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जब दो दिग्गजों के 'अहंकार' पर भारी पड़ा शोमैन का सिनेमाई करिश्मा,तीन दशक बाद भी क्यों खास है सुभाष घई की 'सौदागर'

Published: Sun, 02 Aug 2026 07:00 AM (IST)

1991 में सुभाष घई की फिल्म सौदागर ने दिलीप कुमार और राजकुमार जैसे दिग्गजों को एक साथ लाकर इतिहास रचा, जो उद्योग के संदेह के बावजूद एक बड़ी सफलता थी।

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HighLights

  1. दिलीप कुमार और राजकुमार को एक साथ लाना चुनौतीपूर्ण था

  2. सुभाष घई ने भव्यता और सदाबहार संगीत पर जोर दिया

  3. मनीषा कोइराला का शानदार डेब्यू फिल्म की पहचान बना

संजीत नार्वेकर, मुंबई। साल 1991 में जब निर्देशक सुभाष घई (Subhash Ghai) ने सौदागर की घोषणा की, तो फिल्म जगत में खलबली मच गई। फिल्म उद्योग के पंडितों का साफ कहना था कि यह प्रोजेक्ट बीच में ही दम तोड़ देगा। दिलीप कुमार और राजकुमार जैसे दो दिग्गज महानायकों के नाजुक अहंकार को एक साथ संभालना नामुमकिन था। हालांकि अतीत में राज कपूर और दिलीप कुमार ने और दिलीप-देव आनंद ने इंसानियत (1955) में साथ काम किया था, लेकिन बदला हुआ दौर इन दोनों के आपसी टकराव को लेकर आशंकित था।

अनूठी सोच, पुराना दांव

जहां पूरी इंडस्ट्री इस संयोजन को आत्मघाती मान रही थी, वहीं खुद को शोमैन कहने वाले सुभाष घई ने कुछ अलग हटकर सोचा। उनका मानना था कि अगर दोनों मेगास्टार्स को स्क्रीन पर बराबर का समय और महत्व दिया जाए, तो यह करिश्मा मुमकिन है। इसके बाद एक संतुलित स्क्रिप्ट की तलाश शुरू हुई, जो अंततः दो ऐसे राइटर्स की कहानी पर जाकर रुकी जिसमें अनुभव (सचिन भौमिक) और युवा जोश (कमलेश पांडे) का गजब का मेल था। इस पटकथा में घई ने भी पूरा इनपुट दिया। 

लेखकों ने जो प्लाट तैयार किया, वह बेहद पारंपरिक था। दो बचपन के दोस्त एक दर्दनाक हादसे के बाद जानी दुश्मन बन जाते हैं और दुश्मनी की दीवारें खींच दी जाती हैं। दो पीढ़ियों के बाद उनके पोते-पोती (विवेक मुशरान और मनीषा कोइराला) मिलते हैं, उनमें प्यार हो जाता है और वे इन दोनों बुजुर्गों की कड़वाहट को दूर करने की प्लानिंग करते हैं। 

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यह पारिवारिक ताना-बाना भारतीय सिनेमा के लिए बिल्कुल नया नहीं था। इससे पहले साल 1968 में फिल्म दो कलियां में बाल कलाकार नीतू सिंह ने दोहरी भूमिका निभाते हुए अपने अलग हो चुके माता-पिता को मिलाने की कोशिश की थी। वह फिल्म भी 1965 की तमिल फिल्म कुझंदैयुम दैवमम का रीमेक थी, जो खुद 1961 की हालीवुड फिल्म द पैरेंट ट्रैप से प्रेरित थी। इस तरह सौदागर की मूल कहानी कई पुराने ढांचों से होकर गुजरी थी।

परदे के पीछे अफवाहें फिल्म की शूटिंग के दौरान हर कोई किसी बड़े धमाके का इंतजार कर रहा था। लेकिन दोनों महानायकों ने बेहद परिपक्वता दिखाई और कोई विवाद नहीं हुआ। सुभाष घई भी दोनों दिग्गजों को बराबर का वेटेज देने में कामयाब रहे। उस दौर में यह अफवाह उड़ी थी कि अपनी खास संवाद अदायगी के लिए मशहूर राजकुमार ने सबसे भारी संवादों की मांग की थी, जिसे दिलीप कुमार ने अपने बेमिसाल आंखों के एक्सप्रेशंस से बेहद सहजता से फीका कर दिया था। 

मनीषा कोइराला ने किया आकर्षित

फिल्म का दूसरा मुख्य आकर्षण इसकी युवा जोड़ी थी। विवेक मुशरान तो चाकलेट हीरो की इमेज से आगे नहीं बढ़ पाए, लेकिन मनीषा कोइराला ने पहली ही फिल्म से सबका ध्यान खींचा। नेपाल के दो पूर्व प्रधानमंत्रियों की पोती मनीषा ने इससे पहले सिर्फ एक नेपाली फिल्म में काम किया था। सौदागर में उनकी स्क्रीन प्रेजेंस और सहजता ने आने वाले समय में एक सुपरस्टार के जन्म का साफ संकेत दे दिया था।

असली भारत का रुख

सुभाष घई जानते थे कि महज दो बड़े चेहरों और इस घिसी-पिटी स्क्रिप्ट के भरोसे फिल्म को हिट नहीं कराया जा सकता। इसलिए उन्होंने फिल्म की भव्यता और प्रस्तुतीकरण पर सबसे ज्यादा ध्यान दिया। वे हिट फिल्मों की पैकेजिंग के उस्ताद थे और उन्होंने सौदागर को भी एक नायाब गहने की तरह तराशना शुरू कर दिया। फिल्म को भव्य कैनवास देने के लिए घई ने हिंदी फिल्मों के पारंपरिक लोकेशंस को छोड़कर असली भारत का रुख किया।

उन्होंने पंजाब के लहलहाते हरे-भरे खेतों और हिमाचल प्रदेश के ऊंचे पहाड़ों की खूबसूरती को पर्दे पर उतारा। दिग्गज सिनेमैटोग्राफर अशोक मेहता के कैमरे के जादू ने यह तय किया कि फिल्म का हर दृश्य हिंदी सिनेमा के बेहतरीन विजुअल्स में गिना जाए।

Subhash

सदाबहार संगीत का जादू

विजुअल्स के साथ-साथ घई ने संगीत के रूप में अपना सबसे अचूक पत्ता खेला। लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल और आनंद बख्शी की जोड़ी ने मिलकर एक बेहद सुरीला एल्बम तैयार किया, जिसने इलू-इलू और इमली का बूटा जैसे ब्लाकबस्टर गाने दिए। उस दौर की युवा पीढ़ी के लिए रोमांस का नेशनल एंथम बन गया, जबकि दिलीप कुमार और राजकुमार पर फिल्माया गया इमली का बूटा पुराने लोगों के सिर चढ़कर बोला, जिसने फिल्म की लोकप्रियता में चार चांद लगा दिए।

दिलीप साहब और राजकुमार की विदाई के साथ आज तीन दशक बाद यह फिल्म सिर्फ एक दिलचस्प स्टार- कास्ट की याद बनकर रह गई है, लेकिन इसे मनीषा कोइराला जैसी बेहतरीन अभिनेत्री देने के लिए हमेशा याद रखा जाएगा। मनीषा ने ए लव स्टोरी, बांबे, खामोशी और कंपनी जैसी शानदार फिल्मों से उस पूरे दशक पर राज किया। कैंसर जैसी गंभीर बीमारी को मात देकर लौटने वाली मनीषा वाकई सौदागर की सबसे नायाब खोज थीं, जिन्होंने इस फिल्म की विरासत को सिनेमाई इतिहास में अमर रखा है!

1991 की तीसरी सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म बनी थी सिल्वर जुबली हिट साबित बनी थी हुई सौदागर। उस साल के फिल्मफेयर अवार्ड्स में सौदागर के लिए कई नामिनेशन्स के साथ सुभाष घई को मिला बेस्ट डायरेक्टर का अवार्ड।

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