रुपेशकुमार गुप्ता। मुंबई। वैसे तो संगीत किसी की बपौती नहीं है लेकिन एक ज़माना था जब हिंदी फिल्मों में सुनने और सुनाने वाले लोग सिर्फ़ कुछ एक नामों को याद करते थे। पर जल्द ही बेड़ियां टूटी। सरस्वती देवी या राजकुमारी दुबे को आम लोग भले ही न जानते हों लेकिन ये वो हुनर हैं जिन्होंने भारतीय फिल्म संगीत में पहली बार पुरुषों के वर्चस्व को तोड़ कर अपना स्थान स्थापित किया, जो अमिट रहेगा।

आधी आबादी की ये सुर वीरांगनाएँ 30 के दशक से भारतीय सिनेमा की साथी बनीं। पारसी परिवार में जन्मी और उन दिनों बॉम्बे टॉकीज़ के कुछ संगीतकारों के साथ काम कर रहीं सरस्वती बाई ने सबसे पहले अछूत कन्या के लिए ‘ मैं बन की चिड़िया ...’ गाना कम्पोज़ किया था। पर टेक्निकली वो भारत की पहली महिला संगीतकार नहीं बन पाई क्योंकि अछूत कन्या 1936 में रिलीज़ हुई और उससे एक साल पहले फिल्म तलाश-ए-हक़ आई थी, जिसमें एक महिला संगीतकार ने गाने कम्पोज़ किये थे। नाम था जद्दन बाई। हालांकि पहली महिला सिंगर होने का गौरव राजकुमारी दुबे के नाम है, जिन्होंने 30 के दशक में सिर्फ 10 साल की उम्र में थियेटर से फिल्मों में एंट्री ली थी। उसी दौरान एच एम वी के लिए गाने रिकॉर्ड किये। पहले फिल्में की और बाद में 40 दशक के शुरुआत में यतीम और नई दुनिया जैसी फिल्मों में आवाज़ दी।

भारतीय सिनेमा जगत की तीन महिला संगीतकारों ने पुरुष प्रधान संगीतकारों में अपना वर्चस्व स्थापित कर अन्य सभी महिलाओं के लिए राह आसान की।

इशरत सुल्ताना - बिब्बो

इशरत सुल्ताना का नाम बिब्बो के नाम से प्रसिद्द है। वह भारतीय फिल्म इतिहास में महिला संगीतकारों की पहली खेप में थीं । उन्होंने भारत की स्वतंन्त्रता से पहले 1934 में फिल्म 'अदल ए जहांगीर' फिल्म में संगीत दिया था, जोकि बॉलीवुड की प्रसिद्द अभिनेत्री नरगिस की माताजी जद्दनबाई के भी संगीत देने के एक साल पहले की बात है। इशरत सुल्ताना ने इसके अलावा 'कागज की लड़की' जोकि 1937 में आई थी। उसके गानों को भी संगीतबद्ध किया था। आपको जानकर हैरत होगी कि इशरत सुल्ताना एक शानदार नायिका भी थी और उन्होंने 1930 से लेकर 1940 के दशक में फिल्मों में एक छत्र राज किया था। उस दौरान उन्होंने देविका रानी और दुर्गा खोटे के लिए गाने गाये । इनके ऊपर एक गीत भी बना था। जिसके बोल थे ,'तुझे बिब्बो कहूं के सुलोचना' . भारत के स्वतंत्रता के बाद वह पाकिस्तान चली गई और वही उन्होंने अंतिम सांसे ली।

जद्दनबाई

भारतीय फिल्मों में जद्दनबाई का नाम बहुत ऊँचा है। वह भारत के सिनेमा जगत तकनीकी रूप से पहली संगीतकार थीं। उन्होंने 1935 में 'तलाशे हक' में संगीत दिया था। उन्होंने संगीत की शिक्षा कोलकाता के श्रीमंत गणपत राव से ली थी। इसके बाद उन्होंने उस्ताद मोईनुद्दीन खान से आगे की संगीत की शिक्षा ली। उनका संगीत इतना लोकप्रिय हुआ कि तब की कई कंपनियों ने उनके गाने ग्रामोफोन पर रिकॉर्ड किये। कई जगहों और शो में गाने के बाद 1935 में आई 'तलाशे हक' में उन्होंने अभिनेत्री का काम करने के साथ उसमें गाने भी कम्पोज किये। इसके बाद उन्होंने 1936 में आई फिल्म 'मैडम फैशन' में न सिर्फ काम किया बल्कि उन्होंने फिल्म के लिए संगीत देने के साथ साथ उसका निर्देशन भी किया। जद्दनबाई ने उनकी बेटी नर्गिस (संजय दत्त की माँ) थीं जो अपनी माँ की तरह ही बेहद हुनरमंद थीं।

उषा खन्ना

उषा खन्ना भारतीय फिल्म इंडस्टी की ऐसी महिला संगीकार हैं, जिनके काम को लोग कभी नहीं भूल सकते। उनके लोकप्रिय गानों में 'छोड़ो कल की बातें', 'शायद मेरी शादी का ख्याल', 'ज़िंदगी प्यार का गीत है' और 'आप तो ऐसे न थे’ जैसे हिट शामिल हैं। उन्होंने 1940 में पहली बार फिल्म 'दिल दे के देखों' में संगीत दिया था, जिसमें आशा पारेख ने काम किया था और यह उनकी डेब्यू फिल्म थी और इस फिल्म के कारण वह सुपरहिट हो गयी थी। उन्होंने करीब 40 वर्षों तक सक्रिय तौर पर गाने बनाये। उन्होंने आशा भोसले और मोहम्मद रफी के साथ तिकड़ी बनाई, जिन्होंने मिल कर कई सुपरहिट गाने दिए। उषा खन्ना ने हवस, दिल देके देखों, साजन की सहेली और आप तो ऐसे न थे जैसी फिल्मों में बेहतरीन संगीत दिया।

लता मंगेशकर 

क्या आप जानते है भारतीय सिनेमा में आनंद घन नाम का कोई संगीतकार भी रहा है। शायद कुछ लोग नहीं जानते होंगे, लेकिन क्या आप सिंगर लता मंगेशकर को जानते हैं? ये अपने आप में सवाल है ही नहीं क्योंकि भारत रत्न लता मंगेशकर आवाज़ की दुनिया की साक्षात् सरस्वती मानी जाती हैं। सात दशक तक 36 भारतीय और विदेशी भाषाओँ में करीब 60 हजार गाने गा चुकीं लता मंगेशकर ने भारतीय महिला संगीतकारों के परचम को हमेशा से ही लहराए रखा। लता जी ने सिर्फ गाने ही नहीं गाये बल्कि फिल्मों में और ख़ासकर मराठी फिल्मों में संगीत दिया। उन्होंने संगीतकार के रूप में अपना असली नाम न देकर आनंद घन के नाम का इस्तेमाल किया। लता मगेशकर ने पहली बार सन 1955 में मराठी फिल्म 'राम-राम पाऊंण' में संगीत दिया था। जिसके बाद उन्होंने 1963 में 'मराठा टिटुका मेळावा', 1963 में 'मोत्यांची मंजुला', 1965 में 'साधी माणसे' 1969 में उन्होंने 'ताम्बाडी माती' जैसी फिल्मों में भी संगीत दिया है। उन्हें 1965 में आई फिल्म 'साधी माणसे' के लिए महाराष्ट्र सरकार ने उन्हें बेस्ट म्यूजिक डायरेक्टर का सम्मान दिया था। उनका संगीतबद्ध किया एक गाना ‘ऐरणीच्या देवा तुला...’ बहुत लोकप्रिय भी हुआ है।

Posted By: Manoj Khadilkar