी। फिल्म की कहानी फाइनल होने के बाद बिल्कुल स्पष्ट था कि उसका लैंडस्केप कैसा होगा। कहानी उत्तरी पश्चिमी इलाकों की पृष्ठभूमि में सेट है, जहां पर घास भी नहीं उगती है। उसके लिए हम जगह भी ऐसी ढूंढ़ रहे थे जहां पर ये चीज दर्शा पाएं। भारत में ऐसी ज्यादा जगहें नहीं हैं। लद्दाख में कुछ हद तक वैसी फीलिंग है। जब हम लोकेशन ढूंढ़ रहे थे तो हमें महाराष्ट्र में वाई के पास वटार गांव मिला। वहां पर बारिश बहुत कम होती है।

अजीब सी बात यह है कि वहां से करीब 80 किमी की दूरी पर महाबलेश्वर है, जहां पर काफी बारिश होती है। हमारे लिए ऐसी जगह मिल पाना काफी लकी फैक्टर था। वहां पर दो सेट बनाए गए। पहला, जहां से हवलदार ईशर सिंह की यात्रा शुरू होती है। उसके बाद सारागढ़ी का सेट, जहां पर पूरी फिल्म शूट हुई है। फिल्म का शुरुआती हिस्सा फिल्म सिटी में शूट किया गया था। करीब 10 हजार पठानों से लड़ाई हुई थी। लड़ाई को देखकर जब तक आडियंस के मन में खौफ पैदा न हो तब तक कुछ अधूरापन लगता।

उसके लिए जरूरी था कि फिल्म का स्केल भव्य हो। फिल्म की शूटिंग जनवरी, 2018 में शुरू हुई थी। लड़ाई के सीक्वेंस परवेज शेख और लारेंस वुडवर्ड ने डिजाइन किए थे। लारेंस हालीवुड फिल्म ‘मैड मैक्स-फरी रोड’ के फाइट डायरेक्टर थे। कहते हैं कि पठानों ने सुबह करीब आठ बजे हमला किया था और शाम के छह बजे तक लड़ाई खत्म हो गई थी, लेकिन हमने फिल्म करीब सौ दिन में शूट की थी। एक दिन के काम को जब आप सौ दिन में करते हैं तो दृश्यों में तारतम्यता बनाए रखना चुनौती होती है। सौ दिन में सूरज की दिशा रोजाना बदलेगी। उस दौरान हमें बारिश, घुमड़ते बादल, तेज हवाएं भी मिलेंगी। इन सबसे जूझकर हमें ऐसा काम करना था जिसे देखकर दर्शकों को झटका न लगे कि अभी सुबह दिख रही थी। अचानक से शाम दिख रही है। तकनीकी तौर पर यह चैलेंजिंग था।

फिल्म निर्माण के दौरान सबसे बड़े सेट पर आग लग गई थी। वह काफी दुखदायी क्षण था। अच्छी बात यह हुई कि उसमें जानमाल की कोई हानि नहीं हुई। बस हमें सारागढ़ी का सेट दोबारा बनाना पड़ा था। हमने लड़ाई के सीक्वेंस को पहले से डिजाइन कर लिया था कि ईशर सिंह किले के अंदर अकेले रह जाते हैं। एक्शन के लिए पूरी तैयारी पहले से की गई थी कि बंदूक के बाद तलवार आएगी। तलवार छूट जाएगी, तब वो तीर से लड़ेंगे, फिर हाथ से। लांस नायक चंदा सिंह का किरदार वंश भारद्वाज ने निभाया था। उनकी शहादत को मृत्यु शैया पर लेटे भीष्म पितामह की तरह दिखाने का आइडिया था। वह तीरों की शैया थी। एक सैनिक जो इतनी वीरता से लड़ता हुआ शहीद हुआ है वह भीष्म पितामह प्रतीत हो। वह आर्टिस्टिक फैसला था। बहरहाल, ‘केसरी’ एक्शन फिल्म थी। उसमें कैमरे का इस्तेमाल सीन के मुताबिक होता है। सबसे ज्यादा छह कैमरे हमने उस सीन में इस्तेमाल किए थे जब पठान दीवार को बारूद से उड़ा देते हैं। हमने दृश्यों को कैद करने के लिए ड्रोन का भी काफी इस्तेमाल किया।

तीन किलो की पगड़ी फिल्म में हवलदार ईशर सिंह का किरदार निभाने वाले अक्षय कुमार समय के पाबंद हैं। उनका शूटिंग सीक्वेंस भले ही लेट हो, लेकिन सेट पर सबसे पहुंचने वालों में अक्षय सर होते थे। उन्होंने जो पगड़ी पहनी थी वह करीब 17 मीटर की थी। उसका वजन करीब तीन किलो रहा होगा। वह सुबह से शाम तक उसे पहने रहते थे। बाकी कलाकारों ने भी भीषण गर्मी में उसे पहने रखा। किसी ने शिकायत नहीं की।

Edited By: Priti Kushwaha