नई दिल्ली [यशा माथुर]। Doordarshan Turns 61: लॉकडाउन के दौरान जब दूरदर्शन पर 'रामायण' को फिर से इतना प्यार मिला तो दूरदर्शन के सुनहरे काल की यादें लौट आईं। कभी न भूलने वाला दौर था वह। दूरदर्शन 15 सितंबर को 61वीं वर्षगांठ मना रहा है। याद कीजिए वे दिन जब दूरदर्शन पर आ रहे 'चित्रहार' को देखने की बेताबी रहती थी। खबरें सुन लेने का इंतजार रहता था और 'रामायण', 'महाभारत' के हर शब्द को सुनने की आतवले रहते थे।

जब प्रसारण सही नहीं मिलता था तो छत पर लगे कई फुट ऊंचे एंटिना हर दिशा में घुमाया जाता था। यदि कभी इस बीच कोई कार्यक्रम छूट जाता था तो कई दिनों तक अफसोस बना रहता था। ऐसा ही क्रेज था दूरदर्शन का। उस सुनहरे दौर को आज तक कोई भुला नहीं सका है। 15 सितंबर 1959 को शुरू हुआ दूरदर्शन इस वर्ष अपनी 61वीं वर्षगांठ मनाएगा तो एक बार फिर दूरदर्शन की उस चमक को याद करने की बारी है।

जिम्मेदारी समझते थे हम

जैसे ही दूरदर्शन के मोंटाज की धुन कानों में पड़ती और गोल-गोल घूमते हुए उसका लोगो पूरा होता वैसे ही घर-बाहर के लोग टीवी सेट के सामने आकर बैठ जाते। हर किसी को इंतजार होता कि आज कौन से न्यूज रीडर आएंगे? सलमा सुल्तान, अविनाश कौर सरीन, शम्मी नारंग, सरला माहेश्वरी जैसे नाम चहेते थे। शम्मी नारंग की बेहतरीन आवाज आज भी हर जेहन में ताजा है। अपने अनुभव सुनाते हुए शम्मी नारंग कहते हैं, 'जहां तक समाचारों के विषय और प्रस्तुति की बात थी, उसकी गरिमा को हमने कभी नहीं गिरने दिया। आज के दौर में भी लोग उस वक्त को याद करते हैं। हमारे पास आज जैसे संसाधन नहीं थे, लेकिन बच्चों को समाचार देखने की सीख दी जाती थी। कहा जाता था कि अगर अपनी भाषा दुरुस्त करनी है तो समाचार सुनें। हम जब भी समाचार पढ़ते या किसी प्रस्तुति के लिए कैमरे के सामने आते तो हमारे कंधों पर बहुत बड़ी जिम्मेदारी होती थी कि एक शब्द के गलत उच्चारण से कितने सारे बच्चों के साथ नाइंसाफी हो जाएगी। इन बातों का खास ख्याल रखा गया तो ही उस दौर में दूरदर्शन को परिवार का चैनल कहा गया।'

हर उम्र और वर्ग का दूरदर्शन

कौन भूल सकता है वो 'सुरभि', 'रजनी', 'नुक्कड़', 'विक्रम-बेताल', 'चित्रहार', 'कथा सागर', 'मुंगेरी लाल के हसीन सपने', 'जंगल बुक' का युग। हर उम्र और हर वर्ग का कंटेंट था दूरदर्शन पर। कलाकार भी उम्दा थे, जो आज तक लोगों के दिलों में बसे हैं। छोटे विजुअल्स जैसे 'मिले सुर मेरा तुम्हारा...', 'स्कूल चले हम', 'एक चिड़िया अनेक चिड़िया' आदि की भी व्यूअरशिप बहुत थी। वह सुनहरा दौर और यादें आज भी दिमाग का एक हिस्सा हैं। इतना ही नहीं दूरदर्शन ने गुलाम अली जैसे पाकिस्तानी कलाकारों को भी भारत में मशहूर कर दिया। एक बार गुलाम अली साहब ने बताया था कि 'जब 1980 में मैंने दूरदर्शन के कार्यक्रम में गजल 'हंगामा है क्यों बरपा' गाई थी तब लोगों को पता चला कि यह आदमी कुछ नया लेकर आया है, जो इसका खुद का है। दूरदर्शन ने मेरे कार्यक्रमों को बहुत प्यार से लोगों तक पहुंचाया।'

गुणवत्ता से भरपूर धारावाहिक

रविवार को दूरदर्शन पर जब 'रामायण' और 'महाभारत' का प्रसारण होता था तब शहर में मानो कर्फ्यू-सा लग जाता था। यहां तक कि लोग अरुण गोविल को श्रीराम और

नीतिश भारद्वाज को श्रीकृष्ण मानकर श्रद्धा से सिर झुकाकर प्रणाम तक करते थे। यह बहुत कम लोग जानते हैं कि नीतिश भारद्वाज बंबई दूरदर्शन में न्यूज रीडर और एनाउंसर

थे। नीतिश कहते हैं कि बंबई दूरदर्शन के किसान कार्यक्रम से शुरुआत हुई। इस बारे में वह कहते हैं, 'वहां पर मैं न्यूज बुलेटिन पढ़ता था। उसके बाद एनाउंसर और न्यूज रीडर बना। उस समय हम अनाउंसर्स स्टार्स थे।'

यशा माथुर कहते हैं कि रामानंद सागर, बीआर चोपड़ा, रमेश सिप्पी, कुंदन शाह जैसे बड़े फिल्मकार दूरदर्शन में धारावाहिक निर्देशित या निर्मित करते थे। तब के सीरियल्स की गुणवत्ता अलहदा थी, जिन्हें आज भी याद किया जाता है। शाहरुख खान जैसे कलाकार भी दूरदर्शन से ही निकलकर आए हैं। एशियाई खेलों के दूरदर्शन पर प्रसारण ने भारतीय टेलीविजन में क्रांतिकारी बदलाव लाए। 1966 में 'कृषि दर्शन' कार्यक्रम देश में हरित क्रांति का सूत्रधार बना। 'कृषि दर्शन' सबसे लंबा चलने वाला दूरदर्शन का कार्यक्रम है।

नीना गुप्ता कहती हैं कि कुछ पैसे मिल जाते थे, जिस समय हम दिल्ली में थे तो मैंने रेडियो और दूरदर्शन के लिए ऑडिशन दिया था। तब बड़े गर्व की बात थी कि हम दूरदर्शन के एप्रूव्ड कलाकार हैं। मैंने वहां नाटकों के कई मंचन किए। संगीत के कार्यक्रम की एंकरिंग भी की। वहां का माहौल बहुत अच्छा था। हमें कुछ पैसे भी मिल जाते थे। तब मेरा संघर्ष शुरू ही हुआ था, ऐसे में वहां से मिलने वाले पैसों की बहुत जरूरत होती थी। कुछ साल दूरदर्शन से जुड़े रहने के बाद मेरा एनएसडी में एडमिशन हो गया, जहां हमें काम करने की स्वीकृति नहीं मिलती थी।

शम्मी नारंग ने कहा कि खूबसूरत था वह दौर मेरी और दूरदर्शन की जवानी का दौर एक ही था। मैंने पहला बुलेटिन सन्1982 में पढ़ा। मेरे सामने ही रंगीन प्रसारण शुरू हुआ। बहळ्त से दर्शकों के प्यार भरे खत आते थे। छोटी-छोटी खुशियां थीं। पूरी टीम एक परिवार की तरह थी। तब सलमा जी को लोग अप्सरा समझते थे। उनकी खूबसूरती, बालों में फूल लगाना लोगों को बहुत पसंद आता था, लेकिन उनमें गरिमा और शालीनता भी खूब थी। उन्होंने बड़ी बहन की तरह मुझे समझाया और काम सिखाया। वह दौर बहुत खूबसूरत था।

सीमा पाहवा ने कहा कि आज भी हूं सबकी बड़की हमें पता ही नहीं था कि 'हम लोग' इतना बड़ा सीरियल है। उस समय एक्टर्स के पास कंगाली इतनी होती थी कि हमने पैसों की सिक्योरिटी के लिए सीरियल किया। सीरियल इतना मशहूर हुआ कि आज भी लोग अक्सर बड़की बोल देते हैं। जब मैंने दूरदर्शन पर शुरुआत की थी तब लाइव टेलीकास्ट होता था। जब रिकॉर्डिंग की तकनीक आई तो उसमें एडिटिंग नहीं थी। एक ही रील में पहले से लेकर आखिरी सीन तक शूट होता। गलती होने पर फिर पहले सीन से शुरू करना पड़ता था।

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