मुंबई। पिछली सदी के पांचवें दशक में तीन अभिनेताओं का जादू दर्शकों के सिर चढ़कर बोल रहा था। राजकपूर, देव आनंद और दिलीप कुमार। राज मसखरे और भोलेपन को जीने वाले तथा दर्द को हंसते हुए पी लेने वाले कलाकार माने गए, तो देव सही में लोगों के लिए आनंद के देव बने। तीसरे दिलीप कुमार ट्रेजडी किंग कहलाए। सही में देखा जाए तो सबसे अधिक मुश्किल काम है दर्द को चेहरे पर लाना और उससे दर्शकों को दर्द में डुबोना। यह काम अपने पूरे अभिनय करियर की अधिकतर फिल्मों में करने वाले दिलीप कुमार को करते हुए तो लंबा अरसा हो गया था। लोगों को उम्मीद थी कि वे अब लोगों को नहीं रुलाएंगे, लेकिन वक्त के आगे किसी की चली है भला...? वह तो अपना काम करता आगे बढ़ता जाता है। जाते-जाते दिलीप साहब एक बार फिर अपने चाहने वालों को रुला और बता गए, ठीक उसी तरह, जैसे वे फिल्म ‘आदमी’ में गाते हैं, ‘न आदमी का कोई भरोसा न जिंदगी का कोई ठिकाना...’। अब उन्हें हम सिर्फ महसूस करेंगे। वे हमारी यादों में जिंदा रहेंगे, अपनी फिल्मों के जरिए, अभिनय के जरिए...।

आशंका तो तभी से तैरने लगी थी, जब देव आनंद की फिल्म ‘हम दोनों’ रंगीन होकर फिर से रिलीज हो रही थी। तब देव साहब जीवित थे। उन्होंने यूसुफ साहब को फोन मिलाया। सायरा जी ने फोन उठाया, तो दुआ-सलाम हुई, फिर हाल-चाल पूछने के बाद उन्होंने बताया कि मेरी फिल्म रंगीन होकर फिर से रिलीज हो रही है, इसलिए वे प्रीमियर में जरूर तशरीफ लाएं। यह बात सुनने के बाद सायरा जी ने फोन यूसुफ साहब को दे दिया और बताया कि देव साहब का फोन है। उन्होंने फोन हाथ में तो लिया, पर कुछ कहने-सुनने के बजाय सिर्फ और सिर्फ हंसते रहे। वे कुछ समय तक लगातार हंसते ही रहे। कुछ पल ऐसे ही बीता, तो सायरा जी ने उनसे फोन ले लिया और देव साहब से कहा कि मैं कुछ समय बाद उनसे आपकी बात बता दूंगी। उसी वक्त देव साहब को लगा कि कुछ गड़बड़ जरूर है और उनकी तबीयत ठीक नहीं है।

अभिनय के हर रंग को जीने में थे माहिर

दिलीप कुमार ने ख्याति पाई ट्रेजडी किंग की, लेकिन सही मायने में वे अभिनय के हर रंग को जीने में माहिर थे। उनकी इन्हीं खासियतों की वजह से सदी के महानायक अमिताभ बच्चन ने भी कहा कि यदि उनके साथ और बाद की पीढ़ी का कोई अभिनेता यह कहता है कि मैं दिलीप साहब की कॉपी नहीं करता, तो वह झूठ बोलता है। राजकपूर ने ‘प्रेम रोग’ के एक सीन में ऋषि कपूर से कहा, यूसुफ की नकल भर कर दो, हमारा काम हो जाएगा। अपने अभिनय सफर में दिलीप कुमार ने कुल साठ फिल्में कीं, जिनमें दो में वे मेहमान भूमिका में थे। 1944 से शुरू हुआ उनका अभिनय सफर 1998 तक चला। उनकी अंतिम रिलीज फिल्म थी ‘किला’, जिसमें उनका डबल रोल था। इसके बाद वे निर्देशन में आए।

लॉरेंस डिसूजा की फिल्म ‘कलिंगा’ का निर्देशन किया, लेकिन काफी कम समय होने के बावजूद उनका यह ख्वाब अधूरा रह गया। उन्होंने ‘कर्मा’ और ‘मुसाफिर’ में गीत गाये, ‘गंगा जमुना’ के निर्माता बने। ‘गंगा जमुना’ और ‘लीडर’ के लेखक वही थे। अपने लंबे अभिनय सफर में कुल साठ फिल्में करके ही वे अभिनय की पाठशाला हो गए। उन्हें फिल्म में खुद को दोहराना पसंद नहीं था। वे अच्छी तरह जानते थे कि एक अभिनेता की पूंजी उसकी प्रतिभा, शरीर और व्यावहारिक बुद्धि होती है। अभिनेता के रूप में ही नहीं, इंसान के रूप में भी उनकी ख्याति दुनिया भर में रही है।

दिलीप कुमार का असली नाम मोहम्मद यूसुफ सरवर खान था। उनके पिता फलों के व्यापारी थे। सीमाप्रांत के राज्यों से कारोबार बढ़कर दूर तक जा पहुंचा। वे बंबई (अब मुंबई) आ गए, लेकिन कुछ समस्या थी तो परिवार नासिक के देवलाली में बसा। वहां मुसीबत आई, तो परिवार फिर बंबई आ गया। यहां अंजुम-ए-इस्लाम हाईस्कूल, विल्सन और खालसा कॉलेज में पढ़े। एक बार काम के सिलसिले में यूसुफ साहब को नैनीताल जाना पड़ा। वहीं उनकी मुलाकात मशहूर अभिनेत्री और बॉम्बे टॉकीज की मालकिन देविका रानी से हुई। संयोग से देविका रानी के पारिवारिक मित्र डा. मसानी उन्हें लेकर देविका रानी के पास गए। थोड़ी देर की मुलाकात में ही यूसुफ खान बन गए अभिनेता दिलीप कुमार और कुछ ही वर्षों में छा गए अभिनय की दुनिया में।

पढ़ने का था गजब का शौक

पिछले कई वर्षों से दिलीप कुमार की तबीयत बिगड़ती बनती रही और आखिरकार काल के क्रूर हाथों ने इस अजीम शख्सियत को हमसे छीन दिया। दिलीप कुमार तो चले गये, लेकिन रुपहले पर्दे पर निभाई गई उनकी भूमिकाएं आने वाली पीढ़ियों को हिंदी फिल्मों की समृद्धि का एहसास कराती रहेंगी। उदयतारा नायर द्वारा प्रस्तुत दिलीप कुमार की आत्मकथा 'वजूद और परछाईं' में उनकी पत्नी सायरा बानो ने बताया बहुत कम लोग जानते हैं कि दिलीप कुमार को पढ़ने का कितना जबरदस्त शौक रहा है। कोई उपन्यास हो, नाटक हो या जीवनी, क्लासिक साहित्य से उनका प्यार हर चीज से बढ़कर था। उर्दू, फारसी और अंग्रेजी साहित्य की कितनी ही किताबें हमारे बुकशेल्फों की शोभा बढ़ाती रही हैं। ... मुझे आदत-सी पड़ गई कि उन्हें हर रात टेबल लैंप की रोशनी में बड़े चाव और लगन से कुछ न कुछ पढ़ते देखूं, कई बार तो भोर तक। हम मुंबई के अपने घर में हों या जम्मू-कश्मीर के दूरदराज के किसी डाक बंगले में या कुल्लू-मनाली, स्विट्जरलैंड या दुनिया के किसी दूसरे हिस्से में, वे पढ़ने का अपना शौक नहीं छोड़ते थे। ऐसा लगता था जैसे कोई बच्चा अपने मनपसंद खेल में मगन हो। मेरे बार-बार कहने और बहुत पीछे पड़ने के बाद ही वे हाथ की किताब छोड़ने के लिए राजी होते थे। यूजीन ओ नील, जोसेफ कोनराड, फ्योदोर दास्तोव्यस्की, टेनिसन विलियम्स उनके सबसे पसंदीदा लेखक थे। अगर उनके हाथ में कोई किताब नहीं होती थी तो पक्का मानिए कि वे किसी स्क्रिप्ट या सीन को पढ़ने में डूबे होते थे, जिसकी अगली सुबह शूटिंग होने वाली थी। वे एक समय में एक फिल्म में ही काम करते थे।

दिलीप साहब कहते थे जिंदगी सीखने के लिए है...

मशहूर निर्माता सुभाष घई दिलीप कुमार को याद करते हुए कहते हैं कि दिलीप साहब मेरे सबसे बड़े गुरु और आदर्श रहे हैं। उन्होंने जीवन, समाज और सिनेमा को देखने का मेरा नजरिया बदला है। वह हर तरह से एक मुकम्मल इंसान थे। वह सिर्फ देश के लिए ही नहीं, मेरे लिए भी इंस्टीट्यूशन रहे हैं। अगर मैं अपनी जिंदगी को दो हिस्सों में विभाजित करूं तो एक है प्री दिलीप कुमार, दूसरा पोस्ट दिलीप कुमार। दिलीप कुमार के संपर्क में आने के बाद फिल्म बनाने का मकसद सिर्फ अच्छी फिल्म बनाने पर केंद्रित हुआ। विधाता से जुड़ा एक किस्सा साझा करना चाहूंगा। जब फिल्म हिट हुई तो मैंने उन्हें बहुत एक्साइटमेंट में फोन किया। उन्होंने फोन रिसीव नहीं किया। मैंने दो दिन बाद दोबारा फिल्म के हिट होने की सूचना देने के लिए उन्हें फोन किया, ताकि इसकी खुशी में पार्टी करें। तब उन्होंने बहुत खूबसूरत बात कही थी कि चलो अच्छा हुआ खुदा ने एक गलती और माफ कर दी। मैंने उनसे इसका अर्थ पूछा। उन्होंने जवाब दिया कि फिल्में चल जाती हैं तो हमारी जिम्मेदारी बढ़ जाती है। आगे हम पर बेहतर फिल्म बनाने का दबाव होता है। कोशिश ये रहनी चाहिए उसके बाद भी छात्रों की माफिक सीखने का मिजाज बना रहे। जिंदगी सीखने के लिए है। आखिर तक सीखते रहो। दिलीप साहब अपने देश से बेहद प्यार करते थे। विदेश में भी आमंत्रण पर चैरिटी शो में जाया करते थे। उसके लिए वह कभी कोई फीस नहीं लेते थे। एक बार किसी ब्लाइंड एसोसिएशन के कार्यक्रम में शिरकत करने गए थे। किसी प्रशंसक ने उन्हें भेंटस्वरूप दस लाख रुपये का चेक दिया। उन्होंने तुरंत एसोसिएशन के अध्यक्ष को बुलाकर वह धनराशि उन्हें देने का ऐलान कर दिया। उन्होंने अपने इतने लंबे करियर में कभी विज्ञापन नहीं किया। वह चाहते तो इसके माध्यम से पैसा कमा सकते थे। वह कभी स्टार की तरह व्यवहार नहीं करते थे। वह कहते थे कि मेरे लिए छोटा सा कमरा और ओढ़ने के लिए साफ चादर काफी है।

उनकी तारीफ आजीवन याद रहेगी

शत्रुघ्‍न सिन्‍हा ने दिलीप कुमार को याद करते हुए कहा कि हम लोग फिल्‍म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया से आते हैं। हम लोग उनको संस्थान मानते रहे। ऐसा संस्थान, जिसे पाकिस्‍तान ने अपना सर्वोच्च नागरिक सम्मान निशान-ए-इम्तियाज का खिताब दिया था। यह भी कह सकते हैं कि फिल्‍म इंडस्‍ट्री का आखिरी मुगल चला गया। फिल्‍म इंडस्‍ट्री में उनकी छाप आज भी दिखाई पड़ती है। बड़े-बड़े कलाकार उनकी अदायगी की उपज हैं। मैंने उनके साथ क्रांति फिल्‍म में काम किया था। मुझे दिलीप साहब ने एक बार बहुत बड़ा काम्प्लिमेंट दिया था क्रांति की शूटिंग के दौरान। उन्‍हें लंबा-चौड़ा डायलाग दे दिया गया था। मैं उनके पीछे ही बैठा हुआ था। उन्‍होंने कहा कि आप क्‍या समझते हैं कि मैं इतने लंबे डायलाग इतनी जल्‍दी याद कर लूंगा। क्‍या मैं शत्रुघ्‍न सिन्‍हा हूं जो दस पेज का डायलाग याद कर लूं। मैंने उन्‍हें गले लगाया और कहा कि सर यह आपने बहुत बड़ा काम्प्लिमेंट दिया है। मैं तो बच्‍चा हूं आपके सामने। इसे आजीवन याद रखूंगा।

कड़ी मेहनत के प्रोडक्‍ट रहे हैं दिलीप कुमार

अभिनेता मनोज कुमार कहते हैं कि दिलीप साहब की खासियत यह थी कि आप उनका दिल अच्छे काम से जीत सकते थे, न कि चमचागिरी से। वह कड़ी मेहनत के प्रोडक्ट रहे हैं। स्टारडम और कड़ी मेहनत का प्रोडक्ट होना दो अलग चीजें हैं। मैं जब भगत सिंह पर आधारित फिल्म शहीद पर रिसर्च कर रहा था उस समय क्रांति का आइडिया मेरे दिमाग में आ गया था। मुझे पता चला था कि मराठा साम्राज्‍य की नौसेना के प्रथम सेनानायक कान्‍होजी आंग्रे समंदर में अंग्रेजों और पुर्तगालियों को खड़े नहीं रहने देते थे। इस बात को ध्‍यान में रखते हुए दिलीप साहब के किरदार को कान्होजी आंग्रे जैसा बनाया।उस दौरान दिलीप साहब पांच-छह साल से कोई फिल्म कर नहीं रहे थे। एक दिन मैंने उन्हें फोन करके कहा कि साहब एक बोगस सी कहानी है जिसके लिए आप फिट हैं। उन्होंने कहा करते हैं। फिल्म लिखने के बाद फोन किया तो उन्‍होंने अगले दिन बुला लिया। उनके बड़े भाई नूर साहब की तबीयत खराब थी। उन्होंने कहा कि भाई साहब बीमार हैं, मुझे अस्पताल जाना है। कहानी को तीन घंटे लगेंगे। मैंने कहा दिलीप साहब जिस कहानी को सुनाने में तीन घंटे लगे, वह कहानी नहीं होती है। कहानी वह होती है, जो दो मिनट में सुनाई जाए। मैंने उन्हें दो-ढाई मिनट में आइडिया सुना दिया। वह थोड़ी देर खामोश रहे। फिर उन्होंने कहा कि जमीन बड़ी उपजाऊ है, मैंने कहा तो मेहनत से हल चलाएंगे, तो फसल भी अच्छी होगी। रिलीज के बाद फिल्‍म सुपरहिट रही।

पुरस्कार और सम्मान

-पद्मभूषण (1991)

-दादा साहब फाल्के पुरस्कार (1994)

-निशान ए इम्तियाज (पाकिस्तान को सर्वोच्च नागरिक सम्मान, 1998)

-किशोर कुमार सम्मान (2014)

-पद्मविभूषण (2015)

-रिकॉर्ड आठ बार ‘सर्वश्रेष्ठ अभिनेता’ का फिल्म फेयर पुरस्कार 

स्टोरी साभार- स्मिता श्रीवास्तव, प्रियंका सिंह, दीपेश पांडेय,