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12 साल का सफर, खुद की फंडिंग और मणि कौल, Mita Vashisht ने बयां किया निर्देशन का कठिन संघर्ष

By Smita SrivastavaEdited By: Ekta Gupta
Published: Sun, 25 Oct 2026 04:14 PM (IST)

मीता वशिष्ठ ने हाल ही में अपनी फिल्म मणि कौल (Mani Kaul) और अपनी फिल्ममेकिंग की जर्नी के बारे में खुलकर बात की।

मीता वशिष्ट की 'मणि कौल' को बनाने में लगे 12 साल

मीता वशिष्ट की 'मणि कौल' को बनाने में लगे 12 साल

HighLights

  1. मीता वशिष्ट की 'मणि कौल' को बनाने में लगे 12 साल

  2. फिल्म को हाल ही में मिला सेंसर सर्टिफिकेट 

  3. मीता वशिष्ठ की दैनिक जागरण से हुई खास बातचीत

स्मिता श्रीवास्तव, मुंबई। ‘चांदनी’ से लेकर ‘नई नवेली’ तक, मीता वशिष्ठ (Mia Vashisht) ने अपने करीब चार दशक के करियर में एक्टिंग के साथ राइटिंग में भी अपनी क्रिएटीविटी साबित की है। उनकी निर्देशित फिल्म 'मणि कौल एंड दैट थिंग कॉल्ड द एक्टर' को बनाने में करीब 12 साल लगे।

दिवंगत फिल्मकार मणि कौल (Mani Kaul) के सिनेमा और अभिनय की उनकी समझ को तलाशती इस फिल्म को हाल ही में सेंसर सर्टिफिकेट मिला है। सिनेमा के प्रति अपने जुनून, लंबे रचनात्मक सफर और फिल्म निर्माण की चुनौतियों पर मीता वशिष्ठ ने खास बातचीत की।

फिल्म बनाने की शुरुआत कैसे हुई? बारह साल का सफर कैसे तय हुआ?

सच कहूं तो मैंने कभी नहीं सोचा था कि फिल्म बनाने में इतना समय लग जाएगा। लेकिन एक बार आप समुद्र में कूद जाते हैं, तो तैरकर उसे पार करना ही होता है। बीच-बीच में कुछ टापुओं पर रुकना पड़ता है, पानी के शांत होने का इंतजार करना पड़ता है। ऐसा ही हुआ मेरे साथ। इस फिल्म की शुरुआत फिल्म्स डिवीजन से हुई थी।

मैंने वहां आवेदन किया और उन्होंने मेरी फिल्म के विषय को मंजूरी दी। वह मेरे लिए गर्व की बात थी। उस दौर में फिल्म्स डिवीजन ने मणि कौल की सिद्धेश्वरी सहित कई महत्वपूर्ण फिल्मों को सहारा दिया था। उस समय वहां ऐसे विषयों और फिल्मकारों को प्रोत्साहन देने की सोच थी, जिन्हें निजी निर्माता शायद समर्थन नहीं देते।

Mita  (2)

हालांकि, मैं उस समय स्थापित फिल्मकार नहीं थी। मैंने 2012 में पब्लिक सर्विसेज ब्रॉडकास्टिंग ट्रस्ट (पीएसबीटी) के लिए शी आफ द फोर नेम्‍स She of the Four Names नामक डाक्‍यूमेंट्री फिल्म बनाई थी। इसके अलावा सैटरडे सस्‍पेंस धारावाहिक के लिए भी लिखा था। फिल्म्स डिवीजन ने मुझे सीमित बजट में फिल्म बनाने का प्रस्ताव दिया, लेकिन जब मैंने पटकथा पूरी की, तो मुझे एहसास हुआ कि इस फिल्म को बनाने के लिए काफी अधिक पैसे की जरूरत होगी।

मैंने उनसे अतिरिक्त फंडिंग जुटाने की अनुमति मांगी, लेकिन उन्होंने कहा कि फिल्म के अधिकार उनके पास हैं, इसलिए वे बाहर से फंडिंग नहीं ले सकते। तब मैंने फैसला किया कि बाकी पैसा मैं खुद लगाऊंगी। मुझे फिल्म एक साल में पूरी करनी थी, लेकिनऐसा नहीं हो पाया। मैंने राजस्थान, मुंबई, दिल्ली और बनारस में फिल्म की शूटिंग की योजना बनाई थी।

राजस्थान में पहला शेड्यूल 2015 में हुआ। इसके बाद निजी निर्माताओं से मिलने वाली फंडिंग रुक
गई। 2017 में ओटीटी के आने से मुझे अच्‍छी फीस मिल रही थी। मैं अपना पैसा लगा पाई। इसके बाद 2017 में दो और 2018 में दो शेड्यूल हुए और धीरे-धीरे फिल्म की शूटिंग पूरी हुई। फिर लॉकडाउन आ गया। इस दौरान प्रकाश झा प्रोडक्शंस ने मेरी बहुत मदद की। उन्होंने मुझे अपने स्टूडियो में फिल्म का काम जारी रखने की सुविधा दी। उनकी हार्ड ड्राइव्स में करीब ढाई साल तक मेरी फिल्म सुरक्षित रही और मैं अपनी सुविधा के मुताबिक उस पर काम करती रही।

क्‍या OTT पर रिलीज करने की तैयारी है

नहीं, फिलहाल मेरी कोशिश है कि देश भर में कम से कम एक सिनेमाहॉल ऐसा हो, जहां यह फिल्म एक हफ्ते तक दिखाई जा सके। मैं चाहती हूं कि ज्यादा से ज्यादा लोग इसे देखें, क्योंकि यह हमारी कला,  हमारे दर्शन और हमारी सोच के बारे में है। मुझे लगता है कि ओटीटी प्लेटफॉर्म अब उस तरह की कहानियों में दिलचस्पी नहीं दिखाते, जैसी फिल्म मैंने बनाई है।

मेरी कोशिश एक ऐसी खुली और सुलभ व्यवस्था बनाने की है, जहां देश के किसी भी हिस्से में लोग हर तरह का सिनेमा देख सकें और दिखा सकें। किसी परिवार को फिल्म देखने के लिए दो हजार रुपये खर्च न करने पड़ें। मैं इस फिल्म के जरिए फिल्मों की स्क्रीनिंग का एक नया तरीका शुरू करना चाहती हूं। मेरी कोशिश है कि एक ऐसा आंदोलन खड़ा हो, जिसके तहत फिल्में आम लोगों तक पहुंचें और उन्हें देखने के लिए बड़े बजट या किसी बड़े मंच पर निर्भर न रहना पड़े।

आप तापसी पन्नू, यामी गौतम, जान्हवी कपूर और नुसरत भरूचा जैसी नई पीढ़ी की अभिनेत्रियों के साथ काम कर चुकी हैं। उन्हें देखकर कैसा लगता है?

उन्हें देखकर मुझे अपने 20-25 साल पुराने दिन याद आते हैं, जब मैं कस्बा, सिद्धेश्वरी और गोविंद निहलानी की फिल्मों में मुख्य भूमिकाएं कर रही थी। उस उम्र में लगता है कि पूरी दुनिया आपके लिए बनी है। उनकी मासूमियत और असुरक्षाओं में मुझे अपना पुराना वक्त नजर आता है, लेकिन आज की अभिनेत्रियों पर इंटरनेट मीडिया में लगातार सक्रिय रहने का दबाव भी बहुत है।

Mita  (1)

उनकी परफॉर्मेंस से लेकर निजी जिंदगी तक, हर चीज पर नजर रखी जाती है। मुझे लगता है कि इस सबके बीच उन्हें अपने अभिनय के हुनर पर ध्यान देना बहुत जरूरी है। जवानी में शायद शिल्प की अहमियत उतनी समझ नहीं आती, लेकिन लंबे समय तक टिके रहने के लिए अपने हुनर को निखारना बेहद जरूरी है।

आपने शाह रुख खान के साथ फिल्म ‘इडियट’ में काम किया था। उनसे मुलाकात होती है?

शाह रुख (Shah Rukh) और मेरी दुनिया काफी अलग है। पहली बार जब हम मिले थे, तब उनमें सुपरस्टार बनने की जबरदस्त चाह थी। बाद में जब दिल से फिल्‍म के लिए दोबारा मिले, तब तक वह बड़े स्टार बन चुके थे, लेकिन उनका स्वभाव वैसा ही था। वह बहुत अच्छे सह-कलाकार हैं और अपने साथी कलाकारों का बेहद खयाल रखते हैं।

‘इडियट’ के दौरान हमारा एक फाइट सीक्वेंस था, जो आखिरकार फिल्म में नहीं आया। शाह रुख को इसका अनुभव था, मुझे नहीं। उन्होंने इस बात का पूरा ध्यान रखा कि मुझे चोट न लगे। वह बहुत प्यारे इंसान हैं। उनकी ख्वाहिश रहती है कि हर कोई उनसे प्यार करे, चाहे वह इंसान हो या कोई जानवर।

आपकी और शाह रुख की जन्मतिथि भी एक ही दिन दो नवंबर होती है...

हां, ‘इडियट’ की शूटिंग के दौरान गोवा में शाह रुख को पता चला कि मेरा जन्मदिन भी दो नवंबर को है। वह हैरान हुए और मुझसे बोले कि उन्होंने आज तक किसी ऐसे इंसान से मुलाकात नहीं की, जिसकी जन्मतिथि उसी दिन हो। फिर मजाक में कहने लगे कि मैं अपना जन्मतिथि बदल लूं, मैंने कहा कि तुम बदल लो। 

Mita  (3)

फिल्म इंडस्ट्री से जन्मदिन का सबसे यादगार तोहफा कौन-सा मिला?

यह साल 1989 की बात है, जब हम हिमाचल प्रदेश में ‘कस्बा’ की शूटिंग कर रहे थे। मेरा जन्मदिन शूटिंग के बीच में पड़ा था। उस फिल्म के सिनेमैटोग्राफर के. के. महाजन की यह 100वीं फिल्म थी। शाम को शूटिंग खत्‍म हो जाती थी। ठंड का मौसम था। शाम को सब गायब। मैं बाजार चली गई। वहां सब मुझ से किनारा करके निकल गए।

फिर पता चला कि के. के. महाजन होटल की रसोई में मेरे जन्मदिन के लिए पूरी यूनिट का खाना बना रहे थे। उन्होंने खुद करीब 70 लोगों के लिए चिकन बनाया था। वहीं, यूनिट के बाकी लोग बाजार से मेरे लिए छोटे-छोटे तोहफे खरीद रहे थे। किसी ने चांदी की बालियां दीं, किसी ने अंगूठी, चूड़ियां या शॉल। वे सारी चीजें आज भी मेरे पास हैं।

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