Mayasabha Review: तर्क की माया से दूर, पहेलियों का खजाना... 'मयसभा' में जावेद जाफरी ने दिखाया हुनर
Mayasabha: The Hall of Illusion Review: जावेद जाफरी स्टारर फिल्म मयसभा द हॉल ऑफ इल्यूजन सिनेमाघरों में दस्तक दे चुकी ...और पढ़ें

मयसभा द हॉल ऑफ इल्यूजन का रिव्यू। फोटो क्रेडिट- इंस्टाग्राम

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
प्रियंका सिंह, मुंबई। साल 2018 में रिलीज हुई तुम्बाड फिल्म के बाद से ही निर्देशक राही अनिल बर्वे अपनी फिल्म मयसभा : द हॉल ऑफ इल्यूजन (Mayasabha: The Hall of Illusion) को बनाने में लगे थे। आखिरकार आठ सालों के बाद उनकी कोशिश कामयाब हुई। फिल्म तुम्बाड की ही तरह अलग है, लेकिन दौर आज का है।
क्या है मयसभा की कहानी?
कहानी है निर्माता परमेश्वर खन्ना (जावेद जाफरी) की, जो सालों से बंद पड़े सिंगल स्क्रीन थिएटर में अपने बेटे वासु (मोहम्मद समद) के साथ रहता है। उसे मच्छरों से दिक्कत है, इसलिए उन्हें भगाने के लिए थर्मल फॉगिंग मशीन (धुंए वाली मशीन) रखता है।
दोनों का बाहरी दुनिया से वास्ता नहीं है, लेकिन वासु का दोस्त है रावोरावना (दीपक दामले) जिसे वो बताता है कि परमेश्वर के पास 40 किलो सोना है, जो वह थिएटर में ही कहीं छुपाकर भूल गया है। सोना चोरी करने के लिए रावोरावना अपनी बहन जीनत (वीणा जामकर) के साथ एक योजना बनाता है।
क्यों देखनी चाहिए मयसभा?
फिल्म की कहानी, पटकथा और संवाद निर्देशक राही अनिल बर्वे ने ही लिखे हैं, जिसमें नयापन है। फिर उन्होंने अलग दुनिया गढ़ी है, जहां अंधेरा, लालच, धोखा और कुछ राज हैं। रचनात्मकता के नाम पर ऐसी जटिल दुनिया को देखने में कोई हर्ज नहीं है, लेकिन जब कहानी में इंटरनेट, मोबाइल फोन का जिक्र हो, तो फिर तर्क अपने आप लगाना पड़ता है।
चौंकाएगा मयसभा का क्लाइमैक्स
मन में प्रश्न आने लगते हैं कि भले ही दुनिया और परिवार से हारे हुए परमेश्वर का बाहर न जाना न्यायसंगत है, लेकिन वासु क्यों बाहरी दुनिया से दूर है। जबकि उसे परमेश्वर ने कैद भी नहीं किया है, वह घर के सामान लाने के लिए बाहर जाता है। एक इतना बड़ा निर्माता बदहाल है, फिर भी उस पर कोई खबर नहीं बनती।
हालांकि, जीनत और रावोरावना के साथ परमेश्वर का पहेलियों वाला खेल दिलचस्प है। कहानी में आगे क्या होगा, उसे जानने की इच्छा अंत तक बनी रहती है। फिल्म का क्लाइमेक्स और परमेश्वर की मानसिक स्थिति के पीछे का सच चौंकाएगा।
फिल्म की बारीकियों पर दिया गया ध्यान
तंग जगहों पर फिल्म को इतनी खूबसूरती से शूट करने के लिए सिनेमैटोग्राफर कुलदीप ममानिया की सराहना बनती है। प्रोडक्शन डिजाइनर और आर्ट डायरेक्शन डिपार्टमेंट का काम बहुत बढ़िया हैं, जिन्होंने परमेश्वर की दुनिया को गढ़ने में हर छोटी बात का ध्यान रखा है। गिरा हुआ झूमर, थिएटर की टूटी कुर्सियां, धूल से सना सोने का कमोड यह सब आपको स्क्रीन के जरिए उस दुनिया में ले जाता है।
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मयसभा के कलाकारों की परफॉर्मेंस उम्दा
फिल्म की जान जावेद जाफरी हैं। उन्होंने अपने अभिनय का अनदेखा पहलू दिखाया है। उनका पात्र अप्रत्याशित है, वह कब नाराज हो जाए, कब खुश पता नहीं। अर्श से फर्श तक पहुंचकर भी झूठा अंहकार रखना, धोखा देने का अपराधबोध जैसे कई भावों को उन्होंने बखूबी निभाया है।
मोहम्मद समद का पात्र हड़बड़ी में क्यों है, उसका कारण स्पष्ट नहीं, फिर भी वह अपने अभिनय से बांधे रखते हैं। मराठी फिल्मों की अभिनेत्री वीणा जामकर निगेटिव रोल में दमदार हैं। दीपक दामले को स्क्रीनस्पेस कम मिला है।
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