सन 1963 में एक फिल्म आई थी 'बंदिनी'। इस फिल्म के निर्देशक थे बिमल राय और अभिनय करने वाले कलाकार थे अशोक कुमार, धर्मेद्र, नूतन, असित सेन, राजा परांजपे, तरुण बोस आदि। यह फिल्म बननी शुरू हुई थी सन 1960 में। उन दिनों बाकी कामों के साथ ही इसके गीत लिखने का भी काम चालू था। फिल्म के संगीतकार थे सचिन देव बर्मन और गीत लिख रहे थे शैलेंद्र।

फिल्म के लिए लिखे तो गए दस गीत, लेकिन जब फिल्म बनी और रिलीज हुई, तो पर्दे पर कुल सात गीत ही आए। गीत थे 'अब के बरस भेज भैया को बाबुल सावन में लीजो बुलाय रे..', 'जोगी जब से तू आया मेरे द्वारे..', 'ओ पंछी प्यारे सांझ सकारे बोले तू कौन सी बोली बता रे..', 'मत रो माता लाल तेरे बहुतेरे..', 'ओरे माझी मेरे साजन हैं उस पार मैं इस पार..', 'मोरा गोरा रंग लई ले मोहे श्याम रंग दई दे..' और 'ओ जाने वाले हो सके तो लौट के आना..'। गीत 'अब के बरस..' और 'ओ पंछी प्यारे..' में आवाज थी आशा भोसले की और 'जोगी जब से तू आया मेरे द्वारे..' और 'मोरा गोरा रंग लई ले..' को गाया लता मंगेशकर ने। बचे तीन गीतों 'मत रो माता लाल..' में आवाज थी मन्ना डे की। 'मेरे साजन हैं उस पार..' को गाया था सचिन देव बर्मन ने और 'ओ जाने वाले हो सके तो लौट के आना..' में आवाज थी मुकेश और कोरस की।

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फिल्म के सभी गीत लिखे थे शैलेंद्र ने, लेकिन एक गीत 'मोरा गोरा रंग..' को लिखा था गुलजार ने। इस गीत के लिखे जाने की भी अलग और रोचक कहानी है। हुआ यह कि जब इस फिल्म के गीतों को लेकर काम चल रहा था, तब किसी बात को लेकर गीतकार शैलेंद्र और संगीतकार सचिन दा यानी सचिन देव बर्मन के बीच लड़ाई हो गई। लड़ाई इतनी ज्यादा हो गई कि इन दोनों के बीच बातचीत भी बंद हो गई। नतीजा यह हुआ कि बिमल राय की फिल्म 'बंदनी' का गाना पूरा नहीं हो पा रहा था। यह काम अटक गया। बिमल दा इस बात को लेकर परेशान थे। वे किसी भी हाल में गीत लिखवाना चाहते थे ताकि शूटिंग शुरू हो सके, लेकिन दूसरी तरफ बात यह थी कि सचिन दा को तो शैलेंद्र की ओर देखना भी गवारा नहीं था। उनसे बात करना तो बहुत दूर की बात थी। ऐसे वक्त में अपनी सोच के साथ शैलेंद्र ने एक राह बनाई। उन्होंने गुलजार से कहा कि आप बिमल दा से मिलने जाइए। उन दिनों गुलजार एक मोटर गैरेज में काम किया करते थे और उनका नाम था संपूर्णानंद सिंह। उनका काम पेंट को मिक्स करना था, जो कि किसी कार के ऐक्सिडेंट होने पर उस स्पॉट पर लगाया जाता था। तब गुलजार शैलेंद्र को शैलेंद्र जी कहकर संबोधित किया करते थे, क्योंकि वे उनके सीनियर थे। बाकी लोग उन्हें शैलेंद्र कहकर पुकारते थे। कई बार वे गुलजार को प्यार से झिड़ककर कहते थे, तुमने ये क्या 'जी' का छल्ला लगा रखा है?

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शैलेंद्र ने गुलजार पर दबाव बनाया कि वह जाकर बिमल दा से मिलें, लेकिन सही बात यह थी कि उनकी इस काम में यानी गीत लिखने में तब कोई दिलचस्पी नहीं थी, क्योंकि उनका पहला प्यार साहित्य था और वे फिल्मों में काम करना या लिखना नहीं चाहते थे, यह बात निश्चित थी, इसलिए गुलजार ने साफ तौर पर इनकार कर दिया, लेकिन शैलेंद्र भी कहां मानने वाले थे। उन्होंने जब दबाव बनाया, तो गुलजार थोड़े नरम पड़ गए। खैर, वाद-विवाद के बाद यह बात तय हो गई कि गुलजार वहां यानी बिमल राय से मिलने जाएंगे।

गुलजार ने यह कहा भी है, 'आज मैं सोचता हूं कि यदि मैं बिमल दा से नहीं मिला होता, तो मेरी जिंदगी क्या होती? आज मेरी जो भी प्रसिद्धि है, उन फिल्मों व गीतों की बदौलत है, जो मैंने लिखी हैं। एक वक्त वह भी था जब दोनों को ही मैंने व्यावसायिक रूप से चुनने के लिए इनकार कर दिया था।'

खैर, गुलजार अपने एक दोस्त देबू के साथ बिमल दा से मिलने गए, जो कि बिमल दा का असिस्टेंट था। वहां पहुंच कर उन्होंने बिमल दा को नमस्कार किया। फिर बातचीत में मालूम हुआ तो बिमल दा ने गुलजार को देखा और बांग्ला में देबू से पूछा कि भद्रलोक कि वैष्णव कबिता जानी? यानी ये सज्जन पुरुष वैष्णव कविता के बारे में क्या जानते होंगे? तब देबू मुस्कुराए और उनसे कहा कि गुलजार भी बांग्ला जानते हैं, तो यह जानकर बिमल दा झेंप गए। उसके बाद बिमल दा ने बांग्ला में ही गुलजार से बात की और गुलजार को गीत और सीन के बारे में विस्तार से बताया। बातचीत के अंत में उन्होंने कहा कि अब आप सचिन दा के पास जाइए।

क्रमश:

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