जेएनएन मुंबई, आरती तिवारी। दिन की शुरुआत हो या किसी लम्हे को यादगार बनाना हो, चाय का अपना ही स्थान है। हिंदी सिनेमा भी चाय की अहमियत समझता है। चाय बागानों के मेहनतकश जीवन से लेकर मनोरम दृश्यों और मन मोह लेने वाली आकर्षक पहाड़ी संस्कृति दर्शाने में चाय के बागानों को अहम स्थान दिया है हिंदी सिनेमा ने। चाय पर गीतों की भी कमी नहीं है। सर्दियों के मौसम में चाय और हिंदी सिनेमा की जुगलबंदी पर आरती तिवारी का आलेख...

मेहमानों की आवभगत से लेकर स्वाद और सेहत तक का श्रेष्ठ जरिया है चाय। चाय का इतिहास हजारों वर्ष पुराना है। भारत में चाय उत्पादन की शुरुआत भले ही ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा हुई थी, मगर आज भारत दुनिया के सबसे बड़े चाय उत्पादकों में से एक है और कमाल की बात तो यह है कि 70 प्रतिशत से अधिक चाय भारत में ही पी जाती है। भारतीय सिनेमा ने भी चाय की प्याली से लेकर मन को मोह लेने वाले आकर्षक चाय बागानों तक को अनेक फिल्मों में दर्शाया है। गीतों में विदेशी लोकेशन पर शूट न कर पाने वाले निर्माता खूबसूरत दृश्यों की कमी पूरी करने के लिए इन चाय बागानों का चुनाव करते रहे। तो वहीं वह दौर जब हर फिल्म में न्याय और क्रांति की बात हो रही थी, चाय बागानों में काम करने वाले मजदूरों का मुद्दा भी फिल्मों में उठाया गया।

अंतरराष्ट्रीय मंच तक बनाई राह

सबसे पहले बात 1953 में प्रदर्शित मुल्कराज आनंद के अंग्रेजी उपन्यास 'टू लीव्स एंड ए बड' पर आधारित 'राही' की। मशहूर कहानीकार, पटकथा लेखक और निर्देशक ख्वाजा अहमद अब्बास की इस फिल्म की कहानी पूर्व सैनिक की है, जो चाय बागान में मैनेजर की नौकरी करने जाता है। वहां प्रबंधकों की नीतियों से तंग आकर और एक चाय मजदूर लड़की के प्यार में पड़कर वह मजदूरों का हमदर्द बन जाता है। देव आनंद, नलिनी जयवंत, बलराज साहनी, मनमोहन कृष्ण और डेविड के जानदार अभिनय से सजी 'राही' इतनी पसंद की गई कि वह 1954 में वेनिस और मास्को अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह में शामिल होने वाली पहली भारतीय फिल्म थी।

अपने ही समझते हैं अपनों की पीड़ा

चाय बागानों के मजदूरों की पीड़ा बताने के लिए 1956 में असमिया भाषा में 'एरा बातोर सूरो' आई। बतौर निर्देशक भूपेन हजारिका की यह पहली फिल्म थी। बाक्स आफिस पर 'राही' की बेजोड़ सफलता से वे भी प्रेरित हुए होंगे, तभी उन्होंने अब्बास की तरह चाय बागान की कहानी चुनी। फिल्म में वर्गीय आधार पर बंटे समाज पर अन्य वर्ग द्वारा शोषण को दर्शाया गया। इसके अलावा इसी विषय पर 1975 में असमिया भाषा में ही तीन अन्य फिल्में 'केसा सोना', 'रतनलाल' और 'चमेली मेमसाब' आईं। 'केसा सोना' का निर्माण असम चाय मजदूर संघ ने किया था, लेकिन इस फिल्म के बारे में बहुत जानकारी नहीं मिलती। वहीं 'चमेली मेमसाब' को आलोचकों और बाक्स आफिस दोनों का भरपूर समर्थन मिला था। फिल्म का संगीत भूपेन हजारिका ने दिया था। जिसके लिए उन्हें 1975 के राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला था। साथ ही इस फिल्म ने सर्वश्रेष्ठ असमिया फीचर फिल्म का पुरस्कार भी जीता था।

अन्य भाषाओं ने भी की पहल

1978 से 1985 के बीच, चाय बागानों की कहानी को छूने वाली आठ फिल्में बनीं। तीन बांग्ला में, तीन हिंदी में और एक-एक अंग्रेजी व असमिया भाषा में। इनमें से बांग्ला और हिंदी में बनीं फिल्में 1975 में आई 'चमेली मेमसाब' की रीमेक थीं। वहीं, शक्तिपद राजगुरु के बांग्ला उपन्यास पर 1981 में दो भाषाओं में फिल्में बांग्ला में 'अनुसंधान', और हिंदी में 'बरसात की एक रात' बनीं। शक्ति सामंत द्वारा निर्देशित 'बरसात की एक रात' में अमिताभ बच्चन, अमजद खान, राखी गुलजार और उत्पल दत्त जैसे सुपरस्टार थे। अन्य तीन फिल्में हैं- बांग्ला फिल्म 'धनराज तामांग' (1978), असमिया फिल्म 'अपरूपा'(1982) और अंग्रेजी फिल्म 'द असम गार्डन' (1985)।

गीतों में मिलती सोंधी सुगंध

फिल्मों के साथ ही गीतों में तो चाय का जिक्र अवश्य ही होता आया है। किशोर कुमार, मोहम्मद रफी से लेकर लता मंगेशकर ने अपनी आवाज से चाय के स्वाद को दोगुणा किया है। तभी तो चाय पीने का विचार भर आते ही कोई न कोई गीत याद आ जाता है। इस कड़ी में सबसे पहले बात मोहम्मद रफी की आवाज में सजे गीत 'एक एक एक, एक चाय की प्याली' की। 'जमाना बदल गया'(1961) के इस गीत में चाय के बहाने एक अदद जीवनसंगिनी की तलाश हो रही है तो वहीं इसी साल आई 'संजोग' वाकई मोहम्मद रफी के लिए संयोग बनकर आई थी। क्योंकि एक बार फिर इस फिल्म के गीत 'दो घूंट चाय पी और सैर दुनिया की मैं करके आ गया' को आवाज देने का मौका उन्हें ही मिला। आज में जीने और इस जीवन में खुश रहने की सीख देता यह गीत चाय की तासीर को भलीभांति छूता है। इसके बाद तो आया वह कालजयी गीत, जो प्यार के अगले पड़ाव की बात को बड़े ही दिलखुश अंदाज में बताता है। यह गीत था 1983 में आई फिल्म 'सौतन' का 'शायद मेरी शादी का ख्याल'। इस गीत को इतना यादगार बनाने का कुछ श्रेय इसे अपनी मनमोहक आवाज से सजाने वाले किशोर कुमार और लता मंगेशकर को भी जाता है। वर्ष 2000 में आई 'हर दिल जो प्यार करेगा' में अनु मलिक के गीत 'एक गरम चाय की प्याली हो' ने चाय के साथ अपने प्यार की तलाश करते नायक की बात की। वहीं 2009 में आई 'चिंटू जी' का गीत 'चाय के बहाने' में भी चाय की चुस्कियों के बहाने दिल की बात करता नजर आया। इसी क्रम में कईिफल्मों के संवादों में भी चाय कािजक्र इसे और रोचक बना देता है। 'बावर्ची', 'अंदाज अपना अपना', 'बाजीगर', इस क्रम मेंिफल्में तमाम हैं, जिनका उल्लेख करने केिलएिगनती ही कम पड़ जाए।

कैमरे को सुहाते बागान

संवाद और गीतों के अलावा दृश्यों की मदद से दर्शकों को चाय बागानों की ताजगी का एहसास कराने में निर्माता-निर्देशक कभी पीछे नहीं रहे। इसमें चार से पांच मिनट के गीतों को विशेष तौर पर चाय कैफे या चाय बागानों में फिल्माने की वर्षों पुरानी परंपरा रही है। 'आए दिन बहार के' (1966) दार्जिलिंग में शूट होने वाली पहली रंगीन हिंदी फिल्म थी। पर्दे पर धर्मेंद्र-आशा पारेख का जादू कमाल का था और फिल्म जबरदस्त हिट हुई। इसके अलावा 'झुक गया आसमान', 'आराधना', 'अनुरोध' से लेकर 'परिणीता' और 'बर्फी!' में दार्जिलिंग की पहाड़ियां और चाय बागान नजर आए। 'गोलमाल' फ्रेंचाइजी की चौथी किस्त ऊटी में शूट की गई। इस फिल्म के गानों में चाय के बागान आपको ऊटी की यात्रा करने को प्रेरित करने के लिए काफी हैं। 'साजन', 'राज' के अलावा 'छैंया छैंया' गीत सहित कई फिल्मों में भी ऊटी की पहाड़ियां नजर आ चुकी हैं। तो वहीं मुन्नार की तीन पहाड़ी धाराओं के संगम के बीच शूट किए गए 'चेन्नई एक्सप्रेस' के गीत 'कश्मीर मैं, तू कन्याकुमारी' की धुन सबको पसंद है। मुन्नार से आठ किलोमीटर दूर देवीकुलम में शूट किए गए इस गीत में चाय, काफी और मसालों के बागान नजर आए तो वहीं इसी फिल्म के गीत 'बन के तितली दिल उड़ा' को दुनिया की दूसरी सबसे ऊंची चोटी पर बने चाय बागान मेसापुलिमला पर शूट किया गया।

Edited By: Vaishali Chandra

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