नई दिल्ली, जेएनएन। बिहार के चंपारण जिले से हैं अभिनेता मनोज बाजपेयी। हाल ही में उनका पहला भोजपुरी रैप 'बंबई में का बा' रिलीज हुआ। इस गीत में पलायन का दर्द छलकता है। फिल्म 'सूरज पर मंगल भारी' और वेब सीरीज 'फैमिली मैन' के सीजन-2 में जल्द नजर आने वाले मनोज से बातचीत के अंश...

यह म्यूजिक वीडियो करने की असल वजह क्या थी?

इसकी वजह इस गीत के निर्देशक अनुभव सिन्हा हैं। वह भोजपुरी में कुछ करना चाहते थे। लॉकडाउन के दौरान जिस प्रकार मजदूरों का पलायन हुआ, तब उनके दिमाग में यह आइडिया आया। इसके बाद उन्होंने प्रसिद्ध कवि डॉ. सागर से कुछ लिखने को कहा।

भोजपुरी फिल्मों से जुड़ी बचपन की कुछ यादें साझा करें...

हिंदी हो या भोजपुरी, मैंने बहुत फिल्में देखी हैं। सुजीत कुमार काफी भोजपुरी फिल्में करते थे। 'नदिया के पार' के गाने मैं आज भी नहीं भूला। 'हे गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो' गाना अभी भी याद है।

गीत के जरिए बड़े शहरों में होने वाली किन दिक्कतों को बयां करेंगे?

जो बड़े शहर में पैदा हुए हैं उनकी भी दिक्कतें हैं। भागमभाग की जिंदगी है। आदमी एक मशीन है, जब तक वह चल रहा है तब तक सब सही है। जब वह चलना बंद कर देता है तो सब रुक जाता है। एक-दूसरे से मिलना-जुलना नहीं है। आपसी सामाजिक संबंधों की कमी है। हर आदमी एक-दूसरे को खींचता-धकेलता आगे जाने की कोशिश में है।

अपनी जड़ों से जुड़े रहने के लिए आप क्या प्रयास करते हैं? नई पीढ़ी के लिए जड़ों से जुड़े रहने की अहमियत कैसे बयां करेंगे?

जड़ों से जुड़े रहने के लिए आपको प्रयास करने की जरूरत नहीं होती। हम जैसे लोग जड़ से ही जुड़े हैं, उससे कभी अलग हुए ही नहीं। मैं अपने आपमें पूरा गांव हूं। मेरे हिसाब से मैं अकेले नहीं चलता, पूरा गांव साथ चलता है। यह मुझमें बसा है। मैं बिहार के पश्चिमी चंपारण जिला अंतर्गत गौनाहा प्रखंड के बेलवा गांव की पैदाइश हूं। 18 साल तक वहीं रहा। मेरे माता-पिता अधिकांश समय वहीं रहते हैं। दोस्तों-यारों के गांव से आने-जाने से ज्यादा कुछ सच मुझे लगता नहीं। उनसे जुड़ने का प्रयास नहीं करता, हमेशा जुड़ा रहता हूं। जहां तक नई पीढ़ी की बात है मैं कोई संदेशवाहक नहीं। मैं हमेशा कहता हूं जिसको जो अच्छा लगे, वो करे। यह बात सही है कि जो आदमी जड़ों या वास्तविकता से जुड़ा रहता है उसमें अनोखी बात होती है और कुछ नयापन भी होता है। वह अपनी जड़ों और गांव को साथ लेकर चलता है साथ ही शहर की कुछ अच्छी चीजों को भी ले लेता है। मैं यही कहूंगा कि जो शहरों में हैं वे देखने की कोशिश करें कि असली हिंदुस्तान कहां है। असली हिंदुस्तान तो शहर के बाहर ही है।

भोजपुरी सिनेमा की काफी आलोचना होती है। इसका स्तर सुधारना कितना जरूरी मानते हैं?

स्तर सुधारने वाले हम कौन होते हैं। भोजपुरी अपने आपमें एक भाषा है। इसमें लोग काम कर रहे हैं और जैसा वो ठीक समझ रहे हैं, वैसा कर रहे हैं। मुझे उनसे कभी कोई शिकायत नहीं थी। भोजपुरी का अपना डिस्ट्रीब्यूशन का चक्र है बस व्यवस्थित करने की जरूरत है ताकि और लोग भी फिल्में बना सकें। सिनेमाघरों में प्राथमिकता से उन्हें शो मिलें, जैसे मराठी फिल्मों को महाराष्ट्र सरकार ने सपोर्ट किया है। पंजाब, बंगाल और केरल में आप देखें। क्षेत्रीय इंडस्ट्री तभी अच्छा कर सकती है जब उसे राज्य सरकार का सहयोग मिले।

कोविड-19 की वजह से फिल्मों के कामकाज की शैली में काफी परिवर्तन आया है। आपको कौन से परिवर्तन सुखद लगे?

इंसान खुद को किसी भी हालात में ढाल ही लेता है। फिलहाल कोई सुखद स्थिति नहीं है। हम चाहेंगे यह स्थिति जल्द से खत्म हो ताकि हम वापस सामान्य जीवन व्यतीत करें और अपना काम करें। (स्मिता श्रीवास्तव से बातचीत पर आधारित)  

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