40's की सुपरस्टार... भारत में रही नंबर वन, पाकिस्तान में मिली गुमनामी; वो एक्ट्रेस जिसे बंटवारे ने छीन लिया
30-40 के दशक की भारतीय सिनेमा में एक ऐसी सुपरस्टार और गायिका आईं जिनके फैन के.एल. सहगल भी हो गए, ...और पढ़ें

भारत में नंबर वन, पाकिस्तान में हुईं गुमनाम

समय कम है?
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एंटरटेनमेंट डेस्क, नई दिल्ली। भारतीय सिनेमा का वो दौर जब अभिनेता ही अभिनेत्री बनते थे, क्योंकि फिल्मों में महिलाओं का काम करना तब बहुत खराब माना जाता था। धीरे-धीरे सिनेमा की हवाएं बदलीं तो एक ऐसी अभिनेत्री आई, जो सिंगर भी बनी और एक्ट्रेस भी। उस चमकीले पर्दे पर चमकने के लिए खूब संघर्ष भी किया।
संगीत को अपना सबकुछ मानकर उन्होंने खूब नाम भी कमाया, लेकिन विभाजन की दीवार ने उनके सपने तोड़े और फिर वो पाकिस्तान में जाकर गुमनाम हो गईं। आज कहानी उसी कलाकार की, जो थी 30 के दशक की सुपरस्टार...
कौन थीं खुर्शीद बानो?
आज जिनकी हम बात कर रहे हैं उनका नाम है खुर्शीद बानो (Khursheed Bano)। के.एल. सहगल के साथ उनकी जोड़ी ने 'भक्त सूरदास' और 'तानसेन' जैसी फिल्मों से सफलता के वो कीर्तिमान रचे, जिन्होंने संगीत प्रधान फिल्मों की नींव रखी।
खुर्शीद बानो सिर्फ एक अभिनेत्री नहीं, बल्कि भारतीय फिल्म संगीत के शुरुआती दौर की सबसे सुरीली पहचान थीं। लेकिन वक्त का पहिया पलटा और फिर वो सिनेमा से गायब हो गईं। हालांकि उनके गायब होने के पीछे कोई और नहीं बल्कि वह खुद ही थीं।
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शहजादी से कैसे बनीं खुर्शीद?
खुर्शीद बानो का जन्म 14 अप्रैल 1914 को पाकिस्तान में हुआ था। उनका असली नाम इर्शाद बेगम था। बचपन से ही उन्हें गाने का बड़ा शौक था। अब जब शौक गाने का था तो उन्होंने इसकी शिक्षा भी ली। परिवारवाले इससे ज्यादा खुश नहीं थे और वो नहीं चाहते थे कि खुर्शीद सिनेमा में जाएं या संगीत सीखें।
हालांकि उनके शुरूआती जीवन की ज्यादा जानकारी तो नहीं है, लेकिन हां कहा जाता है कि जब वो बड़ी हो रही थीं तो अपनी मौसी के साथ लाहौर से कलकत्ता आ गईं। उस दौर में बंबई नहीं बल्कि सिनेमा का मुख्य केंद्र कलकत्ता को माना जाता था।
फिल्मों में ऐसे आईं खुर्शीद बानो
संगीत की शिक्षा लेते-लेते खुर्शीद बानो फिल्मों में आ गईं। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत मूक फिल्मों यानि साइलेंट फिल्मों से की। आई फॉर ए आई नाम की फिल्म से खुर्शीद ने सिनेमा में कदम रख दिया। हालांकि कुछ लोग कहते हैं कि उनकी पहली फिल्म लैला मजनू थी। ये वही साल है जब बोलती हुई फिल्में बनना शुरू हुईं।
इसी साल कुछ एक-दो फिल्मों में खुर्शीद नजर आईं। इसके बाद मुफलिस आशिक (1932), नकली डॉक्टर (1933), स्वर्ग की सीढ़ी और बॉम्बशैल जैसी फिल्मों में नजर आई। हालांकि उनकी फिल्मों का कारवां बढ़ता चला गया। 1940 के दशक में खुर्शीद बानो का नाम उस समय की दिग्गज अभिनेत्रियों नूरजहां और सुरैया के साथ लिया जाने लगा था।
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फिर सुपरस्टार बनीं खुर्शीद बानो
40 का दशक आते-आते खुर्शीद बानो सुपरस्टार बन गई थीं। उनके पास बड़ी फिल्में आने लगीं। साल 1942 में भक्त सूरदास से वो चमक गईं और साल 1943 में आई 'तानसेन' खुर्शीद के करियर का टर्निंग पॉइंट फिल्म बनी। इस फिल्म वह महान गायक के.एल. सहगल की हीरोइन (तानी) बनी थीं।
इस फिल्म के गाने, खासकर "मोरे नैना सावन भादों", आज भी क्लासिक माने जाते हैं। लाहौर को छोड़कर खुर्शीद बंबई आ गईं और यहीं बड़े सितारों के साथ काम करने लगीं। एक्टिंग के अलावा खुर्शीद बानो के गाने भी खूब पॉपुलर हुए। घटा घन घोर घोर, दुखिया जियारा और बरसो रे.. समेत कई गाने हैं जो उनके खूब पॉपुलर हुए।
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शादी के बाद पाकिस्तान जाकर बसीं खुर्शीद
भारत में खुर्शीद बानो का करियर 40 के दशक में खूब चला। साल 1948 में आई पपीहा रे नाम की फिल्म भारत में उनकी आखिरी फिल्म थी। इसके बाद विभाजन का दौर आया और खुर्शीद बानो पाकिस्तान में जाकर बस गईं। दरअसल कहा जाता है कि खुर्शीद बानो के पति इनके मैनेजर भी थे और कुछ फिल्मों में एक्टिंग भी कर चुके थे।
उन्हीं से इन्होंने शादी की। लाला याकूब से शादी के बाद खुर्शीद बानो पाकिस्तान चली गईं, क्योंकि वह वहीं के रहने वाले थे। हालांकि साल 1956 में इनका तलाक हो गया और फिर खुर्शीद बानो ने दूसरी शादी बिजनेसमैन यूसुफ मियां से की।
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पाकिस्तान में डूबा करियर और हुईं गुमनाम
विभाजन के बाद शादी के चलते खुर्शीद बानो को पाकिस्तान जाना पड़ा। उन्होंने सोचा कि पाकिस्तान जाकर वो वहां अपना करियर बना लेंगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उन्होंने वहं जाकर सिर्फ दो फिल्मों में काम किया लेकिन वह दोनों ही फिल्में बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप हो गईं। फनकार और मंडी नाम की इन दो फिल्मों में खुर्शीद बानो नजर आईं पर किस्मत ने साथ नहीं दिया।
हालांकि इसके बाद खुर्शीद बानो कुछ टीवी शोज में जरूर दिखीं, पर जो शौहरत उन्हें भारत में और हिंदी सिनेमा में मिली वो उन्हें पाकिस्तान में ना मिल सकी और नतीजा एक बेहतरीन अदाकारा और सिंगर का करियर तबाह हो गया।
खुर्शीद बानो के तीन बच्चे हुए और शादी के बाद वह धीरे-धीरे गुमनामी में चली गईं। धर्म-कर्म में उन्होंने बाकी जिंदगी बिताई और साल 2001 में उनका कराची में निधन हो गया।
सोचिए जिस सिंगर-एक्ट्रेस को देखकर सहगल साहब इतने प्रभावित हुए कि वो खुर्शीद को अलग सिंगर मानते थे और जिनका कॉम्पटीशन नूरजहां जैसी दिग्गज के साथ रहा, वो जीवन के अंत में खो गईं। ऐसा सिर्फ सोचा ही जा सकता है कि अगर खुर्शीद बानो भारत में होतीं तो शायद आज कुछ और मुकाम उनका हिंदी सिनेमा में जरूर होता।
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सोर्स- Encyclopedia of Indian Cinema' (Ashish Rajadhyaksha & Paul Willemen), 'Stars from the Past', Film India Magazines और बाकी जगहों से मिली जानकारी के आधार पर खबर बनाई गई है।
