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'10 हजार नहीं, 10 लाख...', जब Vijay Anand की फीस सुनकर उड़ गए थे प्रोड्यूसर के होश, ये बात सुनकर ठनका था माथा

Published: Tue, 06 Oct 2026 01:51 PM (GMT+05:30)

विजय आनंद, जिन्हें गोल्डी साहब के नाम से जाना जाता था, एक बहुमुखी फिल्मकार थे। एक बार प्रोड्यूसर उन्हें एक ...और पढ़ें

फिल्ममेकिंग और अभिनय में विजय आनंद थे अव्वल

फिल्ममेकिंग और अभिनय में विजय आनंद थे अव्वल

HighLights

  1. फिल्मकार विजय आनंद ने यादगार फिल्मों को बनाया

  2. सनी देओल की फिल्म में हीरो के भाई का रोल चाहते थे

  3. 'गाइड' के गानों में किए थे अनूठे और सफल प्रयोग

जागरण न्यूज नेटवर्क, मुंबई। भारतीय सिनेमा को गाइड, तीसरी मंजिल व ज्वेलथीफ जैसी सौगातें देने वाले फिल्मकार, लेखक व अभिनेता विजय आनंद की स्मृति ऐसी थी कि पूरी फिल्म की पटकथा, संवाद व दृश्यों की बारीकियां जुबानी याद रहती थीं।

अपनी फिल्म के गानों में उन्होंने ऐसे प्रयोग किए, जिसकी उस दौर में लोग कल्पना भी नहीं कर सकते थे। उनके साथ मिले अनुभवों को फिल्मकार राहुल रवेल (Rahul Rawail) ने साझा किया है...

वर्सेटाइल डायरेक्टर थे विजय आनंद

विजय आनंद (Vijay Anand) जैसा फिल्मकार दोबारा नहीं हो सकता। उनके मित्र व परिचित प्यार से उन्हें गोल्डी के नाम पुकारते थे। गोल्डी साहब का सोचने का तरीका अलग ही था। उनकी रचनात्मकता में विविधता नजर आती है। एक ओर उन्होंने गाइड जैसी फिल्म बनाई तो वहीं दूसरी ओर जॉनी मेरा नाम जैसी फिल्म भी दी। दोनों ही सुपरहहिट, लेकिन कलेवर एकदम अलग था।

विजय आनंद की फीस सुनकर चौंक गए थे प्रोड्यूसर

मेरा उनसे बहुत अच्छा संबंध और संवाद था। जब मैं अर्जुन फिल्म बना रहा था तो विलेन चौगले के लिए एक ऐसे कलाकार की तलाश थी, जिसकी वैसी छवि न रही हो। जिसके चेहरे-मोहरे से लोग उसके मंसूबों का पता न लगा सकें। मेरे जेहन में गोल्डी साहब का ख्याल आया। मैंने उन्हें फोन किया तो उन्होंने मिलने को बुलाया।

Vijay Anand

प्रोड्यूसर को लेकर मैं उनसे मिलने गया। उन्होंने कहानी सुनी और तुरंत हामी भर दी, फिर फीस की बात आई। वो बहुत सीनियर थे, मुझे लगा कि मेरे सामने वो बोलने में संकोच न करें, इसलिए मैंने कहा कि आप फीस को लेकर बात कर लीजिए, मैं कमरे से बाहर चला जाता हूं, पर उन्होंने मुझे वहीं रोक लिया।

विजय आनंद ने प्रोड्यूसर को निकाल दिया था बाहर

गोल्डी साहब ने कहा कि मैं दस लूंगा, इतना सुनते ही प्रोड्यूसर अली मोरानी ने तुरंत ओके कर दिया। हाथ मिलाकर उन्हें रोल के लिए फाइनल कर लिया। यहीं पर ट्विस्ट था। दरअसल मोरानी साहब को लगा कि वो दस हजार रुपये की बात कर रहे हैं। मैंने उन्हें किनारे पर ले जाकर बताया कि गोल्डी साहब दस लाख रुपये फीस की बात कर रहे हैं, तब उनका माथा ठनका।

मोरानी बोले कि दस लाख, इतना आपको कौन देगा। ये सुनते ही गोल्डी साहब ने कहा कि तुम निकल जाओ यहां से। तुम्हें इतने पैसे नहीं देने, लेकिन कौन देगा, ये तुम नहीं तय कर सकते। गोल्डी साहब को लगता था कि प्रतिभा का सही मूल्यांकन होना चाहिए। वैसे उस दौर में दस लाख बहुत बड़ी रकम होती थी।

सनी देओल की फिल्म में करना चाहते थे एक्टिंग

बहरहाल वो बात पीछे छूट गई, पर गोल्डी साहब मेरे दिमाग से जाते ही नहीं थे। मैंने एक बार गोल्डी साहब को फोन कॉल करके कहा कि मेरे पास एक आइडिया है। मैं चाहता हूं कि इसका स्क्रीन प्ले आप लिखें। ये फिल्म सनी देओल (Sunny Deol) बना रहे थे और हीरो भी वही थे। उन्होंने आइडिया सुनने के बाद कहा कि मैं एक ढांचा तैयार कर देता हूं।

Vijay Anand Guide

समझ में आया तो आगे बढ़ेंगे। एक हफ्ते बाद उन्होंने मिलने बुलाया। वो मेरी जिंदगी का यादगार अनुभव था। उन्होंने स्क्रीन प्ले में डायलॉग सहित पूरे दृश्य ही रच दिए थे। कमाल की बात है कि बिना कोई कागज देखे ही उन्होंने साढ़े चार घंटे में पूरा नैरेशन दिया। सबकुछ परफेक्ट था, पर उन्होंने एक शर्त रख दी कि हीरो के भाई का रोल मैं करूंगा। अब मैं असमंजस में था।

मैंने दोबारा कहा कि आपको लगता है कि आप उस रोल में सूट करेंगे। गोल्डी साहब ने कहा कि उस रोल में कोई बदलाव करना हो तो वो किया जा सकता है, पर भाई का रोल मुझे चाहिए। बहरहाल वो फिल्म बन नहीं सकी।

गानों में करते थे इनोवेशन

गोल्डी साहब की खासियत थी कि वो इनोवेशन करते थे। गाइड फिल्म के गानों को ही लें। सामान्यत: उस दौर के गानों में पहले मुखड़ा होता था, फिर अंतरा आता था, लेकिन गाइड का संगीत इसके उलट था। उसमें अंतरा पहले था, 'कांटों से खींच के ये आंचल, तोड़ के बंधन बांधी पायल, कोई न रोको दिल की उड़ान को, दिल वो चला आ... आज फिर जीने की तमन्ना है...'। ऐसा प्रयोग वही कर सकते थे। ये उनका आत्मविश्वास था कि मैं इसे सफल बना सकता हूं।

गीतकार शैलेंद्र से उन्होंने इस प्रारूप में गाना लिखवाया और कुछ इस तरह फिल्माया कि वह हिट रहा। वो गीतकार को सिचुएशन देते थे, उनकी फिल्मों के गाने कहानी में सहज ही घुलमिल जाते थे, जैसे गाइड का ही गाना है अल्लाह मेघ दे...। उन्होंने कभी गानों को ठूंसने का प्रयास नहीं किया।

फिल्मों में होता था थ्रिल

गाइड में उन्होंने स्त्री की आकांक्षाओं, प्रेम और आध्यात्मिकता की कहानी कही तो वहीं ज्वेल थीफ जैसी जासूसी थ्रिलर दी, जिसमें अंत तक दर्शक सोचते रह जाते हैं कि देव आनंद दोहरे रोल में हैं। दादा मुनि यानी अशोक कुमार (Ashok Kumar) का विलेन के तौर पर सामने आना उन्हें चौंका जाता है। उनके सोच और कल्पनाशीलता का दायरा इतना विस्तृत था। 

हीरो को फिल्म से निकालने वाले थे विजय

एक और वाकया याद आता है। उन दिनों की बात है जब मैं आरके स्टूडियो में असिस्टेंट था। उस दौरान जो मेरे फेवरेट डायरेक्टर होते थे जैसे मनमोहन देसाई, प्रकाश मेहरा या गोल्डी साहब, जब वे वहां शूटिंग कर रहे होते थे, तो मैं उनके सेट पर जाकर चुपचाप पीछे बैठकर उनके काम को देखा करता था। गोल्डी साहब ब्लैकमेल फिल्म की शूटिंग कर रहे थे। सुबह साढ़े नौ बजे का शूटिंग शेड्यूल था।

फिल्म में बतौर हीरो उस दौर के एक बड़े कलाकार थे। उनका इंतजार होता रहा, पर वो सेट पर नहीं पहुंचे। दोपहर के ढाई बज गए, तब उन्होंने मेकअप मैन के माध्यम से जानकारी लेनी चाही कि क्या शॉट रेडी है, तब उन्हें जवाब मिला कि सब लोग पैकअप करके जा चुके हैं। अब वो बड़ा परेशान।

आरके स्टूडियो के ऑफिस के फोन से उन्होंने गोल्डी साहब को फोन मिलाया और इस बारे में पूछा, तो उन्होंने जवाब दिया कि लगा था कि दस, साढ़े दस बजे तक आप आ जाएंगे लेकिन आप नहीं आए, तो मुझे सोचने का मौका मिल गया। मैंने काफी सोचा और अब लगता है कि फिल्म में आपके पात्र की आवश्यकता नहीं है। अगले दिन से वो हीरो बिल्कुल सही समय पर उनके सेट पर हाजिर रहते थे। ऐसे थे गोल्डी साहब। काम में किस प्रकार अनुशासन रखना है, ये वो बखूबी जानते थे।

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