नई दिल्ली, जेएनएन।  भारतीय फ़िल्मों के पितामह दादा साहब फालके ने फ़िल्म बनाने के लिए कमर कस ली थी। तमाम दिक्कतों के बाद फाइंनेसर मिल गया। जर्नलिस्ट मित्र की मदद से इंस्ट्रूमेंट और जरूरी केमिकल्स मंगाए। इसके बाद भी फ़िल्म के सामने एक समस्या खड़ी थी। दादा साहब को एक महिला की तलाश थी, जो  'राजा हरिश्चंद्र' में रानी तारावती का किरदार निभा सके। फ़िल्म रिलीज़ हो गई, लेकिन दादा साहब को यह महिला नहीं मिली। इस किरदार को पुरुष ने ही निभाया...

ये बातें आज के दौर में काल्पनिक लगती होगीं, लेकिन इसकी अपनी सच्चाई है। महिलाओं को भारतीय सिनेमा में इस स्तर तक पहुंचने के लिए बहुत कठिनाइओं का सामना करना पड़ा। हालांकि, आज भी सिनेमा के गलियारों में यह सवाल गूंजता है कि क्या महिलाओं के साथ सौतेला व्यवहार किया जाता है। जब पूरी दुनिया आज के दिन को महिला दिवस के रूप में मना रही है, तो हम जानने की कोशिश कर रहे हैं कि आखिर हिंदी सिनेमा का नज़रिया महिलाओं के प्रति कितना बदला है? फ़िल्म मेकिंग में उनका प्रतिनिधित्व कितना बढ़ा है?

फ़ीस का फ़साना

सिल्वर स्क्रीन पर जब कोई हीरोइन आती है, तो वह (स्क्रीन) काफी कलरफुल दिखती है। एक किस्म की भव्यता लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती है। इसके पीछे के रंग इतने सफ़ेद नहीं हैं। इसमें कुछ हिस्से स्याह भी हैं।  काम के लिए किए जाने वाला भुगतान हमेशा से हिंदी सिनेमा में एक मुद्दा रहा है। पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं को कम पैसे दिए जाते हैं। ऐसी फ़िल्में देखने को मिल जाती हैं, जिनमें पुरुष अभिनेता को दी जाने वाली रकम बजट के बराबर हो। वहीं, अमूमन महिला किरदारों को लेकर ऐसा नहीं होता है।

इंडिया टुडे को दिए गए एक इंटरव्यू में 'थप्पड़', 'सांड की आंख' और 'पिंक' जैसी महिला केंद्रित फ़िल्मों में काम कर चुकी तापसी पन्नू कहती हैं, 'मुझे सिर्फ़ एक शिकायत है कि हमें मिलने वाली सैलरी में असमानताएं हैं। महिला प्रधान फ़िल्म में एक हीरो की सैलरी उसके बजट के बराबर होती है। उसमें भी मुझे बोला जाता है, आप थोड़ा कम चार्ज कर लो ना। कॉस्ट कटिंग करेंगे, क्योंकि यह महिला क्रेंदित फ़िल्म है। ये चीजे दुख पहुंचाती हैं।'

चित्रण की चिंता

बात सिर्फ मेहनताना की नहीं है। फ़िल्मी दुनिया में सवाल महिला किरदारों के चित्रण का भी है। उन्हें पर्दे पर किस तरीके से दिखाया जाता है, यह लगातार चर्चा का विषय रहा है। हिंदी सिनेमा में ऐसी फ़िल्मों की लिस्ट बहुत लंबी है, जिसमें महिलाओं को 'इंसान' से हटकर 'सामान' की तरह दिखाया जाता है। हालांकि, ऐसा नहीं है कि ऐसा शुरु से होता आया हो। समय-समय पर ऐसी फ़िल्में आती रही हैं, जिसमें महिला किरदार को काफी सशक्त दिखाया गया है। मदर इंडिया में नरगिस का किरदार आज भी सिनेमा में महिला चित्रण के लिए माइलस्टोन है।

आज के दौर में एक्ट्रेस भी महिला किरदारों के लिए आगे आई हैं। हिंदुस्तान टाइम्स को दिए एक इंटरव्यू में भूमि पेडनकर कहती हैं, 'मैं ऐसी फ़िल्म करने में असहज हूं, जिसमें हीरो लड़की के साथ हदें पार करता हो। वहीं, इसे लोग पसंद कर रहे हों। मैं किसी महिला विरोधी फ़िल्म का हिस्सा नहीं बन सकती हूं।' 

हालांकि, पिछले कुछ समय से देखने को मिला है कि सशक्त महिला  और महिला किरदारों को लेकर फ़िल्म बन रही हैं। 'थप्पड़', 'राजी', 'छपाक', 'पिंक', 'मिशन मंगल' और 'कहानी' जैसी कई फ़िल्में इस कतार में शामिल हैं। ऐसी कहानियों पर काम किया जा रहा है, जो यह बताती हैं कि महिला सिर्फ भौतिकता का प्रतीक नहीं हैं।

निर्देशकों की नियती

किरदारों के साथ ही साथ पर्दे के पीछे खड़ी महिलाएं भी खुद को मजबूत कर रही हैं। डायरेक्शन हो, सिनमेटोग्राफी हो, या प्रोड्यूसिंग... महिलाओं ने अपने आपको मजबूत किया है। कई एक्ट्रेस फ़िल्म प्रोड्यूस करती नज़र आ रही हैं। अनुष्का शर्मा, प्रियंका चोपड़ा और दीपिका पादुकोण लगातार फ़िल्मों पर अपना पैसा लगा रही हैं। वहीं, जोया अख्त़र, कोकणा सेन शर्मा, अश्वनी अय्यर तिवारी, रीमा कागती और फराहा ख़ान निर्देशन के दुनिया में महिलाओं का प्रतिनिधित्व कर रही हैं।

पीपली लाइव की निर्देशक राजश्री झा ने अपनी फ़िल्म के रिलीज़ के वक्त हॉलीवुड रिपोर्ट्स से बात करते हुए कहा था,  'पहली फ़िल्म में हमेशा मुश्किल होती है। लेकिन एक महिला होने के बाद यह ज्यादा मुश्किल होती है। आप चिंतित होती हैं कि क्या कोई आपको यहां गंभीरता से लेगा?' 

राजश्री अपने बयान में महिला निर्देशक के दर्द को बंया कर रही हैं, जो सिनेमा में उन्हें मिल रहा है।

नो मींस मीटू

दर्द का स्तर तब और बढ़ जाता है, जब मामला उत्पीड़न और यौन उत्पीड़न तक पहुंच जाता है। फ़िल्मी ख़बरों में अक्सर कास्टिंग काउच का नाम सुनाई दे जाता है। यह पर्दे के पीछे महिलाओं के सामने यह एक बड़ी समस्या बनकर खड़ा है। हालांकि, पिछले कुछ समय में हिंदी सिनेमा में महिलाओं ने इसके खिलाफ़ आवाज़ उठाई है। उन्होंने सामने आकर कहा कि हम इसे अब और नहीं सहेंगे। मीटू के जरिए महिलाएं सामने आईं। एक माहौल बना और बड़े-बड़े लोगों के नाम भी सामने आए हैं।

हम साथ-साथ हैं

बड़े-बड़े नाम भी बड़े-बड़े काम करते हैं। महिलाओं को लेकर पुरुषों भी ने फ़िल्मी रुढ़वादिताओं को तोड़ा है। करण जौहर ने सबसे पहले यह कहा कि वह अपनी फ़िल्मों में एक्ट्रेस को प्रोड्यूसर का दर्जा देंगे। शाहरुख़ ख़ान ने हीरो से पहले हीरोइन का नाम फ़िल्म क्रिडेट स्क्रोल में लेकर आए। तापसी पन्नू बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में अक्षय कुमार की तारीफ़ करती हैं। इसके पीछे वज़ह देती हैं कि वह बतौर सुपरस्टार वो 'मिशन मंगल' जैसी महिला प्रधान फ़िल्म का हिस्सा बने, जिसमें विद्या बालन का किरदार फ़िल्म में प्रधान था।

हालांकि, इसी इंटरव्यू में तापसी एक अलग विचार भी रखती हैं। यह भी कहती हैं कि कई महिला प्रधान फ़िल्में आई हैं और दर्शको ने उन्हें पसंद भी किया है। महिला प्रधान फ़िल्मों में स्टार अभिनेता नज़र नहीं आते हैं। उनका मनाना है ये स्टार अपने अभिनय को लेकर असुरक्षित हैं। वहीं, उन्हें लगता है कि ऐसी फ़िल्मों का हिस्सा बन उनका स्टार पावर कम हो जाएगा।

हालांकि, इन सभी मुद्दों को लेकर महिलाएं लड़ रही हैं, झेल भी रही हैं, लेकिन दीवार की तरह इनके सामने खड़ी हैं और मुख़र भी हैं।

Posted By: Rajat Singh

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