यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jun 04, 2022 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
निर्देशक डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने 'सम्राट पृथ्वीराज चौहान' पर फिल्म बनाने की परिकल्पना को ऐसे किया साकार
राजा दशरथ एकलव्य के बाद सम्राट पृथ्वीराज चौहान ही इस विद्या में प्रवीण थे। अर्जुन बहुत बड़े तीरंदाज थे लेकिन ...और पढ़ें

स्मिता श्रीवास्तव, मुंबई। स्वाधीनता के अमृत महोत्सव का वर्ष भारत के गौरव को पुनर्जाग्रत करने और स्वाभिमान की गुमनाम कड़ियों को जोड़ने का पुनीत समय है। देश को सर्वोच्च मानने वाले निर्देशक डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी उन फिल्मकारों में से हैं, जो इतिहास को राष्ट्रगौरव की कसौटी में परखने में सिद्धहस्त हैं। इस क्रम में ‘चाणक्य’ धारावाहिक उनकी अनुपम कृति सिद्ध हुआ और अब हर तरफ चर्चा हो रही है ‘सम्राट पृथ्वीराज’ की। स्मिता श्रीवास्तव की उनसे बातचीत के अंश...
सम्राट पृथ्वीराज चौहान पर फिल्म बनाने की परिकल्पना कैसे साकार हुई?
मुझे ‘पिंजर’ नहीं बनानी थी। मैं काम तो कर रहा था कृष्ण पर। उन कृष्ण पर, जिनको मैं बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के दृष्टिकोण से देख रहा था। बंकिम बाबू ने ‘श्रीकृष्ण चरित्र’ नाम से पुस्तक लिखी है। वो बहुत भव्य फिल्म होती मगर मेरे पास बजट की समस्या थी। चूंकि वो प्रोजेक्ट नहीं हुआ तो मैंने ‘पिंजर’ बनाई। जैसे ही ‘पिंजर’ खत्म हुई, सोचा वापस इतिहास पर आता हूं। तो पृथ्वीराज रासो पर काम करने के बारे में सोचा। उस समय सनी देओल उसमें काम करना चाहते थे। मैंने पृथ्वीराज रासो पर एक स्क्रिप्ट लिखी। मैं उन्हें यह कहानी सुनाने फ्लोरिडा गया था। उन्होंने कहा कि मैं करूंगा और इसका निर्माता भी बनूंगा, ताकि कोई समझौता न हो। उस समय मार्केट ने उन्हें सपोर्ट नहीं किया। यह वर्ष 2004 की बात है। बीच में मुझसे बहुत सारे लोगों ने कहानी सुनी। उन्होंने कहा कि मुझे यह कहानी बनानी है, लेकिन कौन ऐसा कलाकार है जो इसे करे और उम्मीद हो कि लागत वापस आएगी। कोई यह हिम्मत नहीं कर पाया। अचानक मेरी मुलाकात आदित्य चोपड़ा से दूसरे काम के लिए हुई। वो मुझसे कुछ लिखवाना चाहते थे। तभी उन्होंने पूछ लिया कि आप कुछ निर्देशित नहीं करना चाहते हैं। मैंने कहा, हां करना चाहता हूं। उन्होंने पूछा कि क्या बनाना चाहते हैं? तो मैंने सम्राट पृथ्वीराज के बारे में बताया। उन्हें कहानी पसंद आई। वहां से इस फिल्म की शुरुआत हुई।
सम्राट पृथ्वीराज शब्दभेदी बाण संचालन में प्रवीण थे...
राजा दशरथ, एकलव्य के बाद सम्राट पृथ्वीराज चौहान ही इस विद्या में प्रवीण थे। अर्जुन बहुत बड़े तीरंदाज थे, लेकिन इस विद्या में प्रवीण नहीं थे। शब्दभेदी बाण संचालन की निपुणता हम रामायण में देखते हैं जिसे दशरथ ने चलाया है। ऐसी कळ्छ वजहों से ‘सम्राट पृथ्वीराज’ को फिल्माना बहुत कठिन रहा। अगर मैं इस फिल्म को वर्ष 2004 में बनाता तो यह भव्यता नहीं होती। इस बार तकनीक ने फिल्म बनाने में बहुत मदद की।
चंदबरदाई बने सोनू सूद का लुक आपके चाणक्य के किरदार की याद दिला रहा है...
वो चाणक्य का लुक नहीं है। हमारे यहां जिसे सनातनी ब्राह्मण कहते हैं वो है चंदबरदाई। उनका नाम है पृथ्वीचंद भट्ट। उन्हें अलग रूप भी देना था। सम्राट का नाम है पृथ्वीराज चौहान। चंदबरदाई ने अपने नाम से पृथ्वी इसलिए हटा दिया था क्योंकि जब पृथ्वीराज को बुलाया जाता था तो वो भी देखते थे। तब उन्होंने अपना नाम चंदबरदाई रख लिया।
इस फिल्म की कास्टिंग के बारे में बताएं, किरदार कैसे चळ्ने गए?
जैसे वो जीवन में हैं वैसा ही चरित्र उन्हें दिया गया है। हम लोगों ने तय किया था कि सम्राट पृथ्वीराज के आसपास जितने लोग होंगे, सब छह फुट से ऊपर के ही होंगे। हम लोगों ने सूची बनाई थी कि छह फुट के आसपास कौन-कौन कलाकार हैं। इसलिए सोनू सूद उसमें आए। ऐसी धारणा है कि पृथ्वीराज और चंदबरदाई एक ही दिन पैदा हुए। तो मेरा ज्योतिष के हिसाब से मानना था कि उनका कद-शरीर सब कुछ लगभग समान होना चाहिए। तो मैं अड़ गया था कि चंदबरदाई उतने ही कद का लूंगा जितना अक्षय का कद है। चंदबरदाई काव्य के सम्राट हुए, पृथ्वीराज भू-भाग के सम्राट हुए। दोनों की अपनी-अपनी कीर्ति है।
यह किरदार तो आप भी निभा सकते थे...
(हंसते हुए) मुझे कई लोग कहते थे कि यह किरदार कर लो पर मैंने मना कर दिया। एक तो मुझे अभिनय की एक्साइटमेंट नहीं है। निर्देशक और लेखक के मन में उड़ान की पावर बहुत ज्यादा होती है। उसके नजदीक कोई एक्टर आ जाए तो क्या कहना। फिर मेरा एक्टिंग के लिए वो मोह नहीं रहा।
18 साल से स्क्रिप्ट आपके पास थी तो कितनी एडिटिंग करनी पड़ी?
जो मैंने शुरू में लिखी थी अगर उसे बनाता तो फिल्म तीन घंटे से ऊपर हो जाती। जब आप शूट करके फिल्म की एडिटिंग करें तो निर्माता का भी नुकसान होता है और अभिनेता का भी क्योंकि इसमें उसकी ऊर्जा लगी होती है। आदित्य साहब का यही आग्रह था कि उतना ही रखना जितना कि हम शूट करने वाले हैं। शुरुआती 130-140 पेज की स्क्रिप्ट थी। फाइनल स्क्रिप्ट 80 पेज की थी। (हंसते हुए) मजाक में एक बात मैं अभी कहता हूं कि उसी स्क्रिप्ट में एक मिनी सीरीज अभी भी बना सकता हूं मैं।
सम्राट पृथ्वीराज के लिए देश सर्वोपरि था...
इसीलिए तो फिल्म बनाई है। देश से बढ़कर कुछ नहीं। रामायण में श्रीराम कहते हैं जननी जन्मभूमि। उसके लिए एक आदमी क्या-क्या कर जाता है। मुझे कोई पूछे तो असंभव को संभव बनाना आदमी के संकल्प से होता है। उस संकल्प का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण सम्राट पृथ्वीराज चौहान हैं। विश्व के इतिहास में ऐसा उदाहरण शायद ही कोई मिलेगा कि जो हार चुका है, जो बंदी है, वो अपने शत्रु को मारता है, यह कहीं नहीं सुना। यही सम्राट पृथ्वीराज चौहान की विजय है।
ऐसे किरदारों के लिए मेथड एक्टिंग की जरूरत होती है पर अक्षय कुमार मेथड एक्टिंग नहीं करते...
अच्छा है वो नहीं करते। स्कूलिंग हमेशा अच्छी होती है। वो आपके क्षितिज को नया विस्तार देती है, लेकिन अक्षय किसी स्कूल से नहीं आए हैं। वो हमेशा यही कहते हैं कि मैं वही करूंगा जो निर्देशक चाहते हैं। खाली समय में आप उन्हें देखें, हंस-हंसकर लोटपोट हो जाएंगे। वह कई बार कहते हैं कि अपने आसपास के लोगों को हंसने के पैसे देता हूं। (हंसते हुए) मैं इनका एंटरटेनमेंट कर रहा हूं। उनका यही कहना था कि डा. साहब आप मुझे जो करने को कहेंगे, मैं वो कर दूंगा।
इतिहास पर फिल्म बनाने वाले लोग कम हैं...
उसकी वजह है बजट, वरना तो एक से एक वीर हैं हमारे यहां। दूसरी बात, कुछ उदाहरण छोड़ दिए जाएं तो इतिहास पर बनी फिल्में सफल नहीं होतीं। इस पर लोग कहते हैं कि इतिहास पर फिल्में नहीं चल रहीं जोकि अर्धसत्य है। फिल्में तो 90 प्रतिशत दूसरी भी नहीं चल रही हैं, लेकिन यह कहना बड़ा आसान हो जाता है कि ऐतिहासिक फिल्म थी इसलिए नहीं चली। मुझे याद है कि जब लगान का पोस्टर लगा हुआ था तो इस शहर (मुंबई) में लोग कहते थे एक धोती वाला देखना मुश्किल है, 11 धोती वाले कैसे देखेंगे। उस फिल्म ने इतिहास रचा। उम्मीद है कि हम उससे भी आगे आएंगे।