मुंबई ब्यूरो, प्रियंका सिंह। सिनेमा किसी भी दौर की झांकी पेश कर सकता है। ‘लगान’, ‘द लीजेंड आफ भगत सिंह’, ‘केसरी’ जैसी फिल्मों ने अत्याचारी अंग्रेजों के खिलाफ सूझबूझ से लड़ते नायकों की कहानी के जरिए देशभक्ति के भावों को पुख्ता किया, वहीं ‘तान्हाजी- द अनसंग वारियर’, ‘बाजीराव मस्तानी’, ‘पानीपत’ जैसी फिल्में वीर मराठाओं के शौर्य की बानगी हैं। आगामी दिनों में भी कई कहानियां दर्शकों को ऐसे दौर में ले जाएंगी, जिसके बारे में उन्होंने सिर्फ सुना और पढ़ा होगा। इनमें ‘पृथ्वीराज’, ‘आरआरआर’ , ‘राधे श्याम’, ‘केजीएफ चैप्टर 2’, ‘मैदान’, आदिपुरुष’ फिल्में शामिल हैं। अनदेखे दौर को सिनेमा के पर्दे पर गढ़ने की चुनौतियों की एक पड़ताल....

आने वाली हैं ये पीरियड फिल्में

देश के इतिहास में गौरवान्वित करने वाली अनेक कहानियां हैं, जिन्हें सिनेमा के पर्दे पर जीवंत करने में फिल्ममेकर्स की हमेशा से रुचि रही है। आने वाले दिनों की बात करें तो भारतीय क्रिकेट टीम के विश्व विजेता बनने पर कबीर खान निर्देशित फिल्म ‘83’ क्रिसमस पर रिलीज होगी। उसके बाद ‘पृथ्वीराज’, आरआरआर’, ‘राधे श्याम’, ‘गंगूबाई काठियावाड़ी’, ‘शमशेरा’, ‘केजीएफ- चैप्टर 2’, ‘मैदान’, ‘आदिपुरुष’ जैसी कई पीरियड फिल्में रिलीज होने की कतार में हैं। पीरियड फिल्मों को बनाने से पहले काफी रिसर्च की जाती है। उस तरह का सेट खड़ा किया जाता है। कलाकारों को भी पीरियड या उस सदी के मुताबिक चाल-ढाल से लेकर बातचीत के अंदाज पर काम करना पड़ता है। भारत-पाकिस्तान विभाजन के बैकड्राप पर बनी फिल्म ‘गदर- एक प्रेम कथा’ की सीक्वल की इन दिनों शूटिंग हो रही है। फिल्म के निर्देशक अनिल शर्मा बताते हैं, ‘जब मैं ‘गदर- एक प्रेमकथा’ बना रहा था, तब इंटरनेट की मदद लेने के बजाय दिल्ली, मुंबई के पुस्तकालयों में लोगों को भेजकर किताबें मंगाई थीं। कई डाक्यूमेंट्रीज देखीं, उससे तय किया कि क्या शूट करना है। पीरियड फिल्मों की शूटिंग आम फिल्मों से मुश्किल होती है। लखनऊ में हमने लाहौर का सेट लगाया था। शाट लेने के लिए पहले हमें लोगों के घरों पर लगे टीवी एंटीना को निकालना पड़ता था। जहां हम शूटिंग कर रहे थे, वहां सड़कों पर ऊर्दू में पाकिस्तान के स्लोगन और वहां के विज्ञापनों को लगाया था।’

बीते दौर को पर्दे पर गढ़ना दिलचस्प

कम ही निर्देशक हैं, जो पीरियड ड्रामा बनाने में माहिर हैं। उनमें आशुतोष गोवारिकर का नाम शामिल है। ‘लगान’, ‘जोधा अकबर’, ‘पानीपत’ जैसी फिल्में बना चुके आशुतोष कहते हैं, ‘ मुझे पीरियड फिल्में बनाना अच्छा लगता है, क्योंकि एक अलग दुनिया बनाने का मौका मिलता है। एक ऐसी दुनिया जिसके बारे में हम सुन चुके हैं, इतिहास में पढ़ चुके हैं, लेकिन हमें पता नहीं है कि वो समाज क्या था, वो लोग कौन थे, उनका रहन-सहन कैसा था। उस दुनिया को बनाना दिलचस्प होता है। उस दौर की सामाजिक, राजनीतिक संस्कृति और मुद्दे क्या थे। जैसे मेरी पिछली फिल्म ‘पानीपत’ को देखें तो लोगों को पता नहीं था कि उस लड़ाई में क्या हुआ था। उस कहानी को कहना जरूरी था। पीरियड फिल्में बनाने में सबसे बड़ी चुनौती है कि आपके पास उन्हें बनाने को लेकर वक्त कितना है। प्री प्रोडक्शन पर काम करना पड़ता है। उसके लिए अगर वक्त नहीं है तो फिल्म नहीं बना सकते हैं। मेरी फिल्मों की संख्या कम है, क्योंकि हर फिल्म को बनाने में दो से तीन साल लग जाते हैं।’

मिनिएचर सेट से शुरू होता है काम

‘कलंक’ और ‘मणिकर्णिका- द क्वीन आफ झांसी’ जैसी फिल्मों के प्रोडक्शन डिजाइनर कौशल चौधरी कहते हैं, ‘पीरियड फिल्मों के परिवेश को दर्शाने में आप लिबर्टी नहीं ले सकते हैं। आप जो भी बना रहे हैं, उसके बारे में दर्शकों ने पढ़ा होता है। आपका सेट उनकी उस कल्पना से मैच करना चाहिए। विजुअलाइजेशन से सेट बनाने का काम शुरू होता है। पीरियड फिल्मों में जानवरों का इस्तेमाल भी खूब होता है। नकली जानवर भी बनाने पड़ते हैं, जैसे हमने ‘मणिकर्णिका’ के लिए नकली घोड़ा बनाया था। वह बिल्कुल असली घोड़ा जैसा दिख रहा था। कोई भी सेट खड़ा करने से पहले हम हूबहू मिनिएचर सेट बनाते हैं यानी उसका छोटा प्रतिरूप। मिनिएचर सेट से कैमरामैन और निर्देशक को अंदाज आता है कि कहां से कैमरा घुमाएंगे, ड्रोन कहां से आएगा, कितने कैमरे कहां-कहां लगेंगे, किस हिस्से में शूटिंग करनी है। हमारी फिल्म इंडस्ट्री में बहुत अच्छे कारीगर हैं। अगर किसी महल का सेट है तो भव्यता देने के लिए कारीगर प्लास्टर आफ पेरिस को रंगों की मदद से ब्रास, कापर, सोने-चांदी जैसा दिखाते हैं। ‘मणिकर्णिका’ के लिए हम उन जगहों पर भी गए थे, जहां झांसी की रानी गईं थीं। झांसी के म्यूजियम के अंदर जो हथियार थे, उनकी तस्वीरें खींची। तस्वीरों में उनके हाथों में जो तलवार थी, हूबहू वैसी ही बनाई। बैकग्राउंड में जो तोप थी, वैसी ही तोप तैयार की। हमने छह हजार तलवारें, छह हजार ढालें बनवाई थीं। हमारा काम फिल्म शुरू होने से लगभग छह महीने पहले शुरू होता है। सीन के मुताबिक हमें सेट लगाना होता है। क्रू को रिहर्सल करवाना होता है।’

तकनीक ने काम किया आसान

पांच बार राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता संतोष सीवन लेखक-निर्देशक होने के साथ सिनेमेटोग्राफर भी है। उन्होंने हिंदी में पीरियड फिल्म ‘अशोका’ का निर्देशन किया है, जबकि साउथ में ‘बिफोर द रेन्स’ समेत कई पीरियड फिल्में बनाई हैं। वह कहते हैं, ‘जब आप पीरियड फिल्म बनाते हैं तो अपनी दुनिया खुद गढ़ते हैं। अब पीरियड फिल्मों को बनाना आसान हो गया है। मैंने ‘अशोका’ जब बनाई थी, तब इतना वीएफएक्स का काम नहीं होता था। अब तकनीक का बहुत सपोर्ट है। पहले युद्ध के दृश्यों को शूट करना आसान नहीं था।

उन्हें वास्तविक रूप से शूट किया जाता था। फिल्म के लिए हाथियों को लाया गया था। उनका रख-रखाव आसान नहीं था।’ कैमरावर्क को लेकर संतोष कहते हैं, ‘सिनेमा में विजुअल रोचक होने चाहिए। भाषा चाहे मलयालम, तमिल, हिंदी या अंग्रेजी हो, उससे फर्क नहीं पड़ता। विजुअल की भाषा संस्कृति के बारे में बहुत कुछ कह जातीहै। यह दर्शकों को कहानी से जोड़ती है। अब उसे तकनीक की मदद से आसानी से बनाया जा सकता है। कई बार चीजों को वास्तविकता से इतर काफी भव्य भी दिखा सकते हैं।’ भावुक कर देते हैं शूटिंग के पल: सच्ची घटना पर बनी फिल्मों के दृश्य कई बार कलाकारों को भावुक कर जाते हैं। फिल्म ‘83’ में उपकप्तान मोहिंदर अमरनाथ का किरदार निभाने वाले साकिब सलीम विजेता बनने के पलों की शूटिंग को लेकर कहते हैं, ‘हम लाड्र्स की बालकनी में खड़े थे। वह सीन शूट कर रहे थे, जब भारतीय टीम विश्व विजेता बनती है और वल्र्ड कप की ट्राफी उठाती है। टेक से पांच मिनट पहले कबीर सर माइक पर बोलते हैं कि सारी मैं बताना भूल गया कि हम रियल वल्र्ड कप ट्राफी के साथ शूट करेंगे। फिर एक महिला आती हैं, ग्लव्स पहने दो सिक्योरिटी वालों के साथ उन्होंने ट्राफी टेबल पर रखी। हम 13 लड़के रोने लग गए। भावुक पल था। एक-दूसरे को गले लगाते हुए कहा कि इससे पहले जुहू की गलियों में क्रिकेट खेलते थे। लाड्र्स में खड़े होकर वह ट्राफी उठा रहे थे जो कपिल देव सर ने उठाई थी। कई ऐसे सीन थे, जिनसे कनेक्शन महसूस हुआ था। यह फिल्म उस चैप्टर के बारे में है, जिसने हमारे देश को दुनिया में पहचान दिलाई।’

फिल्में जो सुनाएंगी पुरानी दास्तां

83: वर्ष 1983 में भारतीय क्रिकेट टीम के विश्व विजेता बनने की कहानी दर्शाती इस फिल्म का निर्देशन कबीर खान ने किया है।

पृथ्वीराज: अभिनेता अक्षय कुमार वीर योद्धा पृथ्वीराज चौहान के किरदार में होंगे। पूर्व विश्व सुंदरी मानुषी छिल्लर इस फिल्म से डेब्यू कर रही हैं।

आरआरआर: दक्षिण भारतीय अभिनेता राम चरण और जूनियर एनटीआर अभिनीत फिल्म ‘आरआरआर’ पिछली सदी के दूसरे दशक के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों अल्लूरी सीताराम राजू व कोमाराम भीम के जीवन पर आधारित है। फिल्म का निर्देशन एसएस राजामौली ने किया है।

राधे श्याम: यह पीरियड साइंस फिक्शन रोमांटिक फिल्म होगी। प्रभास और पूजा हेगड़े फिल्म में मुख्य भूमिकाओं में नजर आएंगे।

गंगूबाई काठियावाड़ी: संजय लीला भंसाली की यह फिल्म लेखक और पत्रकार एस हुसैन जैदी की किताब माफिया क्वीन्स आफ मुंबई पर आधारित है। गंगूबाई काठियावाड़ी की भूमिका में आलिया भट्ट हैं और कहानी पिछली सदी के छठवें दशक में सेट है।

शमशेरा: रणबीर कपूर अभिनीत यह पीरियड एक्शन ड्रामा फिल्म है।

केजीएफ चैप्टर 2: वर्ष 2018 में रिलीज फिल्म ‘केजीएफ चैप्टर 1’ का दूसरा भाग है। फिल्म की कहानी वर्ष 1950-1981 के बीच में सेट है। कन्नड़ सुपरस्टार यश फिल्म में मुख्य किरदार में हैं।

मैदान: यह फिल्म वर्ष 1950-1963 तक भारतीय फुटबाल टीम के कोच और मैनेजर सैयद अब्दुल रहीम की बायोपिक है। अजय देवगन सैयद अब्दुल रहीम का किरदार निभाएंगे।

आदिपुरुष: इस फिल्म का निर्देशन ओम राउत कर रहे हैं। रामकथा पर आधारित इस फिल्म में श्रीराम के किरदार में प्रभास, वहीं लंकेश के किरदार में सैफ अली खान होंगे।

चौकन्ना रहना पड़ता है

फिल्म ‘पानीपत’ में सदाशिव राव की भूमिका में नजर आ चुके अर्जुन कपूर कहते हैं, ‘ बतौर एक्टर आपके पास कुछ नया करने के बहुत कम मौके होते हैं। एक समय बाद लोग आपको टाइपकास्ट करना शुरू कर देते हैं। मेरे लिए यही मौका था। पानीपत की लड़ाई हुई थी, लेकिन इसके बीच में क्या हुआ था यह बहुत से लोगों कोपता नहीं

है। हमें सिर्फ नतीजा और जंग दिखती है, लेकिन उसके सफर के बारे में नहीं पता होता। इस फिल्म के जरिए लोगों को पता चला कि हिंदुस्तान के नक्शे को बरकरार रखने के लिए मराठा साम्राज्य ने क्या भूमिका निभाई थी। यह सबसे कठिन जानर है। कभी-कभी शूट करते हुए तलवार टूट जाती थी, सैकड़ों कलाकारों में से किसी एक ने भी आज के दौर की हिंदी बोल दी तो शाट फिर से लेना पड़ता था। पीरियड फिल्म में सबको हमेशा चौकन्ना रहना पड़ता है। यह बड़ा टीमवर्क है।’

Edited By: Ruchi Vajpayee