स्मिता श्रीवास्तव, जेएनएन। भारतीय सिनेमा को 'मदर इंडिया’ जैसी कालजयी फिल्म देने वाले दिवंगत फिल्मकार महबूब खान की फिल्मों की खासियत रहा नौशाद का मधुर संगीत। महबूब खान की पुण्य तिथि के मौके पर उनकी फिल्मों की यात्रा, भावुक पक्ष और नौशाद के साथ तालमेल की यादों को टटोलने का प्रयास किया स्मिता श्रीवास्तव ने...

महबूब खान की फिल्मों में नौशाद द्वारा दिया गया संगीत खासा लोकप्रिय रहा है। दोनों के रिश्ते की शुरुआत ट्राईएंगल प्रेम कहानी पर आधारित फिल्म 'अनमोल घड़ी (1946)’ से हुई। फिल्म में दो लोकप्रिय गायिका नूरजहां और सुरैया थीं। दोनों के अपोजिट मशहूर गायक सुरेंद्र थे। गानों को नौशाद अली ने संगीत दिया था था। फिल्म में नूरजहां का गाया 'जवां है मुहब्बत’ और सुरैया का 'सोचा था क्या, क्या हो गया’ उस समय के सुपरहिट गाने बने।

'अनमोल घड़ी’ के बाद नौशाद ने करीब 16 साल तक, यानी महबूब की आखिरी फिल्म 'सन ऑफ इंडिया’ तक में

संगीत दिया। 'अनोखी अदा’ (1948), 'अंदाज’ (1949), अमर (1954) और 'मदर इंडिया’ (1957) में नौशाद का दिया संगीत बेहद लोकप्रिय रहा। 'अनमोल घड़ी’ के बाद महबूब और नौशाद ने एक साथ कई फिल्मों में काम किया, लेकिन शुरुआती दौर में दोनों के रिश्ते जटिल थे। दरअसल, नौशाद अपने मुताबिक काम करने की आजादी चाहते थे, जबकि महबूब का काम करने का तरीका अलग था। एक दिन अपने रिहर्सल रूम में नौशाद जब 'अनमोल घड़ी’ के पहले गाने पर काम कर रहे थे तभी महबूब आए और उनसे गाना सुनाने को कहा।

गाना सुनने के बाद उन्होंने नौशाद से उसमें कई बदलाव करने को कहा। यह रवैया नौशाद को पसंद नहीं आया, लेकिन महबूब के गुस्से को देखते हुए उन्होंने चुप रहना ही बेहतर समझा। जब गाने को फिल्माया जाना था तो नौशाद ने महबूब से उसे कैमरे की नजर से देखने का आग्रह किया। उन्होंने महबूब को उसमें कई बदलाव करने की नसीहत दे डाली। महबूब इससे नाराज हो गए। उन्होंने नौशाद से कहा कि आप मुझे काम करना मत सिखाएं। उनके गुस्से पर कोई प्रतिक्रिया दिए बिना नौशाद ने कहा महबूब साहब दूसरा गाना तैयार है। आप इसे कब सुनेंगे और अपने सुझाव देंगे? महबूब उनका इशारा समझ गए। उन्होंने हंसते हुए कहा मैं तुम्हारे काम में दखलंदाजी नहीं करूंगा। आप अपना काम अपने हिसाब से करिए। उसके बाद से दोनों के रिश्ते गहरे हो गए।

महबूब हमेशा अपने समय से आगे चले। उन्होंने अपनी महत्वाकांक्षी फिल्म 'आन’ को रंगीन बनाया। इसे पूरा होने में तीन साल का समय लगा। 'आन’ को लंदन में प्रॉसेस किया जाना था। मगर महबूब को अंग्रेजी नहीं आती थी। उन्होंने संकेतों के जरिए अपनी बात को ब्रिटिश तकनीशियन को समझाया था। यह उस समय की काफी महंगी फिल्म थी। लंदन के सिनेमाघर में यह फिल्म 12 हफ्ते चली। इस फिल्म को लेकर महबूब के लिए सबसे बड़ा अवार्ड उनके हॉलीवुड आदर्श सेसिल बी डीमैली की ओर से भेजा गया खत रहा। जिसमें उन्होंने लिखा था कि आपके देश में बनी फिल्मों को दुनियाभर में समझा और एंजॉय किया जा सकता है। हालांकि फिल्म भारत में नहीं चली।

'आन’ के बाद आई 'अमर’ भी ऑफबीट फिल्म थी। यौन उत्पीडऩ जैसे संवेदनशील विषय पर बनी इस फिल्म में दिलीप कुमार, मधुबाला और निम्मी ने मुख्य भूमिका निभाई। फिल्म बॉक्स आफिस पर सफल नहीं हुई, लेकिन महबूब खान इसे अपनी खास फिल्म मानते थे। जब महबूब को पता चला कि उनकी फिल्म 'अमर’ को दर्शकों ने नकार दिया है तो वह महबूब स्टूडियो के परिसर में रो दिए थे। उसके बाद महबूब ने अपनी ही फिल्म 'औरत’ की रीमेक 'मदर इंडिया’ बनाई। फिल्म में 'बिरजू’ के किरदार के लिए दिलीप कुमार उनकी पहली पसंद थे, लेकिन नरगिस जिन्होंने दिलीप कुमार की प्रेमिका का किरदार कई फिल्मों में निभाया था, उनकी मां बनना स्वीकार नहीं

कर पाईं। चूंकि फिल्म नरगिस के इर्दगिर्द घूमती थी, इसलिए महबूब को बिरजू के लिए दूसरे कलाकार को तलाशना पड़ा।

अंत में सुनील दत्त के नाम पर सहमति बनी। राजकुमार ने नरगिस के पति का और राजेंद्र कुमार ने बड़े बेटे का किरदार निभाया। साहूकार का किरदार निभाने वाले कन्हैयालाल ने 'औरत’ में भी यही किरदार निभाया था। इसमें चंचल ने उनकी बेटी रूपा का किरदार निभाया था, जिसकी इज्जत बचाने के लिए राधा (नरगिस) अपने बेटे को मार देती है। 'मदर इंडिया’ को उसी लोकेशन पर शूट किया गया था, जहां 17 साल पहले 'औरत’ की

शूटिंग की गई थी।

1957 में दीवाली के दौरान रिलीज हुई 'मदर इंडिया’ बॉक्स आफिस पर सुपर हिट रही। बांबे (अब मुंबई) में लिबर्टी सिनेमा में एक साल तक चली। नरगिस को देश-विदेश में कई अवॉर्ड से नवाजा गया। फिल्म की सफलता से राजकुमार, संघर्षशील सुनील दत्त और राजेंद्र कुमार के करियर को उड़ान मिली। 'मदर इंडिया’ भारत की पहली फिल्म थी जिसे सर्वश्रेष्ठ विदेशी फिल्म की श्रेणी में ऑस्कर के लिए नामित किया गया। इसके बाद महबूब ने अपने दो मेगा प्रोजेक्ट 'ताजमहल’ और 'हब्बा खातून’ को रोक दिया और साजिद खान के साथ छोटे बजट की फिल्म 'सन आफ इंडिया’ बनाने का फैसला किया। 1962 में रिलीज हुई 'सन ऑफ इंडिया’ बॉक्स आफिस पर फ्लाप रही। अचानक से महबूब के स्वास्थ्य बिगडऩे की खबरें आने लगीं। सही मायने में 'सन ऑफ इंडिया’ अपने समय से आगे की फिल्म थी। इसमें काले धन, भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे थे।

दिलचस्प बात यह है यह फिल्म उस समय प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू को पसंद आई थी। महबूब ने उनके लिए विशेष तौर पर फिल्म की स्क्रीनिंग रखी थी। 1959 में महबूब को फिल्म प्रोड्यूसर गिल्ड का अध्यक्ष सर्वसम्मति से चुना गया था। दिसंबर, 1963 में महबूब ने तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू को बॉम्बे में भारतीय सिनेमा के गोल्डन जुबली समारोह के उद्घाटन में बुलाया। 27 मई, 1964 को पंडित जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु की खबर पाकर उन्हें गहरा सदमा पहुंचा था। अगले दिन 28 मई की सुबह उन्हें दिल का दौरा पड़ा और महज 57 की उम्र में महबूब खान दुनिया को अलविदा कह गए, पर अपने पीछे यादगार फिल्मों की विरासत छोड़ गए।

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