‘शादी टूटना ऐसा जैसे खराब रिक्शा...’ पहली शादी के अनुभव पर खुलकर बोलीं Shefali Shah, कई अहम मुद्दों पर की बात
अभिनेत्री शेफाली शाह ने अपनी नई किताब 'द आडेसिटी आफ बीइंग' में बचपन से लेकर अभिनय और निजी जीवन के कई पहलुओं को साझा किया है।

शेफाली शाह का इंटरव्यू
HighLights
शेफाली शाह ने 'द आडेसिटी आफ बीइंग' किताब लिखी है
उन्होंने मानसिक स्वास्थ्य और थेरेपी की आवश्यकता पर जोर दिया
अपनी पहली शादी पर भी एक्ट्रेस ने की बात
स्मिता श्रीवास्तव, मुंबई। टीवी के बाद फिल्म और ओटीटी पर अपना दबदबा बनाने के बाद अभिनेत्री शेफाली शाह (Shefali Shah) ने लेखन की ओर कदम बढ़ा दिया है। उनकी लिखी किताब 'द आडेसिटी आफ बीइंग: ए सार्ट-आफ मेमोयर' में उनके बचपन से लेकर जीवन से जुड़ी कई अहम बातों को 30 अध्यायों में बांटा गया है।
उन्होंने अपनी किताब, अभिनय सफर और आगामी फिल्म हिसाब को लेकर मुंबई स्थित आफिस में की खास बातचीत :
लिखने का आपको कब से शौक था ?
मुझे लिखना अच्छा लगता है। मैं बचपन से ही लिखती हूं। बाद में मैंने सोशल मीडिया और ब्लाग पर अपनी लिखी चीजें साझा करना शुरू किया। लोगों की प्रतिक्रिया और उन्हें मेरा लिखा पसंद आना मेरे लिए बहुत उत्साहजनक था। तब लगा कि शायद मैं अच्छा लिखती हूं। मन में यह इच्छा भी थी कि किसी न किसी समय किताब लिखूं और फिर यह विचार सच में साकार हो गया। किताब की शुरुआत में ही आपने अपने थेरेपिस्ट का जिक्र किया है, इसे साहसी कदम कहा जाएगा...
यह किताब का एक बहुत महत्वपूर्ण अध्याय है। अगर मुझे लगता कि कोई बात जरूरी नहीं है, तो मैं उसे किताब में शामिल ही नहीं करती। जब भी किसी को जरूरत महसूस हो, उसे थेरेपिस्ट या काउंसलर से जरूर मिलना चाहिए। जिंदगी में ऐसी कई परिस्थितियां आती हैं, जिन्हें हम अकेले संभाल नहीं पाते। कई बार उस दबाव को संभालने के लिए किसी प्रोफेशनल की मदद जरूरी होती है।
आज भी इसी तरह के टैबू मौजूद हैं - शेफाली
बहुत से कलाकारों ने मानसिक स्वास्थ्य के बारे में खुलकर बात की है, जो अच्छी बात है। मानसिक स्वास्थ्य को लेकर समाज में जो एक तरह का डर या धारणा बनी हुई है, उसे खत्म करने की जरूरत है। आज भी इसे लेकर एक तरह की झिझक और टैबू मौजूद है।
अगर कोई कहता है कि उसे मानसिक परेशानी है या वह किसी काउंसलर या थेरेपिस्ट की मदद लेना चाहता है, तो कई बार पहला रिएक्शन यही होता है कि उसे बहुत अटेंशन चाहिए या यह फालतू है, लेकिन हम यह कैसे तय कर सकते हैं?

अगर किसी व्यक्ति को लगता है कि उसे काउंसलर, थेरेपिस्ट की जरूरत है, तो उसे हतोत्साहित नहीं करना चाहिए।
टीवी से फिल्मों में आने वाले कलाकारों के लिए उस दौर में काफी मुश्किलें थीं। क्या आपको भी इसका सामना करना पड़ा?
मुझे पहले ‘रंगीला’ के लिए भी आफर आया था, लेकिन वह मुझे पसंद नहीं आया, इसलिए मैंने नहीं किया। फिर ‘सत्या’,‘मानसून वेडिंग’ मिली। मैं यह शिकायत नहीं कर सकती कि मुझे संघर्ष करना पड़ा। मेरी लगातार तीन शानदार फिल्में आईं और मैंने कभी किसी को काम के लिए अप्रोच भी नहीं किया।
अब तक जो भी काम मेरे पास आया है, लोगों ने खुद मुझे उसके लिए संपर्क किया है। मैं इसे बहुत बड़ी बात मानती हूं। इसके बाद जब मैंने फिल्में करनी शुरू कीं, तो एक ऐसा लंबा दौर भी आया, जब कुछ खास और दिलचस्प नहीं हो रहा था। वक्त फिल्म में मां का रोल किया था उसकी वजह से मेरा ऐज ग्रुप भी बदल गया।
आपने अपनी पहली शादी के बारे में भी लिखा है। उस दौर को दोबारा याद करना आपके लिए कितना मुश्किल था?
मुश्किल नहीं था, एक उदाहरण से समझाती हूं। मान लीजिए, आप रिक्शा लेते हैं और वह राइड अच्छी नहीं रहती। उसके बाद आप उस रिक्शे के ड्राइवर या उस राइड के बारे में सोचते नहीं रहते। मुझे भी बिल्कुल ऐसा ही महसूस हुआ। जब मैंने यह अध्याय लिखा, तो मेरे मन में किसी तरह का भावनात्मक बोझ नहीं था। मैंने बस पूरी ईमानदारी से इसे लिखा। मैं इस बात को लेकर बहुत स्पष्ट थी कि इसे बेहद सम्मानजनक तरीके से लिखना है।

यह किसी को दोष देने के लिए नहीं है। जब हम कोई रिश्ता शुरू करते हैं, तो हमें लगता है कि यह हमेशा चलेगा, सब कुछ खुशहाल रहेगा। लेकिन समय के साथ चीजें बदलती हैं और तब आपको समझ आता है कि जिस रिश्ते में आप हैं, क्या वह वास्तव में आपके लिए स्वस्थ है।
अमिताभ बच्चन आपको ‘वक्त’ के सेट पर ‘मालकिन’ कहकर बुलाते थे….
मेरे लिए यह थोड़ा शर्मिंदगी वाला था। मुझे इस तरह की तारीफ सुनना पसंद नहीं है, लेकिन जिस अपनत्व से वह मुझे संबोधित करते हैं, उससे बहुत फर्क पड़ता है। सेट पर जब आप अमित जी से मिलते हैं, तो वह सामने वाले से बिल्कुल बराबरी के स्तर पर बात करते हैं। वह कभी आपको जूनियर या छोटा कलाकार महसूस नहीं होने देते। वह सामने वाले को इतना सहज महसूस करा देते हैं कि उनके साथ बातचीत करते ही झिझक खत्म हो जाती है।
‘वक्त’ में आपने अपनी उम्र से ज्यादा महिला की भूमिका निभाई थी। उसके बाद बच्चन जी ने आपको ‘लास्ट लेयर’ के लिए बुलाया और आगे चलकर आपको राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला।
जो होना था, वही हुआ। क्या मुझे ‘वक्त’ करनी चाहिए थी? शायद नहीं। क्योंकि उस फिल्म ने मेरे पास आने वाले काम को लेकर मुझे एक मुश्किल स्थिति में डाल दिया था। लेकिन दूसरी तरफ देखें तो ‘वक्त’ के लिए मेरा नाम खुद बच्चन जी ने सुझाया था। उन्होंने मेरा कुछ काम देखा होगा, तभी उन्होंने मेरा नाम आगे बढ़ाया।
यह जानना बहुत सुखद होता है कि जिस इंसान को आप अपना आदर्श मानते हैं, जिसका आप बेहद सम्मान करते हैं, अगर वही आपके काम को अच्छा मानता है, तो यह बहुत भरोसा देता है।
आपने जिक्र किया है कि राष्ट्रीय पुरस्कार मिलने के बाद भी आपको काफी समय तक काम नहीं मिला। उस दौर को आपने कैसे संभाला?
राष्ट्रीय पुरस्कार के बाद लोगों को लगा कि वाह शानदार अभिनेत्री है। उसी दौरान ‘गांधी, माई फादर’ भी रिलीज हुई थी। सराहना मिली, लेकिन वह सराहना काम में नहीं बदली। ऐसा नहीं था कि राष्ट्रीय पुरस्कार के बाद मुझे बहुत सारे आफर मिलने लगे। हां, मैं खुद भी काम का बहुत सोच-समझकर चुनती हूं। लेकिन मेरे लिए सावधानी से चुनाव करने का मतलब यह नहीं है कि कोई फिल्म अच्छी है या बुरी। सवाल यह है कि वह मुझे पसंद आती है या नहीं। अगर मुझे कोई किरदार करना है, तो मैं उसे पूरे सौ प्रतिशत विश्वास के साथ करना चाहती हूं।
करियर में क्यों आया गैप?
अगर मैं उससे पूरी तरह सहमत या आश्वस्त नहीं हूं, तो मैं उसे नहीं कर पाऊंगी। कई ऐसे किरदार थे, जो शायद अच्छे रहे हों, लेकिन मैं उन्हें निभाने को लेकर आश्वस्त नहीं थी। इसलिए इस वजह से भी मेरे करियर में वह लंबा गैप आया। उस गैप के दौरान खुद को संभाल पाना कितना मुश्किल था? खासकर जब आपके आसपास के कलाकार लगातार काम कर रहे थे और आपको काम नहीं मिल रहा था?
वह मेरे लिए बहुत मुश्किल और निराशाजनक दौर था। आप अपनी क्षमता पर ही सवाल उठाने लगते हैं। लगता है शायद पिछली सफलता महज एक संयोग थी। शायद मैं उतनी अच्छी नहीं हूं। इस तरह के तमाम विचार आने लगते हैं। मैं उस समय बहुत परेशान थी क्योंकि मुझे काम नहीं मिल रहा था। जैसे-जैसे मेरी उम्र बढ़ रही थी, यह डर भी बढ़ता जा रहा था कि अगर अभी काम नहीं मिला तो आगे कब और कहां मिलेगा।

सब अपनी जिंदगी में व्यस्त हैं
उस समय मैंने स्पेन जाकर तीन-चार महीने का आर्ट का कोर्स किया। मुझे लगा कि रचनात्मक तौर पर कुछ न कुछ करते रहना बहुत जरूरी है, वरना मैं खुद को संभाल नहीं पाऊंगी। मुझे लगातार कुछ रचनात्मक करने की जरूरत थी। इसी दौरान बच्चे भी बड़े हो गए थे और अपनी-अपनी जिंदगी में व्यस्त हो गए थे। वे काफी कम उम्र में देश से बाहर चले गए थे, क्योंकि वे फुटबालर बनने की ट्रेनिंग ले रहे थे। इसलिए वह पूरा दौर मेरे लिए आसान नहीं था।
