अनुप्रिया वर्मा, मुंबई. मोहम्मद जीशान अयूब ने कम समय में ही हिंदी फिल्मों में अच्छी पहचान बना ली है. जिन फिल्मों का वह हिस्सा होते हैं. उनमें उनके किरदार को दर्शक अनदेखा नहीं कर सकते. नो वन किल्ड जेसिका, रईस, तनु वेड्स मनु रिटर्न्स के अलावा हाल ही में ज़ीरो में नजर आये. इस हफ्ते रिलीज़ हुई फिल्म मणिकर्णिका में भी वह अहम किरदार में हैं. कमर्शियल फिल्मों के अलावा उनकी फिल्म समीर, शाहिद कई फिल्म महोत्सव का हिस्सा बन चुकी हैं. ऐसे में जीशान ने अपनी फ़िल्मी सफर को लेकर जागरण डॉट कॉम से खास बातचीत की.

संयोग से मणिकर्णिका का हिस्सा

जीशान कहते हैं कि उन्हें कंगना का कॉल आया था. उन्होंने बताया कि किरदार क्या है? सोनू सूद के विवाद को लेकर बस इतना ही जानता था कि उन्होंने फिल्म के डेट्स सिम्बा को दे दिए थे और उनके पास रीशूट का समय नहीं था. मणिकर्णिका के लिए उन्हें दाढ़ी नहीं रखनी थी लेकिन सिम्बा के लिए उन्होंने दाढ़ी भी बढ़ा ली थी. तो कंगना के साथ मैं काम कर चुका था तनु वेड्स मनु रिटर्न्स में. मुझे वह पसंद हैं. बतौर निर्देशिका वह कंगना के साथ अपने अभिनय को शेयर करते हुए कहते हैं कि उनके बारे में जो भी लोग बोलें लेकिन उन्हें पता है कि उन्हें क्या करना है. वह कंफ्यूजन में नहीं रहती हैं. वह कहते हैं कि कंगना के साथ काफी अच्छा लगा. वह अपने काम को लेकर स्पष्ट हैं. उनको पता था कि उनको क्या चाहिए. सेट पर कोई कंफ्यूजन नहीं. मैंने काफी फिल्में की हैं. हर तरह के डायरेक्टर के साथ काम किया है. कंगना की खास बात रही कि वह कई डायरेक्टर्स से बेहतर लगी. कई बार तो निर्देशक सेट पर आते हैं और ब्लैंक खड़े हो जाते हैं. लेकिन कंगना के साथ वह बात नहीं थी. उन्होंने सारे पेपर पर लिख रखे थे. कमाल की एक्टर तो हैं ही. निेर्दशक के रूप में भी आकर बताती थीं कि उन्हें क्या चाहिए. दो तीन टेक में आगे बढ़ते हैं. उसे लेकर काफी नेगेटिविटी है. लेकिन मुझे वह बहुत पसंद है. मेरा मानना है कि कई लोग उसे पसंद नहीं करते, चूंकि वह सच बोलने से डरती नहीं है. खुल कर बात करती है. बेबाक है. ऐसी ही लड़कियों की जरूरत है. वह बैगेज लेकर नहीं चलती है.

टाइपकास्ट करते लोग

यह पूछे जाने पर कि जीशान ने अधिकतर अब तक हीरो के दोस्त वाले किरदार अधिक निभाए हैं. ऐसे में उन्हें टाइप कास्ट होने का डर नहीं लगता. इस पर जीशान कहते हैं कि यह सच है कि यहां लोग टाइपकास्ट कर देते हैं. लेकिन अभी उन्होंने तय किया है कि वह अब दोस्ती के नाम पर कोई फिल्म नहीं करेंगे. इसकी वजह से भी कई बार उनके पास वैसे ही रोल आने लगते हैं. उन्होंने बताया कि अर्जुन पटियाला में वह निगेटिव रूप में हैं.

पॉलिटिक्स की समझ

जीशान का कहना है कि अपने रोल के सेलेक्शन में वह कहते हैं कि मैं पॉलिटिकली इनक्लाइंड आदमी हूं तो मेरा प्रॉब्लम चलता रहता है. ट्रोल होता रहता हूं. तो मैं इस बात का पूरा ध्यान देता हूं कि मैं ऐसी फिल्म न करूं, जो कि मैं सोचता हूं. उससे अलग बात न कर रहा हों. इसके बाद कैरेक्टर को लेता हूं. बीच में मैंने दोस्ती में काफी चीजें कर ली थीं. लेकिन अब मुझे एहसास हो रहा है कि दोस्ती के नाम पर वक्त चला जाता है. सो, अब मैं खुद पर फोकस करने की कोशिश कर रहा हूं. मैं इस बात पर भी फोकस करता हूं कि अगर मैं अपनी जिंदगी के 30 दिन दे रहा हूं या 50 दिन दे रहा हूं तो वे दिन अच्छे बीतने चाहिए. इसलिए अगर फिल्म नहीं भी चले तो मुझे फिल्मों के सेट पर काफी मजा आया था.मैंने ठग्स ऑफ हिंदोस्तान और ज़ीरो दोनों में 180 दिन एंजॉय किया. चूंकि मैं थियेटर बैकग्राउंड से आया हूं तो रिजल्ट से ज्यादा जर्नी पर विश्वास करता हूं. मुझे सेटलमेंट से डर लगता है. मैं जर्नी में उतार-चढ़ाव देखता रहना चाहता हूं. चूंकि माता-पिता जब कहते थे कि इस फील्ड में मत जाओ,इंजीनियरिंग कर लो. सेफ खेलो. उस वक्त तो लड़ाई की थी उनसे. तो अब अगर उसकी तरफ रुझान रखूंगा. तो गलत होगा.

तीनों खान के साथ अनुभव

जीशान ने ट्यूबलाइट में सलमान खान के साथ, ठग्स ऑफ़ हिंदोस्तान में आमिर के साथ और शाहरुख़ के साथ रईस और जीरो फिल्मों में काम किया है. खान के साथ अपने अनुभव को शेयर करते हुए जीशान कहते हैं कि तीनों के साथ अच्छे अनुभव रहे हैं. आमिर के साथ उन्होंने फिल्मों के अलावा भी अन्य विषयों पर भी काफी बातचीत की.

एडल्ट कॉमेडी के ऑफ़र

जीशान बताते हैं कि उन्हें अब तक लीड एक्टर के रूप में कई एडल्ट कॉमेडी के ऑफ़र आते हैं. वह कहते हैं कि मुझे पता नहीं क्यों, लेकिन मुझे ऐसे ऑफ़र सबसे ज्यादा आते हैं. जबकि मैंने अब तक कोई ऐसी फिल्म की नहीं है. मुझे लीड आये हैं. मुझे इनमें कोई दिलचस्पी नहीं है. मेरा ह्यूमर उस तरफ वर्क नहीं करता. मैं सटायर कर सकता हूं. अच्छा सटायर जैसे हरिशंकर परसाई के लिटरेचर में मिलता है. उस तरह का व्यंग . राग दरबारी, राही मासूम रजा जैसे ह्यूमर पर काम कर सकूं. स्लैपस्टिक करने का मन है.

कैरेक्टर आर्टिस्ट नहीं अब प्रिंसिपल किरदार

जीशान का मानना है कि अब वह दौर गया जब केवल हीरो की फिल्में होती थीं. अब हर फिल्म के लिए कम से कम चार प्रिंसिपल किरदार लिखे जाते हैं और यही वजह है कि कुछ सालों पहले तक जिन कलाकारों की बात भी नहीं होती थी. अब उन कलाकारों को ध्यान में रख कर फिल्में लिखी जा रही हैं.

नेशनल स्कूल ड्रामा से मुंबई तक का सफर

जीशान बताते हैं कि ऐसा नहीं था कि बचपन से फिल्मों में आना था. वह कहते हैं कि बचपन का तो ठीक से पता नहीं. हां, गर्मियों की छुट्टियों में दोस्तों के साथ नाटक जैसा कुछ कर लेते थे. लेकिन जब मैं किरोड़ीमल कॉलेज में आया तो वहां की जो ड्रामा की सोसायटी थी, मुझे पता नहीं था कि कितनी लोकप्रिय है. मैंने तो वहां ज्वाइन किया था कि घर जल्दी न जाना पड़े लेकिन धीरे-धीरे वहां रम गया. फिर वहीं अपने दोस्त और टीचर जो कह लें केवल अरोड़ा से मिला, फिर एक्टिंग का ज्ञान हुआ. फिर एनएसडी गये. तो वहां से सिनेमा के प्रति रुझान बढ़ा. शुरुआती दौर में मुंबई में आने पर तुरंत काम नहीं मिलने लगे थे. कुछ समय तक छोटे किरदार किरदार किये. बाद में फिर फिल्मों में आने का मौका मिला.

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Posted By: Manoj Khadilkar

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