अनुप्रिया वर्मा, मुंबई. कपूर खानदान को कई अरसों से चाहने वालों के लिए यह खबर एक बड़ी दुखद खबर के रूप में सामने आयी है कि आरके स्टूडियो का अब अस्तित्व कुछ दिनों में समाप्त हो जायेगा. कपूर परिवार के बेटों ने निर्णय लिया है कि 1948 में राज कपूर ने जिस स्टूडियो का निर्माण किया था अब वह स्टूडियो बेच दिया जाएगा.

इस बारे में ऋषि कपूर का कहना है कि उन तीनों भाइयों में बांडिंग अच्छी रही है, लेकिन आने वाली पीढ़ियों के बीच इस प्रॉपर्टी को लेकर अगर मनमुटाव हुआ और कोर्ट-कचहरी की नौबत आएगी तो यह अच्छा नहीं होगा. ऐसे में जागरण डॉट कॉम इंडस्ट्री के उन फिल्म समीक्षकों से बातचीत की है, जो राजकपूर के करीबी भी रहे और उन्होंने आरके स्टूडियो के उतार चढ़ाव भी देखें. हिना, कृष्णा राजकपूर का अहम योगदान और भी बहुत कुछ इस रिपोर्ट में.

कृष्णा नहीं चाहती थीं कि आरके स्टूडियो बिके...

वरिष्ठ फिल्म समीक्षक और कपूर खानदान के करीबी रहे जय प्रकाश चौकसे ने यह बात मानी कि भावनात्मक रूप से यह दुखद है लेकिन व्यवहारिक रूप से देखें तो यह निर्णय सही लिया गया है. आरके स्टूडियो में लंबे समय से फिल्में नहीं बन रही थीं. फिर हाल ही में कुछ महीने पहले जब आरके स्टूडियो आग की चपेट में आ गया था, तो काफी हद तक नुकसान हो गया था. ऐसे में उससे उबर पाना संभव नहीं था. यह भी सच है कि उससे कोई मुनाफा नहीं हो रहा था. ऐसे में अगर यह निर्णय लिया गया है तो यह व्यवाहरिक ही हैं. साथ ही यह भी सच है कि वह केवल बिल्डिंग ही बनी रह गई थी. पिछले कुछ सालों में उससे लाभ नहीं रहा है.

चौकसे आगे यह भी कहते हैं कि हाल के दिनों में आरके स्टूडियो के अप्रासंगिक होने का बड़ा कारण यह भी है कि मुंबई के महबूब स्टूडियो जो कि वर्तमान में सबसे कामयाब स्टूडियो में से एक है, वह बिल्कुल लोकेशन पर है और इस वजह से वहां लगातार शूटिंग हो रही है. वहीं आरके स्टूडियो अलग स्थान पर था, जहां लोगों की आवाजाही कम थी. पिछले कुछ सालों में बांद्रा से गोरेगांव तक स्टूडियो अधिक हैं और सक्रिय हैं. चूंकि यहां सीरियल और फिल्मों की बात करें तो अधिक सहूलियत होती है. इसलिए भी ये अधिक प्रचलित रहे. यह पूछे जाने पर कि ऋषि कपूर या रणधीर कपूर अगर निर्देशक के रूप में सफल होते तो क्या आरके स्टूडियो की रूपरेखा अलग होती. चौकसे इस बात को ख़ारिज करते हुए कहते हैं कि यह सोच गलत है कि महान निर्देशक का बेटा महान ही निर्देशक बने, महबूब के बेटे भी फिल्में नहीं बना पाए, बाकी लोग बना रहे हैं. लेकिन स्टूडियो तो कामयाब है.

चौकसे बताते हैं कि यह सच है कि कृष्णा राज कपूर कभी भी नहीं चाहती थीं कि आरके स्टूडियो बेचा जाये. साथ ही ऋषि कपूर भी यह नहीं चाहते थे. लेकिन वक्त की नजाकत और जरूरत को देखते हुए निर्णय निया गया है. वरना, यह सच है कि कपूर खानदान इससे काफी इमोशनल रूप से जुड़ा रहा है.

आरके स्टूडियो का नाममात्र अस्तित्व, रणधीर के प्रति लोगों की उदासीनता

वहीं दूसरी तरफ वेटरन फिल्म जर्नलिस्ट,रौफ अहमद जिन्होंने राज कपूर से भी कई बार लंबी बातचीत की है, वह बताते हैं कि राज कपूर को लगा था कि रणधीर कपूर एक बेहतरीन निर्देशक बन सकते हैं. चूंकि रणधीर के आइडियाज़ काफी अच्छे होते थे और राज कपूर मानते थे कि उनके बच्चे फिल्में बनाते रहेंगे. राजीव कपूर को लेकर भी वह उम्मीद में थे, कि आगे चल कर वह कामयाब होंगे. लेकिन जब ऐसा हुआ नहीं तो फिर राजीव कपूर ने भी फिल्मों से मुंह मोड़ लिया. आरके स्टूडियो की फिल्म हिना, जिसे बनाने के सपना राजकपूर कई सालों से देख रहे थे, जब वह आई, उस वक़्त रणधीर को उम्मीद थी कि उन्हें सराहना मिलेगी लेकिन उस वक़्त उन्होंने जितनी उम्मीद की थी उतनी कामयाबी मिली ही नहीं. इसके बाद से उन्होंने भी दिलचस्पी नहीं दिखायी, जबकि फिल्मों के कई अच्छे कांसेप्ट उनके पास थे लेकिन उन्हें लेकर उस वक्त लोगों में उदासीनता रहीं तो वह भी निराश हो गए. साथ ही उनके बारे में एक आवधारणा बन गई कि वह बहुत सुस्त हैं.

रौफ आगे कहते हैं कि पिछले कई सालों में गौर करें तो आरके स्टूडियो सिर्फ बिल्डिंग ही रह गई थी. राज कपूर के बिना उसका अस्तित्व ऐसे में खत्म था. हालांकि यह उम्मीद की जा रही थी कि रणबीर कपूर इसे रिवाइव करेंगे लेकिन रणबीर कपूर जाहिर है कि अपनी एक्टिंग में व्यस्त हो गये. ऐसे में कपूर परिवार के निर्णय सही हैं कि उन्होंने सिर्फ बिल्डिंग और नाम के लिए इसे रखने का फैसला नहीं किया, क्योंकि एक स्टूडियो का खर्च भी काफी होता है.

कृष्णा राज कपूर के कहने पर राजेश खन्ना जुड़े इस फिल्म से

रौफ एक और दिलचस्प जानकारी देते हैं कि आरके स्टूडियो की आखिरी फिल्म ‘आ अब लौट चलें’ रही है. इस फिल्म में राजेश खन्ना ने अहम् किरदार निभाया लेकिन कम लोगों को ही इस बात की जानकारी होगी कि आरके स्टूडियो में एक वक़्त राजेश खन्ना ने कोई भी फिल्म न करने का निर्णय ले लिया था. रौफ बताते हैं कि इसे पीछे एक बड़ी वजह थी कि राजेश खन्ना ही राज कपूर निर्देशित फिल्म सत्यम शिवम् सुन्दरम के लिए फाइनल हुए थे. लेकिन कपूर परिवार ने संयुक्त निर्णय किया कि परिवार में शशि कपूर जैसे कलाकार हैं तो किसी को बाहर से क्यों लेना है, इस पर राज कपूर ने राजेश की जगह शशि कपूर को फिल्म में शामिल कर लिया था. इस बात से राजेश बहुत नाराज हुए थे, और उन्होंने तय कर लिया था कि वह कोई भी फिल्म अब इस बैनर के अंतर्गत नहीं करेंगे. लेकिन जब ऋषि कपूर ने फिल्म बनाने का निर्णय लिया तो वह कृष्णा राज कपूर थीं, जिन्होंने राजेश की नाराजगी को खत्म करने का फैसला लिया.

उन्होंने एक दिन एक पार्टी में जाकर राजेश से आग्रह किया कि वह फिल्म का हिस्सा बनें. कृष्णा उस दौर में सबसे प्रतिष्ठित महिला थीं. लोग उनकी बात नहीं काटते थे . सो, राजेश खन्ना उनकी बात टाल नहीं पाए और आ अब लौट चले में उन्होंने एक किरदार करने का फैसला किया. हालांकि उस दौर में भी राजेश अधिक कैरेक्टर रोल नहीं कर रहे थे, लेकिन कृष्णा की बात उन्होंने स्वीकारी. रौफ कहते हैं कि दरअसल, कृष्णा ने भी ऐसा इसलिए किया था. चूंकि वह चाहती थीं कि राजेश खन्ना जैसे कलाकार के मन में कपूर परिवार के लिए कोई गलत भावना नहीं रहे. और इस तरह दोनों परिवार का तनाव ख़त्म हुआ.

आरके स्टूडियो में रिलीज से पहले कृष्णा को दिखाते थे

फिल्में राज कपूर की पहली ऑडियंस उनकी पत्नी कृष्णा ही होती थीं. कृष्णा राज कपूर को राज अपनी फिल्मों की फाइनल कट से पहले हर फिल्म आर के स्टूडियो में उन्हें ले जाकर हर रात दिखाते थे. यह बात खुद उनके पोते रणबीर कपूर ने जागरण डॉट कॉम से बातचीत में कही थी . उन्होंने कहा था कि जब भी दादाजी कोई फिल्म बनाते थे, दादी को आरके में ले जाकर दिखाते थे. कृष्णा की वजह से ही बॉबी फिल्म का अंत बदला था. पहले फिल्म में ट्रेजेडी थी , लेकिन कृष्णा ने कहा कि यह लव स्टोरी है और कोई ट्रेजडी देखना नहीं चाहेगा. तब जाकर राज कपूर ने इसे बदला था.

राज कपूर का सपना, आरके स्टूडियो और हिना

आरके स्टूडियो के अंतर्गत यह राज कपूर का सपना था कि वह अपने जीवन काल में हिना की मेकिंग पूरी कर दें. दिलचस्प बात यह है कि इस फिल्म की नायिका के लिए राजकपूर ने कई दशकों तक अभिनेत्री की तलाश की थी। वह शुरुआत में रणधीर कपूर के साथ फ़िल्म बनाने जा रहे थे. नायिका के लिए वह नफीसा अली को चाहते थे लेकिन बात नहीं बनीं। रणधीर कपूर ने जब फिल्म की जिम्मेदारी संभाली तो उन्होंने भी काफी खोजबीन की मगर वे जैसी हिना चाहते थे वैसी हिना मिल ही नहीं रही थी. बात हुई कि माधुरी या श्रीदेवी को लेकर फ़िल्म शुरू करनी पड़ेगी. तभी पाकिस्तानी राइटर हसीना मोइन, जो हिना फिल्म के लेखन से भी जुड़ी थी। उन्होंने पाकिस्तानी अभिनेत्री जेबा बख्तियार का नाम सजेस्ट किया। हसीना मोइन के कहने पर जेबा पाकिस्तान से भारत आयीं तो उन्हें एयरपोर्ट पर देखते ही रणधीर के मुंह से बरबस ही निकल गया था कि यही हिना है. राजकपूर की चाहत थी कि हिना की शूटिंग पाकिस्तान में हो इसलिए कपूर बेटों ने पाकिस्तान सरकार को इसके लिए कई चिट्ठियां लिखी थी । पाकिस्तान भी एक हफ्ते के लिए जाकर बेनज़ीर भुट्टो के से मिलकर आये थे लेकिन बेनज़ीर भुट्टो ने कोई सकारात्मक जवाब नहीं दिया, जिसके बाद फ़िल्म की शूटिंग स्विट्जरलैंड, मनाली और हॉलैंड में हुई. फिल्म की लगभग 90 प्रतिशत शूटिंग पूरी होने के बाद मालूम हुआ कि पाकिस्तान में सत्ता बदल गयी।

नवाज़ शरीफ जब पावर में थे इस बार परमिशन मिल गयी और हिना के कुछ सीन्स इस्लामाबाद में शूट हुए, जिसमें लैंडमार्क मस्जिद फैसला को दिखाया गया. बहुत कम लोग इस बात को जानते होंगे कि हिना की कहानी राजकपूर ने 60 के दशक में ही पढ़ी थी । मनमोहन देसाई ने अपनी फिल्म छलिया के लिए राजकपूर को साइन किया था. छलिया फिल्म की कहानी विभाजन के आसपास थी. जिस वजह से फिल्म की टीम विभाजन से संबंधित अखबार की कतरनें राजकपूर को पढ़ने के लिए देते थे. इन्हीं खबरों में से एक खबर ने राजकपूर को दिल को छू लिया कि एक भारतीय युवक नदी में बहकर पाकिस्तान जा पहुँचा वहां के पहाड़ी ख़ानाबदोशों ने उनकी जान बचायी। इसी कहानी पर उन्होंने हिना की कहानी पर काम शुरू किया।वह बॉबी के बाद ही इस फ़िल्म को बनाना चाहते थे लेकिन वह अलग अलग वजहों से फिल्म को शुरू ही नहीं कर पाए। आखिरकार राजकपूर का यह सपना रणधीर कपूर ने पूरा किया।

क्या इस साल होगा आरके स्टूडियो का गणपति उत्सव

आरके स्टूडियो में हर साल गणपति महोत्सव काफी धूमधाम से मनाया जाता रहा है. गणेशोत्सव नजदीक है. ऐसे में ऋषि कपूर ने आरके को बेचने की घोषणा की है तो उनके चाहने वाले यह जानने को उत्सुक है कि इस साल यह पर्व यहां मनाया जायेगा या नहीं. लेकिन खबर है कि एक आखिरी बार यह महोत्सव आरके में मनाया जाएगा . हर साल की तरह गणेश की मूर्ति की पूजा अर्चना होगी और विसर्जन भी.

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Posted By: Manoj Khadilkar